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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 9 · श्लोक 9

अध्याय 9 · श्लोक 9

राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय | उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु || ९||

na ca māṃ tāni karmāṇi nibadhnanti dhanañjaya | udāsīna-vad āsīnam asaktaṃ teṣu karmasu ||9||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

न: नहीं; च: और; माम्: मुझे; तानि: वे; कर्माणि: कर्म; निबध्नन्ति: बाँधते हैं; धनञ्जय: हे धनञ्जय (अर्जुन); उदासीन-वत्: उदासीन के समान; आसीनम्: स्थित; असक्तम्: आसक्ति रहित; तेषु: उनमें; कर्मसु: कर्मों में।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

हे धनञ्जय! वे कर्म मुझे नहीं बाँधते, क्योंकि मैं उन कर्मों में आसक्ति रहित, उदासीन के समान स्थित हूँ।

English Translation

O Dhananjaya, these actions do not bind Me, for I remain like one indifferent, unattached to those actions.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

भगवान सृष्टि के कर्ता होते हुए भी उनसे अनासक्त रहते हैं। वे कर्मों के फल से प्रभावित नहीं होते। यही ईश्वर की निर्लिप्तता है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।