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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 9 · श्लोक 11

अध्याय 9 · श्लोक 11

राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् | परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् || ११||

avajānanti māṃ mūḍhā mānuṣīṃ tanum āśritam | paraṃ bhāvam ajānanto mama bhūta-maheśvaram ||11||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

अवजानन्ति: तिरस्कार करते हैं; माम्: मुझे; मूढाः: मूर्ख लोग; मानुषीम्: मनुष्य-रूपी; तनुम्: शरीर; आश्रितम्: धारण किए हुए; परम्: परम; भावम्: भाव (स्वरूप); अजानन्तः: न जानते हुए; मम: मेरा; भूत-महेश्वरम्: सम्पूर्ण प्राणियों का महान ईश्वर।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

मूढ़ लोग मुझे मनुष्य रूप में धारण किये हुए (देखकर) तिरस्कार करते हैं। वे सम्पूर्ण भूतों के महेश्वर मेरे परम भाव को नहीं जानते।

English Translation

Fools disregard Me, thinking that I have assumed this human form, not knowing My supreme nature as the great Lord of all beings.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

जब भगवान साकार रूप में अवतार लेते हैं, तो अज्ञानी लोग उन्हें साधारण मनुष्य समझकर उनका अपमान करते हैं। वे यह नहीं जानते कि वही सबके स्वामी हैं।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।