राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga) – श्लोक 14

श्लोक १४ में महात्माओं की भक्ति के विभिन्न रूपों का वर्णन है। Verse 14: The different practices of devotees are described.

संस्कृत श्लोक

सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः | नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते || १४||

satataṃ kīrtayanto māṃ yatantaś ca dṛḍha-vratāḥ | namasyantaś ca māṃ bhaktyā nitya-yuktā upāsate ||14||

पदच्छेद / शब्दार्थ

सततम्: निरन्तर; कीर्तयन्तः: कीर्तन करते हुए; माम्: मेरा; यतन्तः: प्रयत्न करते हुए; च: और; दृढ-व्रताः: दृढ़ व्रत वाले; नमस्यन्तः: नमस्कार करते हुए; च: और; माम्: मुझे; भक्त्या: भक्ति से; नित्य-युक्ताः: नित्ययुक्त; उपासते: उपासना करते हैं।

हिंदी अनुवाद

निरन्तर मेरा कीर्तन करते हुए, दृढ़ व्रत वाले और यत्नशील होकर, तथा भक्तिपूर्वक मुझे नमस्कार करते हुए, वे नित्ययुक्त होकर मेरी उपासना करते हैं।

English Translation

Always chanting My glories, striving with firm resolve, and bowing down to Me with devotion, they are ever-engaged in My worship.

टीका / Commentary

महात्माओं के भक्ति के विभिन्न अंगों का वर्णन – कीर्तन, प्रयत्न, दृढ़ व्रत, नमस्कार, नित्ययुक्त होकर उपासना। यह नवधा भक्ति के कुछ अंग हैं।