मूल पाठ एवं पवित्र संकीर्तन
शुद्ध उच्चारण और भक्ति भाव के साथ स्मरण करें
🙏 ललनवा बिना सूना अँगनवा – माँ का विरह गीत
सनातन संस्कृति के विभिन्न व्रत, उपवास और त्यौहारों की सही तिथियों के लिए सनातन कैलेंडर २०२६ तथा दैनिक पंचांग का अवलोकन अवश्य करें।
(Lalanwa Bina Suna Anganwa) – Bhojpuri Lokgeet 2026
📝 गीत विवरण
📜 गीत के बोल (भोजपुरी में)
॥ स्थायी ॥
ललनवा बिना सूना अँगनवा ए माई,
कइसन लागे खाली-खाली दुआर।
ललनवा बिना सूना अँगनवा ए माई,
ना बाजे बँसुरिया, ना बजे सितार॥
॥ अंतरा १ ॥
जबसे गईलू ससुराल हो ललनवा,
रोवे अँखियाँ हमार।
ललनवा बिना सूना अँगनवा ए माई,
कइसन लागे खाली-खाली दुआर॥
– पारंपरिक भोजपुरी लोकगीत
🙏 गीत का अर्थ और संदेश
यह भोजपुरी लोकगीत एक माँ के हृदय की पीड़ा को व्यक्त करता है जब उसका बेटा (ललनवा) ससुराल चला जाता है। "ललनवा बिना सूना अँगनवा" – बेटे के बिना आँगन सूना लगता है, द्वार खाली-खाली प्रतीत होता है। बाँसुरी नहीं बजती, सितार के स्वर गूँजते नहीं – घर की रौनक और संगीत दोनों लुप्त हो गए हैं।
"जबसे गईलू ससुराल हो ललनवा, रोवे अँखियाँ हमार" – जब से बेटा ससुराल गया, माँ की आँखें रोती हैं। यह गीत मातृ-वात्सल्य और वियोग की मार्मिक अभिव्यक्ति है, जो भोजपुरी लोक संस्कृति में गहराई से रचा-बसा है।
ससुराल जाना बेटे के विवाहित जीवन की ओर कदम बढ़ाने का प्रतीक है, लेकिन माँ के लिए यह अलगाव का क्षण होता है। गीत में इसी अलगाव की व्यथा को सरल किंतु मार्मिक शब्दों में चित्रित किया गया है।
🎵 भोजपुरी लोकगीतों में मातृ-प्रेम
भोजपुरी लोकगीत अपनी मिट्टी की सुगंध और जीवन के विविध रंगों के लिए जाने जाते हैं। विवाह, जन्म, त्योहार और वियोग – हर अवसर पर गीतों की अलग परंपरा है। यह गीत उस परंपरा का हिस्सा है जहाँ माँ अपने बेटे के बिछोह में गीत गाती है। ऐसे गीत आज भी गाँवों में महिलाओं द्वारा गाए जाते हैं, विशेषकर जब बेटा विदा होकर ससुराल जाता है या लंबे समय के लिए परदेस चला जाता है।
लोकगीतों की यह विधा पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक रूप से हस्तांतरित होती रही है। इनमें संस्कार, संवेदना और सामाजिक मूल्य झलकते हैं। "ललनवा बिना सूना अँगनवा" ऐसा ही एक अमर गीत है, जिसे विभिन्न लोक गायिकाओं ने अपनी आवाज़ दी है।
🔍 गीत का विशेष महत्त्व
💖 मार्मिक भावनाएँ
गीत में माँ की आँखों से झरते आँसुओं और सूने आँगन की पीड़ा को बेहद सरलता से उकेरा गया है। यह सार्वभौमिक मातृ-प्रेम को छू लेता है।
✨ लोक संस्कृति का दर्पण
यह गीत भोजपुरी समाज में माँ-बेटे के रिश्ते और बेटे के विवाहोपरांत घर में आने वाले बदलाव को दर्शाता है। यह केवल एक गीत नहीं, बल्कि जीवन का दस्तावेज़ है।
🎯 संदेश : माँ का प्यार निस्वार्थ और असीम होता है। बेटे के बिछोह में वह भले ही अकेली पड़ जाए, पर उसकी शुभकामनाएँ हमेशा उसके साथ होती हैं। यह गीत उसी अटूट प्रेम का प्रतीक है।
🙏 विस्तृत अर्थ और भावार्थ
यह अत्यंत ही पावन भक्ति रस से परिपूर्ण भजन "ललनवा बिना सूना अँगनवा – भोजपुरी लोकगीत (Lalanwa Bina Suna Anganwa Bhojpuri Folk Song Lyrics)" ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम और पूर्ण शरणागति का जीवंत उदाहरण है। सनातन धर्म में संकीर्तन और प्रभु नाम का जाप कलयुग का परम साधन बताया गया है। इस भजन के प्रत्येक शब्द में जीवात्मा का अपनी मूल परम सत्ता (परमात्मा) से मिलने का गहरा अनुराग छुपा हुआ है।
भजन का मुख्य संदेश यही है कि संसार के समस्त कार्यों को करते हुए भी यदि मनुष्य का मन निरंतर ईश्वर के चरणों में लीन रहे, तो वह संसार सागर से सहज ही पार उतर जाता है। यह भजन साधक के अंतर्मन को झंकृत कर उसमें भक्ति रूपी अमृत का संचार करता है।
🔍 विशेष महत्त्व और लाभ
श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार, भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि जो भक्त निरंतर मेरा नाम संकीर्तन करते हैं, वे सदा मुझमें ही निवास करते हैं। यह भजन साधक के मन को चंचलता से मुक्त कर आध्यात्मिक साधना की ओर प्रेरित करता है।
सनातन संस्कृति के विभिन्न व्रत, उपवास और त्यौहारों की सही तिथियों के लिए सनातन कैलेंडर २०२६ तथा दैनिक पंचांग का अवलोकन अवश्य करें। इस भक्ति भजन के नियमित संकीर्तन से घर की नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है, मन शांत और प्रसन्न रहता है तथा पारिवारिक क्लेश दूर होकर शांति का उदय होता है।
🕒 साधना एवं गायन विधि
भजन संकीर्तन के लिए प्रातःकाल अथवा सायं संध्या का समय सर्वोत्तम है। एक शांत स्थान पर पूर्वाभिमुख बैठकर, भगवान की प्रतिमा के सम्मुख धूप-दीप प्रज्वलित करें और तन्मयता से संकीर्तन करें।
❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
भजन संकीर्तन का मुख्य उद्देश्य क्या है?
भजन संकीर्तन का मुख्य उद्देश्य मन को संसार की व्यर्थ की चिंताओं से हटाकर ईश्वर के ध्यान में लगाना और आत्मिक आनंद की प्राप्ति करना है।
भजनों को गाने की सही विधि क्या है?
भजनों को गाने के लिए राग-सुर से अधिक शुद्ध भाव और प्रेमपूर्ण हृदय की आवश्यकता होती है। मन में पूर्ण श्रद्धा रखकर शांत चित्त से संकीर्तन करें।
क्या सामूहिक भजन संकीर्तन अधिक फलदायी होता है?
हाँ, शास्त्रों के अनुसार सामूहिक संकीर्तन से दिव्य स्पंदन (Vibrations) उत्पन्न होते हैं, जिससे वहां उपस्थित सभी लोगों का मन शुद्ध होता है और सामाजिक एकता बढ़ती है।
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