वैदिक वर्णमाला स्वर व उच्चारण विनिर्देशन
उदात्त स्वर (Udatt)
| १. शास्त्र लक्षण (Sutra Define): | "उच्चैरुदात्तः" – पाणिनीय सूत्र। |
| २. सही उच्चारण विधि (Method): | 0 |
| ३. वैदिक संकेत चिन्ह (Veda Mark): | 0 |
| विशेष शास्त्र टिप: 0 | |
वाणी के ४ आध्यात्मिक स्तर (Four States of Speech)
सनातन तंत्र शास्त्रों के अनुसार, जो शब्द हम मुंह से बोलते हैं वह वाणी का केवल एक चौथाई भाग है। वाणी के ४ स्तर निम्नलिखित हैं:
परा वाणी: यह नाभि चक्र में स्थित शांत, अनिर्मित ऊर्जा है जो ध्यान की चरम अवस्था में अनुभव होती है।
पश्यन्ती वाणी: यह हृदय चक्र में विचारों व चित्रों के रूप में प्रकट होती है, जिसे योगी ध्यान में देख सकते हैं।
मध्यमा वाणी: यह कंठ में मानसिक फुसफुसाहट या विचारों के रूप में गूंजती है।
वैखरी वाणी: यह जीभ और होठों के हिलने से बाहर निकलने वाला भौतिक शब्द है जिसे हम कानों से सुनते हैं।
स्वर शुद्धि शंका समाधान (FAQs)
१. नीचे पड़ी क्षैतिज रेखा (Horizontal Line): यह 'अनुदात्त' स्वर (निम्न पिच) को दर्शाती है।
२. ऊपर खड़ी ऊर्ध्वाधर रेखा (Vertical Line): यह 'स्वरित' स्वर (मध्यम/तीव्र पिच) को दर्शाती है।
३. कोई रेखा न होना (No Line): यह 'उदात्त' स्वर (उच्च पिच) को दर्शाता है।
१. 'रामः' का उच्चारण 'राम-ह' होगा।
२. 'हरीः' का उच्चारण 'हरी-हि' होगा।
३. 'गुरुः' का उच्चारण 'गुरु-हु' होगा।
४. 'देवैः' का उच्चारण 'देवै-है' होगा। इस शुद्ध उच्चारण से मंत्र का प्रभाव मस्तिष्क में सही चक्र पर पड़ता है।
संपादकीय विश्वसनीयता एवं समीक्षा जानकारी
संस्कृत व्याकरण व शिक्षा शास्त्र संपादन
भक्तिलोक व्याकरण विमर्श प्रभाग (Bhaktilok Vyakarana Desk)
अष्टाध्यायी, पाणिनीय शिक्षा और वाजसनेयी प्रातिशाख्य के सूत्रों के अनुसार स्वर शुद्धि संकलन करने वाली विंग।
वेद संहिता व स्वर समीक्षा
पं. सदाशिव द्विवेदी (Pt. Sadashiv Dwivedi)
पूर्व आचार्य, वेद विभाग, काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU)। ३४+ वर्षों का शुक्ल यजुर्वेद कण्ठस्थीकरण व स्वर उच्चारण समीक्षा अनुभव।
स्वर नियम सत्यापित