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उपवास साधना

व्रत कैलेंडर (Vrat Calendar)

सनातन हिंदू संस्कृति में व्रत (संकल्प) और उपवास का अत्यधिक महत्व है। उपवास न केवल देवी-देवताओं की प्रसन्नता और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग है, बल्कि यह हमारे शरीर के शोधन (Detoxification) का एक अत्यंत वैज्ञानिक साधन है। आगामी सभी एकादशी एवं प्रमुख व्रतों की सूची नियम सहित देखें।

विषय: व्रत व एकादशी तिथियां धुन: सितार स्वर प्रामाणिकता: शास्त्र सम्मत

virtual सितार तरंग (Divine Sitar Harmony)

कैलेंडर देखते और संकल्प करते समय सितार के दिव्य रागों को सुनें।

आगामी पावन व्रत व एकादशी सूची

एकादशी 25 Aug 2026

श्रावण पुत्रदा एकादशी

पुत्रदा एकादशी व्रत का अत्यंत धार्मिक महत्व है।

फलाहार / उपवास नियम:

मर्यादित फलाहार (बिना अन्न)।

उपवास (Fasting) का आध्यात्मिक व वैज्ञानिक महत्व

सनातन परंपरा में केवल भोजन न करने को उपवास नहीं कहा गया है। **'उप'** का अर्थ है समीप और **'वास'** का अर्थ है रहना—अर्थात अपनी इंद्रियों और मन को संसार से हटाकर 'परमात्मा के समीप बैठना' ही वास्तविक उपवास है।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण (Scientific Autophagy): हाल ही में चिकित्सा विज्ञान के नोबेल पुरस्कार से प्रमाणित हुआ है कि जब शरीर को एक निश्चित अवधि (12 से 24 घंटे) तक भोजन नहीं मिलता, तो शरीर की स्वस्थ कोशिकाएं भीतर जमा हानिकारक रोगाणुओं, मृत कोशिकाओं और टॉक्सिन्स को खुद ही खाकर पचा देती हैं। इस जैविक प्रक्रिया को **"ऑटोफैगी" (Autophagy)** कहा जाता है। हिंदू धर्म में १५ दिनों में एक बार आने वाले एकादशी व्रत का विधान इसी कोशिकीय आरोग्यता के लिए बनाया गया है।

एकादशी व्रत के शास्त्र सम्मत प्रमुख नियम

सभी व्रतों में एकादशी व्रत को शिरोमणि माना गया है। इस व्रत को करते समय निम्नलिखित नियमों का पालन आवश्यक माना गया है:

अन्न का पूर्ण त्याग: एकादशी के दिन चावल (भात) और किसी भी प्रकार के अनाज (गेहूं, दालें आदि) का सेवन पूर्णतः वर्जित है। माना जाता है कि इस दिन पाप पुरुष अन्न में वास करते हैं।
फलाहार व सात्विक आहार: निर्जला (बिना पानी के) अथवा केवल जल और ताजे फलों (फलाहार जैसे साबूदाना, कट्टू का आटा, सेंधा नमक) पर रहकर व्रत का संकल्प करना चाहिए।
व्रत पारणा (Breaking the Fast): द्वादशी तिथि के सूर्योदय के पश्चात शुभ समय (हरिवासर समाप्त होने पर) ही व्रत का पारणा करना चाहिए। पारणा के पूर्व ब्राह्मण को दान देना शुभ माना गया है।

व्रत-उपवास सम्बन्धी सामान्य प्रश्न (FAQs)

पौराणिक मान्यता के अनुसार महर्षि मेधा के शरीर के अंश से चावल की उत्पत्ति हुई थी, इसलिए इस दिन चावल खाना जीव मांस खाने के समान माना गया है। वैज्ञानिक रूप से, चावल में पानी सोखने की क्षमता अधिक होती है, जिससे व्रत के समय शरीर में जलीय असंतुलन हो सकता है।

नहीं, शास्त्रों में स्पष्ट उल्लेख है कि वृद्ध, बीमार, गर्भवती महिलाओं और बच्चों के लिए कठोर उपवास के नियम लागू नहीं होते। वे केवल सात्विक फलाहार या दूध लेकर भी मानसिक रूप से व्रत रख सकते हैं।

सूतक या अशौच की अवस्था में शारीरिक उपवास (भोजन त्याग) रखा जा सकता है, परंतु भगवान की मूर्ति का स्पर्श, पूजा पाठ या मंदिरों में जाना वर्जित है। आप केवल मानसिक जप या प्रभु स्मरण कर सकते हैं।

संपादकीय विश्वसनीयता एवं समीक्षा जानकारी

ज्योतिषीय गणना एवं संकलन

भक्तिलोक पंचांग शोध परिषद् (Bhaktilok Panchang Council)

धार्मिक व्रत-त्यौहार की तिथि गणना एवं शास्त्र निर्देशों का प्रामाणिक मिलान करने वाली संस्था।

तथ्य-जांच व धार्मिक समीक्षा

डॉ. विकास शास्त्री (Dr. Vikas Shastri)

वैदिक संस्कृति व धार्मिक अनुष्ठान के विशेषज्ञ विद्वान। पीएचडी (वैदिक अध्ययन)।

प्रामाणिकता सत्यापित
अंतिम संशोधन: ०८ अगस्त २०२६ अध्ययन काल: ५ मिनट पढ़ें