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हयग्रीव स्तोत्रम् (Hayagreeva Stotram Lyrics in Hindi) - Desika Stotram - Bhaktilok

63 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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हयग्रीव स्तोत्रम्: ज्ञान का दिव्य स्रोत

हयग्रीव स्तोत्रम् का पाठ भगवान राम के प्रति श्रद्धा और ज्ञान प्राप्ति का एक महत्वपूर्ण माध्यम है।

हयग्रीव स्तोत्रम् (Hayagreeva Stotram Lyrics in Hindi) -ज्ञानानन्दमयम् देव शुद्ध क्रिस्टल संरचना हैआधार सर्वविद्यानां हयग्रीवमुपस्महे ||1||स्वतसिद्धं शुद्धस्पतिकामणिभु भृतप्रतिभातम्सुधासाधृचिभिर्द्युतिभिरवदात्रिभुवनम्अनन्तैस्त्रयन्थैरुणुविहिता हेशहल्हालम्हतशेषावाद्यं हयवदानामिदेमहिमहः ||2||समाहरस्समनं प्रतिपदामृचं धम यजुषम्लयः प्रत्युहनं लहरिवितिर्बोधजलधेःकथादर्पक्षुभ्यत्कथाकुलकोल्हालभवम्हरत्वन्तर्ध्वन्तं हयवदानहेशाहहलाहलः ||3||प्राची संध्या कचिदन्तर्निसयःप्रज्ञादृष्टे रंजनाश्रिरपूर्वावक्तृ वेदं भातु मय वाजीववक्त्रवागीशाक्य वासुदेवस्य मूर्तिः ||4||विशुद्धविज्ञानघनस्वरूपःविज्ञान का प्रारम्भदयानिधिम देहभृतं शरण्यम्देवं हयग्रीवमहं प्रपद्ये ||5||अपौरुषेयैरपि वाक्प्रपंचैःअद्यपि ते भूतिमादृष्टपरम्स्तुवन्नहं मुग्धा इति त्वयैवकरुणा सहित नाथ कटक्षिनियः ||6||दक्षिणारम्य गिरीशस्य मूर्तिः-देवी सरोजासनधर्मपत्नीव्यासादयोइप व्यापदेस्यावचःस्फूरन्ति सर्वे तव शक्तिलेसैः ||7||मन्दोऽभविस्यान्नियतं विरिञ्चःवाचं निधेरवांचितभगधेयदैत्यपनिथन एक दयालु पृथ्वीवासी हैंअध्यापैश्यो निगमन्नाचेत्त्वम् ||8||वितर्कदोलं व्यवधुय सत्त्वेबृहस्पति शासक हैतेनैव देवा त्रिदेशेश्वरनअस्पृष्टदोलैतमदिरज्यम् ||9||अग्नौ समिद्दर्चिशि सप्ततान्तोःतथास्थिवमन्त्रमयं शरीरंअखंडसरायर्हविषां प्रदानैःआप्यायनं विद्हत्से ||10||एक अलग नजरियाया मूलमन्नयामहाद्रुमणम्तत्त्वेन जानन्ति विशुद्धसत्वःत्वमक्षरमक्षरामत्रिकं त्वम् ||11||अव्याकृतद्वयकृत्वनसि त्वम्नामानि रूपाणि च यानि पूर्वाशमसन्ति तेषाम् चरमम् प्रतिष्ठितम्वागीश्वर त्वं त्वदुपज्ञवच ||12||मुग्धेन्दुनिष्यन्दविलोभनीयम्मूर्तिं तवानन्दसुधाप्रसूतिम्विपश्चितश्चेतासि भयन्तेवेलामुदारमिव दुग्ध सिन्दोह ||13||मनोगतं पश्यति यस्सादा त्वम्मनीषिणं मानसराजहंसास्वयंपुरोभवविवादभजःकिंकुर्वते तस्य गिरो ​​यथारहम् ||14||अपि क्षणार्धं कलायन्ति ये