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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 9 · श्लोक 8

अध्याय 9 · श्लोक 8

राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः | भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात् || ८||

prakṛtiṃ svām avaṣṭabhya visṛjāmi punaḥ punaḥ | bhūta-grāmam imaṃ kṛtsnam avaśaṃ prakṛter vaśāt ||8||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

प्रकृतिम्: प्रकृति; स्वाम्: अपनी; अवष्टभ्य: अधीन करके; विसृजामि: उत्पन्न करता हूँ; पुनः पुनः: बार-बार; भूत-ग्रामम्: सम्पूर्ण प्राणियों के समूह; इमम्: इस; कृत्स्नम्: समस्त; अवशम्: विवश; प्रकृतेः: प्रकृति के; वशात्: वश में होने से।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

अपनी प्रकृति को अधीन करके मैं इस समस्त प्राणी-समूह को बार-बार उत्पन्न करता हूँ, जो प्रकृति के वश में होने से विवश होता है।

English Translation

Keeping My Prakriti under control, I send forth again and again this entire multitude of beings, helpless under the sway of Prakriti.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

भगवान प्रकृति के नियन्ता हैं। वे प्रकृति की सहायता से सृष्टि करते हैं। प्राणी प्रकृति के गुणों से बंधे होते हैं, इसलिए अवश होते हैं। भगवान उनकी सृष्टि करते हैं, लेकिन वे स्वयं बंधन में नहीं आते।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।