राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga) – श्लोक 10
श्लोक १० में भगवान प्रकृति के अध्यक्ष के रूप में जगत् के संचालन की व्याख्या करते हैं। Verse 10: The Lord supervises the workings of nature.
संस्कृत श्लोक
मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् | हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते || १०||
mayādhyakṣeṇa prakṛtiḥ sūyate sacarācaram | hetunānena kaunteya jagad viparivartate ||10||
पदच्छेद / शब्दार्थ
मया: मेरे द्वारा; अध्यक्षेण: अध्यक्ष रूप से; प्रकृतिः: प्रकृति; सूयते: उत्पन्न करती है; स-चर-अचरम्: चर और अचर सहित; हेतुना: कारण से; अनेन: इस; कौन्तेय: हे कुन्तीपुत्र; जगत्: जगत्; विपरिवर्तते: परिवर्तित होता है।
हिंदी अनुवाद
हे कौन्तेय! मेरे अध्यक्ष रहने से प्रकृति चराचर सहित सम्पूर्ण जगत् को उत्पन्न करती है, और इसी कारण यह जगत् बार-बार परिवर्तित होता रहता है।
English Translation
Under My supervision, O son of Kunti, Prakriti gives birth to all moving and non-moving beings; and by this reason, the world goes through its cycles.
टीका / Commentary
प्रकृति या माया ईश्वर के अधीन है। ईश्वर की देख-रेख में ही प्रकृति सृष्टि, स्थिति और प्रलय करती है। यह चक्र अनवरत चलता रहता है।