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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 9 · श्लोक 12

अध्याय 9 · श्लोक 12

राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः | राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः || १२||

moghāśā mogha-karmāṇo mogha-jñānā vicetasaḥ | rākṣasīm āsurīṃ caiva prakṛtiṃ mohinīṃ śritāḥ ||12||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

मोघ-आशाः: व्यर्थ आशा वाले; मोघ-कर्माणः: व्यर्थ कर्म वाले; मोघ-ज्ञानाः: व्यर्थ ज्ञान वाले; विचेतसः: विवेकहीन; राक्षसीम्: राक्षसी; आसुरीम्: आसुरी; च: और; एव: ही; प्रकृतिम्: प्रकृति; मोहिनीम्: मोहिनी (मोहित करने वाली); श्रिताः: आश्रित हुए।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

वे व्यर्थ आशा, व्यर्थ कर्म, व्यर्थ ज्ञान वाले और विवेकहीन होते हैं, तथा राक्षसी और आसुरी मोहिनी प्रकृति को ही आश्रय किए रहते हैं।

English Translation

Those of vain hopes, vain actions, vain knowledge, and devoid of discrimination, are verily possessed of the delusive nature of demons and atheists.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

पिछले श्लोक में वर्णित मूढ़ों की विशेषता बताई गई है। उनकी सारी आशाएँ, कर्म और ज्ञान व्यर्थ होते हैं क्योंकि वे भगवान को नहीं पहचानते। वे आसुरी प्रवृत्ति के अधीन होते हैं।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।