राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga) – श्लोक 13
श्लोक १३ में महात्माओं के लक्षण बताए गए हैं जो भगवान को जानकर भजते हैं। Verse 13: Great souls worship the Lord with single-minded devotion.
संस्कृत श्लोक
महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः | भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम् || १३||
mahātmānas tu māṃ pārtha daivīṃ prakṛtim āśritāḥ | bhajanty ananya-manaso jñātvā bhūtādim avyayam ||13||
पदच्छेद / शब्दार्थ
महात्मानः: महात्मा लोग; तु: तो; माम्: मुझे; पार्थ: हे पार्थ (अर्जुन); दैवीम्: दैवी; प्रकृतिम्: प्रकृति; आश्रिताः: आश्रित होकर; भजन्ति: भजते हैं; अनन्य-मनसः: अनन्य मन वाले; ज्ञात्वा: जानकर; भूत-आदिम्: भूतों का आदि कारण; अव्ययम्: अविनाशी।
हिंदी अनुवाद
हे पार्थ! परन्तु महात्मा लोग दैवी प्रकृति के आश्रित होकर, मुझे सम्पूर्ण प्राणियों का आदि-कारण और अविनाशी जानकर, अनन्य मन से मेरा भजन करते हैं।
English Translation
But the great souls, O Partha, who are possessed of divine nature, worship Me with a single mind, knowing Me as the imperishable source of all beings.
टीका / Commentary
इसके विपरीत, महात्मा लोग दैवी प्रकृति के होते हैं और भगवान को सबका मूल कारण जानकर अनन्य भाव से भजते हैं। यहाँ दैवी प्रकृति का अर्थ सात्त्विक गुणों की प्रधानता है।