भोजपुरी लोक संस्कृति और सनातन भक्ति परंपरा में देवी गीतों का एक अत्यंत विशिष्ट और अटूट स्थान है। शारदीय एवं चैत्र नवरात्रि के पावन अवसर पर संपूर्ण उत्तर भारत, विशेषकर बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश (पूर्वांचल) के घर-घर में गूंजने वाला पारंपरिक देवी गीत "पांच ही पान के पतईया" (Panch Hi Paan Ke Pataiya) श्रद्धा, वात्सल्य और पूर्ण समर्पण का एक अनुपम उदाहरण है। सुप्रसिद्ध लोक गायिका अंजली भारद्वाज की अत्यंत सुरीली और भावपूर्ण आवाज में गाया गया यह भजन श्रोताओं के हृदय में सीधे उतर जाता है। इस गीत में एक निष्कपट भक्त अपनी आराध्या जगदंबा माता दुर्गा से अत्यंत सरल और आत्मीय भाव से संवाद करता है। वह माता को प्रसन्न करने के लिए किसी आडंबरपूर्ण यज्ञ या बहुमूल्य सामग्री का सहारा नहीं लेता, बल्कि प्रकृति द्वारा प्रदत्त सरल वस्तुओं—जैसे पान के पत्ते, गंगाजल, सोने की थाली में सात्विक भोजन और फूलों की शय्या—को अत्यंत आदरपूर्वक अर्पित करता है। यह गीत हमें सिखाता है कि ईश्वर केवल सच्चे प्रेम और निष्काम भक्ति के भूखे हैं।
सम्पूर्ण गीत के बोल | Complete Lyrics
।। पांच ही पान के पतईया ।।
(स्थायी)
पांच ही पान के पतईया, हे मईया!
तनी ताकी ना नयनवा उघारि, हे मईया!
तनी ताकी ना नयनवा उघारि।।
(अंतरा - 1)
सोने के थरिया में जेवना परोसलीं,
जेवना जेवहु मोरी माई, हे मईया!
तनी ताकी ना नयनवा उघारि, हे मईया!
तनी ताकी ना नयनवा उघारि।।
(अंतरा - 2)
गंगा जी के जलवा से झरिया भरवलीं,
अचमन करहु मोरी माई, हे मईया!
तनी ताकी ना नयनवा उघारि, हे मईया!
तनी ताकी ना नयनवा उघारि।।
(अंतरा - 3)
लौंग इलायची के बीड़ा लगवलीं,
कुचहु कुचहु मोरी माई, हे मईया!
तनी ताकी ना नयनवा उघारि, हे मईया!
तनी ताकी ना नयनवा उघारि।।
(अंतरा - 4)
फूलवा के सेजिया पर आसन लगवलीं,
सुतहु सुतहु मोरी माई, हे मईया!
तनी ताकी ना नयनवा उघारि, हे मईया!
तनी ताकी ना नयनवा उघारि।।
गीत का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Song Meaning & Bhavarth
यह देवी गीत सनातन धर्म की 'पंचोपचार पूजा' (गंध, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य) का एक अत्यंत सुंदर लोक-रूपांतरण है। इसमें भक्त और भगवान के बीच का संबंध अत्यंत आत्मीय और पारिवारिक प्रतीत होता है। आइए इसके प्रत्येक पद के गहरे आध्यात्मिक और व्यावहारिक अर्थ को समझते हैं:
स्थायी भाव: पांच ही पान के पतईया
गीत की शुरुआत में भक्त कहता है कि हे माता! मेरे पास आपको अर्पित करने के लिए कोई बहुत बड़ी संपत्ति या बहुमूल्य रत्न नहीं हैं। मैं तो आपके चरणों में केवल पांच पान के पत्ते लेकर उपस्थित हुआ हूँ। कृपया अपने करुणामयी नेत्रों को खोलकर मेरी ओर देखिए। यहाँ 'पांच पान के पत्ते' मानव शरीर के पांच तत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश) अथवा पांचों ज्ञानेंद्रियों के समर्पण का प्रतीक हैं। भक्त अपनी समस्त इंद्रियों और अस्तित्व को माता के चरणों में समर्पित कर उनसे केवल एक बार अपनी ओर देखने की याचना कर रहा है।
प्रथम अंतरा: सोने के थरिया में जेवना
