राधा गोरी गोरी
राधा गोरी गोरी, मैया गोरी गोरी
काहे को कहे सब गोरी, राधा गोरी गोरी
बरजोरी ना जानूँ, बरजोरी ना जानूँ
मैं तो गिरिधर की चोरी, राधा गोरी गोरी॥
मैं तो मोहन की चोरी, राधा गोरी गोरी
मैं तो साँवरे की चोरी, राधा गोरी गोरी
बरजोरी ना जानूँ, बरजोरी ना जानूँ
मैं तो नागर की चोरी, राधा गोरी गोरी॥
🎶 भजन का भावार्थ
यह पारंपरिक बृज के भजन की आधुनिक प्रस्तुति है, जिसमें राधा जी अपनी सखियों से कहती हैं कि सभी उन्हें "गोरी" कहते हैं, लेकिन वह तो स्वयं को कन्हाई (गिरिधर, मोहन, साँवरे, नागर) की चोरी (चुराया हुआ धन) मानती हैं। "बरजोरी ना जानूँ" का अर्थ है कि वह किसी प्रकार की बाधा या रोक-टोक नहीं जानतीं, अर्थात उनका प्रेम निष्कंटक और समर्पित है। यह भजन राधा-कृष्ण के अटूट प्रेम और समर्पण का सुंदर चित्रण है।
संगीतकार बी प्राक और मीर देसाई ने इसे आधुनिक वाद्यों (गिटार, इथनिक स्ट्रोक्स) के साथ सजाया है, जबकि इंद्रेश उपाध्याय जी की आवाज़ ने इसे पारंपरिक भक्ति का स्वर दिया है। यह गीत श्रद्धा और प्रेम का अद्भुत संगम है।
🎤 गायक: इंद्रेश उपाध्याय (Indresh Upadhyay)
श्री इंद्रेश उपाध्याय जी प्रसिद्ध भक्ति गायक और संगीतकार हैं। उनकी गंभीर एवं मधुर आवाज़ ने "राधा गोरी गोरी", "मोहे कहीं और ना लागे" जैसे कई भक्ति गीतों को लोकप्रियता दिलाई है।
🎧 संगीत: बी प्राक (B Praak) और मीर देसाई (Mir Desai) ने इस गीत को आधुनिक संगी�द्ध किया है। गिटार पर इशान दास, इथनिक स्ट्रोक्स पर तपस दा और हारमोनियम पर शिब्बू जी का योगदान है। मिक्सिंग-मास्टरिंग अभिषेक घटक ने की है।