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देव प्रदक्षिणा

देव प्रदक्षिणा मार्गदर्शिका

"प्रदक्षिणा" – अर्थात् देव विग्रह या मंदिर के गर्भगृह की परिक्रमा करना। शास्त्रों के अनुसार, जब मंदिर में निरंतर पूजा, मंत्रोच्चार व आरती की जाती है, तो गर्भगृह के केंद्र में तीव्र सकारात्मक ऊर्जा संघनित होती है। दाहिनी ओर से क्लॉकवाइज (Clockwise) परिक्रमा करने से हमारी दाईं नाड़ी (पिंगला) सक्रिय होती है जो ब्रह्मांडीय विद्युत चुम्बकीय ऊर्जा को हमारे शरीर में अवशोषित करने में मदद करती है।

विधा: परिक्रमा व काया संरेखण नियम: शास्त्र सम्मत परिक्रमा चक्र

देवी-देवता अनुसार परिक्रमा संख्या व नियम

भगवान शिव परिक्रमा

१. शास्त्र सम्मत परिक्रमा संख्या (Count):आधी परिक्रमा (Chandrakala)
२. दिशा व शारीरिक गति नियम (Direction):0
३. मन्त्रोच्चार व मानसिक ध्यान (Mantra):0
विशेष परिक्रमा सूत्र: 0

देव प्रदक्षिणा का शारीरिक व मानसिक विज्ञान

परिक्रमा कोई अंधविश्वास या साधारण रस्म नहीं है, इसके पीछे गहरा शारीरिक विज्ञान काम करता है:

दाहिनी ओर से घूमने का रहस्य (Clockwise Magnetism)

पृथ्वी के घूर्णन और चुंबकीय बल रेखाओं के प्रभाव से हमारे शरीर में चुंबकीय तरंगे बाईं ओर से दाहिनी ओर प्रवाहित होती हैं। जब हम दाहिनी ओर से (Clockwise) परिक्रमा करते हैं, तो मंदिर की ऊर्जा हमारे शरीर के संरेखण (Alignment) के साथ एक सुर में मिलकर कुंडलिनी चक्रों को जागृत करती है।

गर्भगृह की ऊर्जा परिधि (Energy Radius of Sanctum)

मंदिर का मुख्य विग्रह जहाँ स्थापित होता है, वहाँ तांबे के पत्र दबे होते हैं जो ऊर्जा को अवशोषित व संचित करते हैं। गर्भगृह के चारों ओर १० से १५ फीट की परिधि में यह तरंग घनत्व सबसे तीव्र होता है। इस सीमा में परिक्रमा करने से हमारा आभामंडल (Aura) शुद्ध हो जाता है।

प्रदक्षिणा शंका समाधान (FAQs)

शिवलिंग पर जो जल चढ़ाया जाता है, वह जहाँ से बाहर गिरता है उस नाली या जल मार्ग को **'सोमसूत्र'** या **'जलाधारी'** कहते हैं। सोमसूत्र में अत्यधिक ऊर्जावान तरंगों का प्रवाह होता है। यदि कोई मनुष्य इसे लांघता है, तो उसके शरीर के निचले अंगों की ऊर्जा (अपान वायु) व प्रजनन अंगों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। अतः सोमसूत्र को कभी लांघना नहीं चाहिए। शिवलिंग की आधी परिक्रमा करके वापस मुड़ जाना चाहिए।

परिक्रमा करते समय **हाथों को नमस्कार मुद्रा में हृदय के समीप** जोड़कर रखना चाहिए, जिससे अनाहत चक्र सक्रिय रहे। गति अत्यंत शांत और मध्यम होनी चाहिए (जैसे एक गर्भवती स्त्री सिर पर पानी से भरा घड़ा लेकर धीरे-धीरे संतुलन बनाकर चलती है)। तेज दौड़ना या परिक्रमा के दौरान दूसरों से बातें करना शास्त्र विरुद्ध व फलहीन माना गया है।

संपादकीय विश्वसनीयता एवं समीक्षा जानकारी

कर्मकांड व शिवागम संपादन

भक्तिलोक प्रदक्षिणा शास्त्र विंग (Bhaktilok Altar Desks)

शिव पुराण, विष्णु स्मृति और लिंग पुराण के सोमसूत्र संरेखण नियमों के अनुसार परिक्रमा संख्या संकलित करने वाली विंग।

शिल्प व मंदिर स्थापत्य समीक्षा

आचार्य देवदत्त शुक्ल (Acharya Devadatta Shukla)

महानिदेशक, काशी शिल्प शास्त्र महासभा। ३३+ वर्षों का देवालय भू-चुम्बकत्व व प्रदक्षिणा पथ ऊर्जा संरेखण समीक्षा अनुभव।

परिक्रमा विधि सत्यापित
अंतिम संशोधन: ०८ अगस्त २०२६ पठन काल: ५ मिनट पढ़ें