भक्त माता से कहता है कि हे जननी! मैंने आपके लिए सोने की थाली में अत्यंत पवित्र और स्वादिष्ट भोजन (भोग) परोसा है। कृपया आप इस भोजन को ग्रहण करें। यहाँ 'सोने की थाली' भक्त के शुद्ध अंतःकरण और निष्कलंक हृदय का प्रतीक है। जब हमारा हृदय राग-द्वेष से मुक्त होकर सोने की तरह शुद्ध हो जाता है, तभी उसमें परोसा गया भक्ति रूपी भोजन माता स्वीकार करती हैं।
द्वितीय अंतरा: गंगा जी के जल से अचमन
भोजन कराने के उपरांत भक्त माता को आचमन (हाथ-मुंह धोने और पीने के लिए) कराने हेतु पवित्र गंगाजल से भरा हुआ पात्र प्रस्तुत करता है। गंगाजल को हिंदू धर्म में परम पावन और मोक्षदायिनी माना गया है। यह जल भक्त की श्रद्धा और आंसुओं की पवित्रता को दर्शाता है, जिससे वह अपनी आराध्य माता के चरणों को पखारता है और उन्हें आचमन कराता है।
तृतीय अंतरा: लौंग इलायची का बीड़ा
भोजन और आचमन के बाद, भक्त माता को मुखशुद्धि के लिए लौंग, इलायची और सुगंधित द्रव्यों से युक्त पान का बीड़ा अर्पित करता है। वह प्रार्थना करता है कि माता इस बीड़े को स्वीकार करें। यह क्रिया इस बात का प्रतीक है कि भक्त अपनी वाणी को मधुर, सुवासित और कल्याणकारी बनाने का संकल्प ले रहा है, ताकि उसकी वाणी से सदैव दूसरों का भला हो और माता प्रसन्न रहें।
चतुर्थ अंतरा: फूलों की शय्या पर विश्राम
अंत में, भक्त माता के विश्राम के लिए कोमल और सुगंधित फूलों की शय्या सजाता है। वह माता से प्रार्थना करता है कि हे माँ! अब आप इस फूलों के आसन पर विराजमान होकर विश्राम करें। यह शय्या भक्त के शांत, स्थिर और ध्यानमग्न मन का प्रतीक है। जब भक्त का मन सांसारिक चिंताओं से मुक्त होकर शांत हो जाता है, तब साक्षात आदि शक्ति उसमें आकर विश्राम करती हैं, अर्थात भक्त को परम शांति की अनुभूति होती है।
गीत की मुख्य भावना एवं संदेश | Theme, Emotion & Message
इस पावन देवी गीत की मुख्य भावना 'वात्सल्य' और 'दास्य-सख्य' भाव का अनूठा मिश्रण है। यहाँ भक्त अपनी आराध्य देवी को एक दूरस्थ, दुर्गम शक्ति के रूप में नहीं देखता, बल्कि उन्हें अपने घर की सबसे आदरणीय और प्रिय सदस्य—अपनी माता—के रूप में देखता है। वह माता की सेवा उसी प्रकार करता है जैसे कोई संतान अपनी वृद्ध या पूजनीय माता की सेवा करती है।
इस गीत का मुख्य संदेश यह है कि ईश्वर को रिझाने के लिए किसी भी प्रकार के बाहरी दिखावे, धन-दौलत या कठिन कर्मकांडों की आवश्यकता नहीं होती। यदि आपके पास केवल पांच पान के पत्ते भी हैं, लेकिन उन्हें अर्पित करते समय आपके हृदय में असीम प्रेम और अश्रु हैं, तो ब्रह्मांड की स्वामिनी आदि शक्ति भी आपके सामने खिंची चली आती हैं। यह गीत श्रीमद्भगवद्गीता के उस श्लोक की याद दिलाता है जिसमें भगवान कृष्ण कहते हैं:
"पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति। तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः।।"
अर्थात, जो कोई भी मुझे प्रेम और भक्ति से एक पत्ता, एक फूल, एक फल या थोड़ा सा जल भी अर्पित करता है, मैं उस शुद्ध बुद्धि वाले निष्काम भक्त के प्रेमपूर्वक दिए गए उपहार को सहर्ष स्वीकार करता हूँ।
गीत की जानकारी | Song Information
| विवरण (Parameter) | जानकारी (Details) |
