राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga) – श्लोक 16
श्लोक १६ में भगवान स्वयं को यज्ञ के सभी अंगों के रूप में बताते हैं। Verse 16: The Lord is the sacrifice, the offering, the fire, etc.
संस्कृत श्लोक
अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम् | मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम् || १६||
ahaṃ kratur ahaṃ yajñaḥ svadhāham aham auṣadham | mantro 'ham aham evājyam aham agnir ahaṃ hutam ||16||
पदच्छेद / शब्दार्थ
अहम्: मैं; क्रतुः: क्रतु (वैदिक याग); अहम्: मैं; यज्ञः: यज्ञ; स्वधा: स्वधा (पितरों के लिए अन्न); अहम्: मैं; अहम्: मैं; औषधम्: औषधि; मन्त्रः: मन्त्र; अहम्: मैं; अहम्: मैं; एव: ही; आज्यम्: घी; अहम्: मैं; अग्निः: अग्नि; अहम्: मैं; हुतम्: हवन।
हिंदी अनुवाद
मैं क्रतु हूँ, मैं यज्ञ हूँ, मैं स्वधा (पितरों को दी जाने वाली वस्तु) हूँ, मैं औषधि हूँ, मैं मन्त्र हूँ, मैं आज्य (घी) हूँ, मैं अग्नि हूँ और मैं हवन हूँ।
English Translation
I am the ritual, I am the sacrifice, I am the offering to the ancestors, I am the herb, I am the mantra, I am the clarified butter, I am the fire, I am the oblation.
टीका / Commentary
यहाँ भगवान ने कहा है कि वे स्वयं सम्पूर्ण यज्ञीय प्रक्रिया के सभी अंग हैं। इससे यह भाव आता है कि यज्ञ कर्ता को भगवान की व्यापकता का बोध होना चाहिए।