राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga)
नौवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण सबसे गोपनीय और श्रेष्ठ ज्ञान (राजविद्या) का उपदेश देते हैं। वह बताते हैं कि कैसे वह सब व्याप्त हैं, फिर भी उनमें आसक्ति नहीं है, और कैसे साधारण भक्ति भी उन्हें प्राप्त करा सकती है।
परिचय / Introduction
कृष्ण ने पिछले अध्याय में मृत्यु के समय स्मरण का महत्व बताया। अब अध्याय ९ में वह उस ज्ञान को "राजविद्या" (सबसे श्रेष्ठ विद्या) और "राजगुह्य" (सबसे गोपनीय रहस्य) कहते हैं। यह अध्याय भक्ति के सरलतम रूप को सबसे ऊँचा स्थान देता है।
मुख्य विषय / Key Themes
ईश्वर की सर्वव्यापकता और अलिप्तता (God's Omnipresence and Detachment): कृष्ण कहते हैं कि सब कुछ उनमें स्थित है, फिर भी वे किसी में स्थित नहीं हैं। वायु की तरह सर्वत्र व्याप्त होकर भी वे असंग हैं।
सृष्टि का चक्र (The Cycle of Creation): अपनी प्रकृति के द्वारा वे बार-बार सृष्टि रचते हैं और प्रलय में सब कुछ उनमें लीन हो जाता है। लेकिन यह कर्म उन्हें बाँधता नहीं।
भक्ति का सीधा मार्ग (The Direct Path of Devotion): कोई भी व्यक्ति, चाहे वह कितना भी पापी क्यों न हो, यदि एकाग्रचित्त होकर कृष्ण की भक्ति करता है, तो वह शीघ्र ही धर्मात्मा बन जाता है।
सब कुछ अर्पण करने की शिक्षा (Teachings on Offering Everything): पत्र, पुष्प, फल, जल – जो भी प्रेम से भक्त अर्पित करता है, कृष्ण उसे प्रेमपूर्वक ग्रहण करते हैं।
सबकी समान दृष्टि (Equal Vision for All): भक्तों के प्रति कृष्ण की विशेष कृपा होती है, लेकिन वे सबमें समान रूप से स्थित हैं। सभी प्राणी उनके स्वरूप हैं।
यह अध्याय भक्ति का सबसे सरल और सुंदर रूप प्रस्तुत करता है। यह आश्वासन देता है कि भगवान तक पहुँचने के लिए न तो किसी बड़ी योग्यता की आवश्यकता है, न ही कठोर साधनाओं की। बस एक पवित्र हृदय और प्रेमपूर्ण भाव ही पर्याप्त है। This chapter reveals that the Supreme Lord is accessible to everyone through simple devotion, and that He is the ultimate refuge for all beings.
“श्री भगवान् बोले: तू निंदारहित है, इसलिये तुझको मैं विज्ञान सहित इस ज्ञान को जो कि सबसे अधिक गोपनीय है, अब कहूँगा, जिसको जानकर तू अशुभ से मुक्त हो जायेगा।”
English: The Blessed Lord said: I shall now declare to you, who does not cavil, the most profound knowledge combined with realization, having known which you will be freed from evil.
“यह (ज्ञान) राजविद्या (विद्याओं का राजा) है, राजगुह्य (रहस्यों का राजा) है, अत्यन्त पवित्र करने वाला है, उत्तम है, प्रत्यक्ष अनुभव में आने वाला है, धर्मयुक्त है, साधन में अत्यन्त सुखद है और अविनाशी है।”
English: This is the king of knowledge, the king of secrets, the supreme purifier, directly realizable, righteous, very easy to practice, and imperishable.
न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम् | भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः || ५||
“और न ही सब प्राणी मुझमें स्थित हैं (इस प्रकार समझो) – मेरे इस ऐश्वर्ययुक्त योग को देखो। मैं सब प्राणियों का धारण-पोषण करने वाला हूँ, फिर भी उनमें स्थित नहीं हूँ। मेरा आत्मा ही सब प्राणियों का उत्पादक है।”
English: Yet beings do not dwell in Me—behold My divine Yoga! I sustain all beings, yet I am not contained in them; My Self is the very source of all beings.
