दान संकल्प एवं फल मार्गदर्शक
अन्नदान व तिल दान (Annadaan)
सर्वोत्तम समय (Best Timing):अमावस्या, श्राद्ध पक्ष, संक्रांति काल।
सुयोग्य पात्र (Right Recipient):निर्धन व्यक्ति, गौशाला, अनाथालय।
भगवद्गीता के अनुसार दान के तीन प्रकार
श्रीमद्भगवद्गीता के १७वें अध्याय के २०, २१ और २२वें श्लोक में भगवान श्री कृष्ण ने दान के तीन प्रकार बताए हैं:
वह दान जो कर्तव्य समझकर, बिना किसी बदले की आशा के, उचित स्थान, समय पर और सुयोग्य व्यक्ति को दिया जाता है।
वह दान जो किसी उपकार के बदले की भावना से, अथवा प्रतिष्ठा और भविष्य में किसी लाभ की लालसा से दिया जाता है।
वह दान जो बिना किसी सत्कार के, तिरस्कारपूर्वक, अयोग्य स्थान-समय पर और कुपात्र व्यक्ति को दिया जाता है।
दान का चरम विज्ञान - "देश, काल और पात्र"
सनातन शास्त्रों में किसी भी दान का पूर्ण आध्यात्मिक फल प्राप्त करने के लिए तीन कसौटियां निर्धारित की गई हैं:
| तत्व (Element) | परिभाषा (Definition) | शास्त्रीय उदाहरण (Example) |
|---|---|---|
| १. देश (Right Place) | वह स्थान जहाँ दान की अत्यधिक आवश्यकता हो या जो पवित्र हो। | मंदिर, गौशाला, अनाथालय, अकाल पीड़ित क्षेत्र। |
| २. काल (Right Time) | वह समय जब दान का विशेष खगोलीय महत्व हो। | ग्रहण काल, एकादशी, अमावस्या, सूर्य संक्रांति काल। |
| ३. पात्र (Right Recipient) | वह व्यक्ति जो दान का सदुपयोग लोक कल्याण या स्वाध्याय में करे। | सच्चा तपस्वी, निर्धन विद्यार्थी, असहाय बीमार जीव। |
दान विधि शंका समाधान (FAQs)
संपादकीय विश्वसनीयता एवं समीक्षा जानकारी
सदाचार व शास्त्र संपादन
भक्तिलोक सदाचार समिति (Bhaktilok Dharma Council)
अथर्ववेद के दान स्तुति सूक्तों और मनुस्मृति के सदाचार नियमों के आधार पर दान विधियां संकलित करने वाली परिषद।
धर्मशास्त्रीय समीक्षा व सत्यापन
महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी (Pt. Kedarnath Tripathi)
अध्यक्ष, धर्मशास्त्र विभाग, संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय। ३०+ वर्षों का शास्त्र समीक्षा अनुभव।
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