त्वम्अपलव्यन्तं विशदैर्मयुखैःअगर शब्द बहते हैंमन्दाकिनिम मनदायितुम क्षमन्ते ||15||स्वामिन्भावद्यानसुधभिषेकथवहन्ति धन्यः पुलकनुबंदम्अलकसी क्वापी एक शुद्ध जड़ हैअंगवेश्वी वनन्दथुमाजिकुरन्थम ||16||स्वामिन प्रतिच हृदयेन धन्यःत्वदध्यानचन्द्रोदयवर्धमानम्अमान्तमानन्दपयोधिमन्तःपयोभि रक्षणं परिवाहयन्ति ||17||स्वैरानुभावस त्वदधिनभवःसमृद्धवीर्यस्त्वदनुगृहेणविपश्चितोनाथ तरन्ति मयम्वैहारिकिम मोहनपिंचिकम ते ||18||प्रजानिर्मितं तपसं विपाकःप्रत्यग्रनिश्रेयससम्पदो मईसमेधिशिरं स्तव पदपद्मेसकलपचिन्तामनयः प्रणमाः ||19||विलुप्तमूर्धन्यलिपिक्रमणसुरेंद्रचूडापादललिथानम्त्वदंग्रि राजीवराजहकाननम्भुयन्प्रसादो मे नाथ भूयात ||20||पेरिसफुरन्नुपुराचित्रभानु -तेजस्विता से जलानापद्द्वयिम ते परिचिन्महेन्थःप्रबोधराजीवविभातसंध्यम् ||21||हम इसे सजाना चाहते हैंत्वयैव कल्पान्तरापलितानम्मंजुप्रनदाम् मनिनुपुरम तेमंजुशिकं वेदगिरं प्रतिमाः ||22||संचिंतयामि प्रतिभादशास्तांसन्दुक्षयन्तं समयप्रदीपन्विज्ञानकल्पद्रुमलावभम्भाष्य मुद्रमधुरं करं ते ||23||चित्ते करोमि स्फुरितक्षमलम्सव्येतरं नाथ करं त्वदीयम्ज्ञानमृतोदंचनलमपतनम्लीलाघाटीयन्त्रमिवଽଽश्रीथानम् ||24||प्रबोधसिन्धोरारुनैः प्रकाशैःप्रवलसग्गघातमिवोद्वहंताम्विभावे देवा सा पुस्तक तेवमं करं दक्षिणा मश्रितानां ||25||तमं सिभित्त्वविषाधैरमयुखैःसम्प्रीनयन्तं विदुशाशाकोरान्निशामये त्वं नवपुण्डरीकेशरद्घनेचन्द्रमिव स्फूरन्तम् ||26||दिशान्तु मे देवा सदा त्वदीयःदयातरंगानुचरः कटक्षःश्रोत्रेषु पुंसाममृतंक्षरन्थिम्सरस्वतिम संसृतकमधेनुम् ||27||विशेषवित्परिषदेष नाथाविदग्धागोष्ठी समरांगणेशजिगिशा के साथ मई कवितार्किकेंद्रनजिह्वग्रसिंहासनमभ्युपेयः ||28||त्वं चिंतां त्वन्मयतां प्रपन्नःत्वमुद्ग्रुणां षड्मायेन धम्नास्वामिन्समाजेषु समेधिषीयःस्वच्छन्दवदहवदशुरः ||29||नानाविधानमागतिः कलानम्न चापि तीर्थेषु कृतावतारःध्रुवं तवनधा परिग्रहयःनव नवं पत्रमह दयायः ||30||कंपनीअलंकृशेरन का हृदय मध्यम हैशंका कलंक पगामोज्वलानितत्त्वनि संयमचि तव प्रसादत ||31||नर्तमुद्रं करासरसिजैः पुस्तक शंखचक्रेभिभारद्भिन्ना स्पतिकरुचिरे पुण्डरीके निशानाः |अम्लानश्रीराममृतविषदैरामसुभिः प्लवयनमम्अविर्भुयदानघमहिमामनसे वागाधिशः ||32||वागर्थसिद्धिहेतोहपथा हयग्रीवसंस्तुतिं भक्त्याकवितार्किककेसरीना वेज्कातनथेन विराचितामेतम् ||33||इति श्री हयग्रीव स्तोत्रम् ||

