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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 9 · श्लोक 15

अध्याय 9 · श्लोक 15

राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते | एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम् || १५||

jñāna-yajñena cāpy anye yajanto mām upāsate | ekatvena pṛthaktvena bahudhā viśvato-mukham ||15||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

ज्ञान-यज्ञेन: ज्ञान-यज्ञ द्वारा; च: और; अपि: भी; अन्ये: अन्य लोग; यजन्तः: यज्ञ करते हुए; माम्: मेरी; उपासते: उपासना करते हैं; एकत्वेन: एकत्व से; पृथक्त्वेन: पृथक्त्व से; बहुधा: अनेक प्रकार से; विश्वतः-मुखम्: विश्वरूप।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

और अन्य लोग ज्ञान-यज्ञ द्वारा मेरी उपासना करते हैं – वे मुझे एकरूप, अनेकरूप तथा विश्वमुख (सर्वत्र व्याप्त) रूप में पूजते हैं।

English Translation

Others, offering the sacrifice of knowledge, worship Me as the one, as the distinct, and as the manifold, facing all directions.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

यहाँ भगवान की उपासना के विभिन्न दार्शनिक मार्गों का संकेत है: अद्वैत (एकत्व), विशिष्टाद्वैत (पृथक्त्व), और विश्वरूप (बहुधा विश्वतोमुख) के रूप में।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।