राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga) – श्लोक 15

श्लोक १५ में भगवान की विविध रूपों में उपासना का वर्णन है। Verse 15: Worship through knowledge, as one, as distinct, as universal.

संस्कृत श्लोक

ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते | एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम् || १५||

jñāna-yajñena cāpy anye yajanto mām upāsate | ekatvena pṛthaktvena bahudhā viśvato-mukham ||15||

पदच्छेद / शब्दार्थ

ज्ञान-यज्ञेन: ज्ञान-यज्ञ द्वारा; च: और; अपि: भी; अन्ये: अन्य लोग; यजन्तः: यज्ञ करते हुए; माम्: मेरी; उपासते: उपासना करते हैं; एकत्वेन: एकत्व से; पृथक्त्वेन: पृथक्त्व से; बहुधा: अनेक प्रकार से; विश्वतः-मुखम्: विश्वरूप।

हिंदी अनुवाद

और अन्य लोग ज्ञान-यज्ञ द्वारा मेरी उपासना करते हैं – वे मुझे एकरूप, अनेकरूप तथा विश्वमुख (सर्वत्र व्याप्त) रूप में पूजते हैं।

English Translation

Others, offering the sacrifice of knowledge, worship Me as the one, as the distinct, and as the manifold, facing all directions.

टीका / Commentary

यहाँ भगवान की उपासना के विभिन्न दार्शनिक मार्गों का संकेत है: अद्वैत (एकत्व), विशिष्टाद्वैत (पृथक्त्व), और विश्वरूप (बहुधा विश्वतोमुख) के रूप में।