“हे कौन्तेय! कल्प के अन्त में सब प्राणी मेरी प्रकृति में लीन हो जाते हैं और कल्प के आरम्भ में मैं उन्हें फिर से उत्पन्न करता हूँ।”
English: At the end of a kalpa, all beings merge into My Prakriti (nature); at the beginning of the next kalpa, O son of Kunti, I send them forth again.
“हे कौन्तेय! मेरे अध्यक्ष रहने से प्रकृति चराचर सहित सम्पूर्ण जगत् को उत्पन्न करती है, और इसी कारण यह जगत् बार-बार परिवर्तित होता रहता है।”
English: Under My supervision, O son of Kunti, Prakriti gives birth to all moving and non-moving beings; and by this reason, the world goes through its cycles.
“वे व्यर्थ आशा, व्यर्थ कर्म, व्यर्थ ज्ञान वाले और विवेकहीन होते हैं, तथा राक्षसी और आसुरी मोहिनी प्रकृति को ही आश्रय किए रहते हैं।”
English: Those of vain hopes, vain actions, vain knowledge, and devoid of discrimination, are verily possessed of the delusive nature of demons and atheists.
“हे पार्थ! परन्तु महात्मा लोग दैवी प्रकृति के आश्रित होकर, मुझे सम्पूर्ण प्राणियों का आदि-कारण और अविनाशी जानकर, अनन्य मन से मेरा भजन करते हैं।”
English: But the great souls, O Partha, who are possessed of divine nature, worship Me with a single mind, knowing Me as the imperishable source of all beings.
“मैं क्रतु हूँ, मैं यज्ञ हूँ, मैं स्वधा (पितरों को दी जाने वाली वस्तु) हूँ, मैं औषधि हूँ, मैं मन्त्र हूँ, मैं आज्य (घी) हूँ, मैं अग्नि हूँ और मैं हवन हूँ।”
English: I am the ritual, I am the sacrifice, I am the offering to the ancestors, I am the herb, I am the mantra, I am the clarified butter, I am the fire, I am the oblation.
पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः | वेद्यं पवित्रमोंकार ऋक्साम यजुरेव च || १७||
“मैं इस जगत् का पिता, माता, धाता (पालनकर्ता) और पितामह हूँ; मैं जानने योग्य हूँ, पवित्रकर्ता हूँ, ओंकार हूँ तथा ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद भी हूँ।”
English: I am the father, mother, supporter and grandfather of this universe; I am the object of knowledge, the purifier, the syllable OM, and also the Rik, Sama, and Yajur Vedas.
“मैं गति (परम लक्ष्य) हूँ, भर्ता (धारण करने वाला) हूँ, प्रभु हूँ, साक्षी हूँ, निवास हूँ, शरण हूँ, सुहृत् (हितैषी) हूँ, उत्पत्ति हूँ, प्रलय हूँ, स्थान हूँ, निधान (आश्रय) हूँ और अविनाशी बीज हूँ।”
English: I am the goal, the sustainer, the Lord, the witness, the abode, the refuge, the friend, the origin, the dissolution, the foundation, the treasure, and the imperishable seed.
“तीनों वेदों को जानने वाले, सोमपान करने वाले, पापों से मुक्त हुए (कर्मकाण्डी) लोग यज्ञों द्वारा मेरी पूजा करके स्वर्ग की प्राप्ति की कामना करते हैं। वे पुण्य का फल पाकर इन्द्रलोक में प्रवेश कर वहाँ दिव्य देवताओं के भोगों को भोगते हैं।”
English: Those who study the three Vedas and drink the soma, being purified of sins, worship Me through sacrifices and pray for the heavenly goal. They reach the world of Indra and enjoy divine celestial pleasures.