|---|---|
| गीत का नाम (Song Name) | पांच ही पान के पतईया (Panch Hi Paan Ke Pataiya) |
| गायिका (Singer) | अंजली भारद्वाज (Anjali Bhardwaj) |
| गीत की भाषा (Language) | भोजपुरी (Bhojpuri) |
| विधा (Genre) | भोजपुरी देवी गीत / पारंपरिक भजन (Devi Geet) |
| मुख्य विषय (Theme) | माता दुर्गा की सेवा, अर्चना और वात्सल्य भक्ति |
| उपयुक्त अवसर (Occasion) | शारदीय नवरात्रि, चैत्र नवरात्रि, दुर्गा पूजा, माता की चौकी |
| संगीत शैली (Music Style) | पारंपरिक लोक संगीत (Traditional Folk) |
गीत के रचनाकार एवं कलाकार | Artists & Creators
यह गीत मूल रूप से एक पारंपरिक भोजपुरी लोक देवी गीत है, जिसे सदियों से पूर्वी भारत के ग्रामीण अंचलों में गाया जाता रहा है। समय-समय पर कई महान कलाकारों ने इसे अपनी आवाज दी है, लेकिन आधुनिक युग में अंजली भारद्वाज ने इसे एक नया जीवन और अभूतपूर्व लोकप्रियता प्रदान की है। अंजली भारद्वाज की गायकी की सबसे बड़ी विशेषता उनकी आवाज की सादगी, शुद्धता और शास्त्रीय पुट है। उन्होंने इस भजन को बिना किसी अत्यधिक पाश्चात्य वाद्ययंत्रों के कोलाहल के, अत्यंत शांत और भक्तिमय संगीत के साथ प्रस्तुत किया है, जिससे इसकी मौलिकता और दिव्यता बनी रहती है।
कठिन शब्दों के अर्थ | Difficult Word Meanings
| कठिन शब्द (Word) | सरल हिंदी अर्थ (Meaning) | सांस्कृतिक/आध्यात्मिक संदर्भ (Context) |
|---|---|---|
| पतईया | पत्ता / पर्ण | यहाँ पूजा में प्रयुक्त होने वाले पवित्र पान के पत्तों से है। |
| तनी | थोड़ा सा / कृपया | माता से अत्यंत विनम्रतापूर्वक प्रार्थना करने का सूचक शब्द। |
| ताकी | देखिए / दृष्टि डालिए | माता की कृपादृष्टि या दया दृष्टि पाने की लालसा। |
| नयनवा | नेत्र / आँखें | माता के करुणामयी और ममतामयी नयनों के लिए प्रयुक्त। |
| उघारि | खोलकर | माता से अपनी योगनिद्रा त्यागकर भक्त को देखने का आग्रह। |
| जेवना | भोजन / महाप्रसाद | माता को अर्पित किया जाने वाला सात्विक भोग। |
| झरिया | कलश / टोंटीदार लोटा | गंगाजल रखने के लिए प्रयुक्त पारंपरिक पीतल या तांबे का पात्र। |
| अचमन | आचमन / कुल्ला करना | भोजन के उपरांत शुद्धि के लिए जल ग्रहण करने की पवित्र क्रिया। |
| सेजिया | शय्या / बिस्तर | भक्त के हृदय रूपी कोमल फूलों का आसन। |
गीत का आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व | Spiritual & Cultural Significance
भोजपुरी भाषी क्षेत्रों में नवरात्रि का त्योहार केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह एक सामाजिक और सांस्कृतिक उत्सव है। इस उत्सव के केंद्र में देवी गीत होते हैं। "पांच ही पान के पतईया" जैसे गीत लोक-मानस को सीधे अध्यात्म से जोड़ते हैं।
- प्रकृति और ईश्वर का संबंध: इस गीत में प्रयुक्त सभी सामग्रियां—जैसे पान के पत्ते, गंगाजल, फूल—प्रकृति से सीधे जुड़ी हुई हैं। यह दर्शाता है कि सनातन धर्म में प्रकृति की हर सुंदर वस्तु को ईश्वर की ही देन मानकर उन्हें वापस समर्पित कर दिया जाता है।
