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भगवद्गीता ज्ञान

सात्विक आहार नियोजक

"आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः" - शुद्ध आहार से चित्त की शुद्धि होती है। श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार जैसा अन्न हम खाते हैं, वैसा ही हमारा मन बनता है। सात्विक आहार शरीर को निरोगी, मन को शांत और बुद्धि को प्रखर बनाता है। ऋतु अनुकूल शुद्ध आयुर्वेदिक दिनचर्या थाली का नियोजन प्राप्त करें।

जीवन शैली: त्रिगुण सत्व संवर्धन प्रभाव: आरोग्य व मानसिक शांति

ऋतु अनुसार आयुर्वेदिक सात्विक आहार तालिका

ग्रीष्म ऋतु सात्विक थाली

गुण: शीतल, सुपाच्य, मधुर
सात्विक सामग्री (Allowed Foods):
  • ताजे फल, गाय का दूध, देशी घी, मक्खन
  • लौकी, कद्दू, तोरई, हरी पत्तेदार सब्जियां
  • मूंग दाल, सेंधा नमक, जीरा, सौंफ, मिश्री
वर्जित तामसिक सामग्री (Avoid Completely):
  • लहसुन, प्याज, मशरूम, कटहल
  • बासी भोजन (बनाने के ३ घंटे बाद का भोजन)
  • मैदा, तीखे मसाले, शराब, मांसाहार
सात्विक दिनचर्या भोजन समय (Daily Menu):
प्रातः
दलिया या ताजे फल

गाय के दूध में उबला हुआ गेहूं का दलिया व मिश्री। साथ में ताजे मौसमी फल।

दोपहर
मूंग दाल, लौकी सब्जी व चपाती

लौकी की सब्जी (घी में जीरे से छौंकी हुई), पतली मूंग दाल, गेहूं-बाजरा चपाती व छाछ।

सायं
सादी मूंग-चावल खिचड़ी

कम तेल-मसाले में पकी ताजी खिचड़ी (देशी गाय के १ चम्मच घी के साथ)। रात ८ बजे से पूर्व शयन अनुकूल।

गीता के १७वें अध्याय में वर्णित त्रिविध आहार

भगवान कृष्ण ने मनुष्य के स्वभाव के आधार पर भोजन को तीन श्रेणियों में विभाजित किया है:

१. सात्विक आहार (Sattvic)

आयु, बुद्धि, बल, आरोग्य, सुख और प्रीति को बढ़ाने वाले, रसयुक्त, चिकने तथा हृदय को प्रिय लगने वाले स्थिर आहार सात्विक कहलाते हैं। (गीता १७.८)

२. राजसिक आहार (Rajasic)

अति कड़वे, अति खट्टे, अति नमकीन, अति गरम, अति तीखे और जलन पैदा करने वाले दुःख, शोक व रोग उत्पन्न करने वाले आहार राजसिक कहलाते हैं। (गीता १७.९)

३. तामसिक आहार (Tamasic)

जो भोजन आधा पका, रसहीन, दुर्गन्धयुक्त, बासी (३ घंटे पूर्व का) और उच्छिष्ट (जूठा) है, वह भोजन तामसिक कहलाता है जो आलस्य व अज्ञान लाता है। (गीता १७.१०)

३ घंटे का 'प्राण ऊर्जा' नियम

आयुर्वेद के अनुसार पके हुए भोजन में **'प्राण' (Vital Life Force Energy)** विद्यमान होती है। पकाने के ठीक **३ घंटे के भीतर** भोजन का उपभोग कर लेना चाहिए। ३ घंटे बीत जाने पर भोजन में तामसिक तत्वों की वृद्धि होने लगती है और उसकी प्राण ऊर्जा लुप्त हो जाती है।

रेफ्रिजरेटर में रखकर दोबारा गर्म किया गया भोजन 'मृत भोजन' (Dead Food) के समान है, जो शरीर में विषाक्त पदार्थों (Amas) का संचय कर बीमारियों को बुलावा देता है। अतः सदैव ताजा व गर्म भोजन ही ग्रहण करें।

सात्विक आहार संबंधी शंका समाधान (FAQs)

प्याज और लहसुन कामोत्तेजक तथा तंत्रिका तंत्र को उत्तेजित करने वाले गुणधर्मों से युक्त होते हैं। ये मन में चंचलता, क्रोध और उत्तेजना (रजोगुण व तमोगुण) की वृद्धि करते हैं, जिससे साधक का मन ध्यान व साधना में स्थिर नहीं हो पाता। अतः आध्यात्मिक उन्नति हेतु इनका त्याग किया जाता है।

बिल्कुल नहीं। यह एक भ्रम है। गाय का दूध, देशी घी, बादाम, राजगीर, मूंग दाल, गेहूं और हरी सब्जियां अत्यंत पोषक व ओज प्रदायक होती हैं। सात्विक भोजन पचने में सुगम होता है, जिससे शरीर की ऊर्जा भोजन पचाने में नष्ट होने के बजाय मांसपेशियों व मस्तिष्क के विकास में उपयोग होती है।

संपादकीय विश्वसनीयता एवं समीक्षा जानकारी

आयुर्वेदिक पोषण व सात्विक संकलन

भक्तिलोक सात्विक परिषद् (Bhaktilok Satvik Council)

श्रीमद्भगवद्गीता के सत्रहवें अध्याय के सात्विक आहार सूत्रों का संकलन करने वाली पोषण वैज्ञानिक मंडली।

वैदिक समीक्षा व तथ्य-जांच

डॉ. हरिशंकर व्यास (Dr. Harishankar Vyas)

आयुर्वेद ग्रंथ समीक्षक व संस्कृत ग्रंथाचार्य। २५+ वर्षों का आयुर्वेदिक संहिता पठन व समीक्षा अनुभव।

सात्विक आहार नियम सत्यापित
अंतिम संशोधन: ०८ अगस्त २०२६ पठन काल: ५ मिनट पढ़ें