🙏 विस्तृत अर्थ और भावार्थ

हयग्रीव स्तोत्रम् हयग्रीव भगवान के प्रति समर्पित एक अद्भुत स्तोत्र है। इस स्तोत्र में भक्ति, ज्ञान और मोक्ष की प्राप्ति का एक गहरा संदेश है। यह भगवान हयग्रीव को सर्वोच्च ज्ञान का प्रतीक माना जाता है, जो सभी विद्याओं का संरक्षक है। पहले श्लोक में सृष्टि की सम्पूर्णता और ज्ञान की महत्ता को दर्शाया गया है। 'ज्ञानानन्दमयम्' शब्द से स्पष्ट है कि ज्ञान का आनंद ही जीवन की सच्ची सार्थकता है। 'स्वतसिद्धं शुद्धस्पतिकामणिभु' से यह संकेत मिलता है कि हयग्रीव का स्वरूप शुद्ध और दिव्य है। इस स्तोत्र के माध्यम से भक्त यह संकल्प लेते हैं कि वे हयग्रीव में अपनी अज्ञानता को मिटाने और ज्ञान का प्रकाश पाने के लिए समर्पित हैं।

इस स्तोत्र में एक गहराई का अनुभव होता है जो केवल भक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह तार्किक और दार्शनिक स्तर पर भी महत्वपूर्ण है। यह दर्शाता है कि कैसे श्रवण, मनन और ध्यान से भक्त ज्ञान की प्राप्ति कर सकते हैं। 'अव्याकृतद्वयकृत्वनसि' के माध्यम से, यह संकेत मिलता है कि हयग्रीव ज्ञान की निराकार अवस्था में विद्यमान हैं। यह भक्तों को प्रेरित करता है कि ज्ञान केवल अध्ययन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ध्यान और भक्ति से भी प्राप्त किया जा सकता है। गहराई से देखने पर, यह स्तोत्र हयग्रीव की निगाहों में ज्ञान को चित्त की शुद्धि के माध्यम से प्रकट करने का भी संदर्भ देता है।

हयग्रीव का नाम लेते समय भक्त अपने भीतर ज्ञान के स्पंदन का अनुभव करते हैं। यह भक्ति मार्ग का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है जो केवल भक्ति और आशक्ति को नहीं बल्कि ज्ञान के लिए भी प्रेरित करता है। इस स्तोत्र में चार वेदों की महिमा का उल्लेख है, जिसके माध्यम से भक्त ज्ञान की विशालता को समझ सकते हैं। 'विशुद्धविज्ञानघनस्वरूप' से स्पष्ट होता है कि ज्ञान का एकाग्रता में ध्यान लगाकर उच्च स्तरीय सुख की स्थापना की जा सकती है। भक्ति के इस मार्ग में, हयग्रीव के प्रति श्रद्धा पूर्वक ध्यान केंद्रित करना आवश्यक है, जिससे भक्त को ज्ञान और शक्ति की प्राप्ति होती है।

🔍 विशेष महत्त्व और लाभ

हयग्रीव स्तोत्र का महत्व हिंदू धर्म में अत्यधिक है। यह स्तोत्र सृष्टि के रचनात्मक और व्यवस्थित ज्ञान का प्रतीक है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, हयग्रीव भगवान को ज्ञान और विद्या का देवता माना जाता है। उनका स्थान वेदों और शास्त्रों में सदा ऊँचा है। भगवान हयग्रीव को भगवान विष्णु का एक अवतार माना जाता है, जो संहारक और निर्माणकर्ता दोनों हैं। जब पृथ्वी पर अज्ञानता और अनैतिकता फैली, तब हयग्रीव ने ज्ञान और संस्कार की पुनर्स्थापना के लिए प्रकट हुए। इस स्तोत्र का पाठ करने से साधक को अहंकार, अज्ञानता, और विकारों से मुक्ति मिलती है।

प्रभु श्री राम के आदर्शों और मर्यादा पुरुषोत्तम के सम्पूर्ण चरित्र का रसास्वादन करने के लिए रामायण महाग्रंथ अन्वेषक का उपयोग करें। हयग्रीव स्तोत्र का जाप करने से मानसिक शांति, आत्म-साक्षात्कार, और ज्ञान की प्राप्ति होती है। यह भक्ति को गहरा करता है और साधक को ध्यान में स्थिरता प्रदान करता है। नियमित रूप से इसका पाठ करने से सभी प्रकार की बुरी मानसिकता का नाश होता है और व्यक्ति की शक्ति और साहस में वृद्धि होती है।

🕒 साधना एवं गायन विधि

हयग्रीव स्तोत्र का पाठ सुबह सूर्योदय से पहले या शाम को सूर्यास्त के समय करना शुभ माना जाता है। पाठ के समय एक साफ व शांत स्थान पर बैठना चाहिए, जहां ध्यान केंद्रित हो सके। एक दीया जलाना तथा फूलों का अर्पण करना इसे और प्रभावशाली बनाता है। साधक को भक्ति और श्रद्धा के साथ, स्पष्ट मन से इस स्तोत्र का पाठ करना चाहिए।

❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

हयग्रीव स्तोत्र का महत्व क्या है?

हयग्रीव स्तोत्र ज्ञान और विद्या का स्रोत है। यह भक्तों को आत्मज्ञान की ओर प्रेरित करता है और बाधाओं को दूर करता है।

इस स्तोत्र का जाप कब करना चाहिए?

इसका पाठ सुबह या शाम को, एक शांत स्थान पर किया जाना चाहिए। यह समय साधना के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है।

क्या हयग्रीव का देवी स्वरूप भी है?

जी हां, हयग्रीव को ज्ञान का देवता मानते हैं, जिनकी पूजा विद्या और अज्ञानता दूर करने के लिए की जाती है।

विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 01 Sep 2026

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