- अहंकार का विसर्जन: जब भक्त कहता है कि "मेरे पास केवल पांच ही पान के पत्ते हैं", तो वह अपने समस्त सांसारिक अहंकार, धन और पद का विसर्जन कर देता है। वह माता के सामने एक अबोध बालक की भांति खड़ा होता है।
- पारिवारिक मूल्यों का सुदृढ़ीकरण: इस गीत को गाते और सुनते समय परिवार के सभी सदस्य एक साथ बैठते हैं। यह गीत नई पीढ़ी को अपनी समृद्ध लोक भाषा, संगीत और धार्मिक संस्कारों से परिचित कराने का एक सशक्त माध्यम है।
गीत से मिलने वाली जीवन सीख | Life Lessons
यह साधारण सा दिखने वाला लोकगीत हमें जीवन के कई अमूल्य और गहरे पाठ सिखाता है:
- सादगी और संतोष: जीवन में सुखी रहने के लिए बहुत अधिक भौतिक संसाधनों की आवश्यकता नहीं है। जो कुछ भी हमारे पास है, उसे यदि हम श्रद्धा और संतोष के साथ स्वीकार करें और ईश्वर को अर्पित करें, तो हमारा जीवन धन्य हो जाता है।
- सेवा भाव: माता की सेवा के विभिन्न चरणों (भोजन कराना, जल देना, मुखशुद्धि कराना, सुलाना) के माध्यम से यह गीत हमें अपने माता-पिता और बुजुर्गों की सेवा करने की प्रेरणा देता है।
- एकाग्रता और समर्पण: जिस प्रकार भक्त माता का ध्यान आकर्षित करने के लिए बार-बार "तनी ताकी ना नयनवा उघारि" कहता है, उसी प्रकार हमें भी अपने लक्ष्यों के प्रति पूर्णतः एकाग्र और समर्पित होना चाहिए।
गीत सुनने का अवसर एवं परंपरा | When to Listen / Sing
यद्यपि इस मधुर भजन को वर्ष के किसी भी दिन सुना जा सकता है, परंतु निम्नलिखित अवसरों पर इसका महत्व अत्यधिक बढ़ जाता है:
- नवरात्रि के नौ दिन: शारदीय और चैत्र नवरात्रि के दौरान सुबह के समय कलश स्थापना के बाद या शाम की आरती के समय इस गीत को बजाना अत्यंत शुभ माना जाता है।
- माता का जागरण / चौकी: किसी भी धार्मिक अनुष्ठान या पारिवारिक मांगलिक कार्य के अवसर पर आयोजित होने वाले माता के जागरण में इस गीत को अनिवार्य रूप से गाया जाता है।
- दैनिक संध्या वंदन: घर के मंदिर में संध्या काल के समय इस भजन को सुनने से घर का वातावरण अत्यंत शांत, पवित्र और सकारात्मक ऊर्जा से भर जाता है।
एक नजर में गीत की जानकारी | Song at a Glance
| मुख्य बिंदु | संक्षिप्त विवरण |
|---|---|
| गीत का शीर्षक | पांच ही पान के पतईया |
| मुख्य स्वर | अंजली भारद्वाज (Anjali Bhardwaj) |
| गीत की विधा | भोजपुरी पारंपरिक देवी गीत (Bhojpuri Devi Geet) |
| आध्यात्मिक संदेश | सरल और निष्कपट भक्ति ही ईश्वर प्राप्ति का मार्ग है |
| मुख्य प्रतीक | पांच पान के पत्ते (पंचतत्व / पंचज्ञानेंद्रियां) |
| संबंधित देवी | माँ दुर्गा, माँ जगदंबा, शीतला माता |
| लोकप्रियता क्षेत्र | बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, नेपाल और वैश्विक भोजपुरी समुदाय |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
यह लेख भक्तिलोक के विद्वान संपादकों और संगीत समीक्षकों द्वारा तैयार किया गया है। इस सामग्री का उद्देश्य भोजपुरी लोक संस्कृति के इस अनमोल देवी गीत के गहरे आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक पहलुओं को उजागर करना है। लोकगीत केवल मनोरंजन के साधन नहीं हैं, बल्कि वे हमारी सदियों पुरानी मौखिक परंपरा और धार्मिक मूल्यों के सं
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