श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 9 (राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga))

अध्याय 9 · श्लोक 8

राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 34 40 मिनट का पठन 145 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः | भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात् || ८||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

11 पद
प्रकृतिम्
प्रकृति
स्वाम्
अपनी
अवष्टभ्य
अधीन करके
विसृजामि
उत्पन्न करता हूँ
पुनः पुनः
बार-बार
भूत-ग्रामम्
सम्पूर्ण प्राणियों के समूह
इमम्
इस
कृत्स्नम्
समस्त
अवशम्
विवश
प्रकृतेः
प्रकृति के
वशात्
वश में होने से।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

अपनी प्रकृति को अधीन करके मैं इस समस्त प्राणी-समूह को बार-बार उत्पन्न करता हूँ, जो प्रकृति के वश में होने से विवश होता है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

श्रीमद्भगवद्गीता के नवम अध्याय (राजविद्याराजगुह्ययोग) के इस परम रहस्यमय श्लोक का शास्त्रीय, दार्शनिक और व्यापक विश्लेषणात्मक अध्ययन।

प्रस्तावना: सृष्टि का महाचक्र और परमेश्वर की अमोघ शक्ति

सनातन संस्कृति और वैदिक दर्शन में 'श्रीमद्भगवद्गीता' को समस्त उपनिषदों का सार माना गया है। भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को निमित्त बनाकर दिया गया यह उपदेश संपूर्ण मानवता के लिए एक मार्गदर्शिका है। भगवद्गीता के नवम अध्याय, जिसे 'राजविद्याराजगुह्ययोग' की संज्ञा दी गई है, उसमें भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी अचिंत्य ऐश्वर्य शक्ति और प्रकृति के संबंधों का अत्यंत सूक्ष्म एवं वैज्ञानिक विवेचन किया है। प्रस्तुत श्लोक—"प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः..."—इस अध्याय का एक केंद्रीय और अत्यंत गहरा दार्शनिक स्तंभ है।

इस श्लोक के माध्यम से भगवान यह स्पष्ट करते हैं कि संपूर्ण ब्रह्मांड की रचना, उसका संचालन और उसका प्रलय किस प्रकार होता है। सामान्य मनुष्य इस संसार को देखकर भ्रमित हो जाता है और सोचता है कि यह प्रकृति अपने आप चल रही है या फिर भौतिकवादी नियमों के अधीन है। परंतु वेदांत का उद्घोष है कि प्रकृति जड़ है और चेतन ईश्वर के बिना जड़ में गतिशीलता नहीं आ सकती। भगवान अपनी योगमाया के द्वारा प्रकृति को अपने वध में रखकर बार-बार इस चराचर जगत की रचना करते हैं। यहाँ यह समझना अनिवार्य है कि ईश्वर सृष्टि की रचना तो करते हैं, किंतु वे इस रचना के कर्म-बंधनों से पूरी तरह परे (असंसक्त) रहते हैं।

सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि मनुष्य भले ही अपनी इच्छाओं और कर्मों के कारण प्रकृति के गुणों (सत्व, रज, तम) के अधीन होकर विवश रहता है, परंतु भगवान का शरण लेने मात्र से इस विवशता और अविद्या के आवरण को तोड़ा जा सकता है। भवतलोक (Bhaktilok.in) के इस पावन मंच पर हम इसी श्लोक के अंतरंग रहस्यों, उसके व्याकरणिक पक्षों और दैनिक साधना में इसके महत्व को विस्तार से समझेंगे, ताकि साधक का जीवन कृतार्थ हो सके।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

वैदिक परंपरा और पाठ शुद्धि के अनुसार श्रीमद्भगवद्गीता के नवम अध्याय के इस आठवें श्लोक का सस्वर पाठ करने से मन में एकाग्रता और भक्ति भाव का संचार होता है। आइए, इसका शुद्ध उच्चारण और पाठ विधि समझें:

॥ अथ श्रीमद्भगवद्गीता नवमोऽध्यायः (राजविद्याराजगुह्ययोग) ॥

प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः।

भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात् ॥ ८॥


उच्चारण संकेत: 'प्रकृतिं' को अनुस्वार के साथ, 'अवष्टभ्य' को स्पष्ट ट-वर्ग के उच्चारण के साथ, तथा 'कृत्स्नमवशम्' का उच्चारण अत्यंत सावधानी से करना चाहिए।

श्लोक पाठ की सरल विधि एवं अनुष्ठानिक नियम:

  • स्थान शुद्धि: प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में या संध्याकाल में शांत, पवित्र और स्वच्छ स्थान पर आसन बिछाकर बैठें।
  • मानसिक तैयारी: पाठ आरंभ करने से पूर्व श्री गणेश, गुरुदेव और भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण करें। तीन बार प्राणायाम करके मन को स्थिर करें।
  • सस्वर पाठ: इस श्लोक का कम से कम 11 बार या 108 बार (एक माला) जप करने से विशेष मानसिक शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा की प्राप्ति होती है।
  • भाव शुद्धि: पाठ के दौरान यह भावना रखें कि संसार के सभी जीव प्रकृति के नियमों से बंधे हैं, किंतु भगवान ही एकमात्र इनसे मुक्त कराने वाले तारणहार हैं।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

गीता के प्रत्येक शब्द में अनंत ज्ञान का सागर छिपा है। इस श्लोक के प्रत्येक पद का व्याकरणिक अर्थ और उसका दार्शनिक मर्म निम्नलिखित तालिका में प्रस्तुत है:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
प्रकृतिम् अपनी प्रकृति को (माया शक्ति को) यह भगवान की अपरा प्रकृति (माया) है, जो त्रिगुणात्मक (सत्व, रज, तम) है और संपूर्ण ब्रह्मांड का उपादान कारण है।
स्वाम् अपनी यह स्पष्ट करता है कि प्रकृति कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं है, बल्कि यह स्वयं परमात्मा की अपनी अंतरंगा या बहिरंगा शक्ति (योगमाया) है।
अवष्टभ्य वशीभूत करके / स्वीकार करके / दबाकर भगवान प्रकृति पर पूर्ण नियंत्रण रखते हैं। प्रकृति भगवान के इशारे पर नाचती है, प्रकृति भगवान पर हावी नहीं होती।
विसृजामि रचना करता हूँ / प्रकट करता हूँ सृष्टि का सृजन कोई स्वचालित या यांत्रिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि चेतन परमात्मा की संकल्प शक्ति द्वारा इसका प्रकटीकरण होता है।
पुनः पुनः बार-बार यह कल्प-कल्प और महाप्रलय के बाद सृष्टि के अनन्त चक्र (सृष्टि, स्थिति, प्रलय) के निरंतर प्रवाह को दर्शाता है।
भूतग्रामम् प्राणियों के समुदाय को / समस्त जीव-समूह को चराचर जगत के अनगिनत जीव, देवता, मनुष्य, पशु, पक्षी और स्थावर (वृक्ष-पर्वत आदि) सभी इस समूह में सम्मिलित हैं।
इमम् इस वर्तमान में हमारे सामने दृश्यमान और अनुभव में आने वाले संपूर्ण भौतिक एवं सूक्ष्म जगत की ओर संकेत है।
कृत्स्नम् संपूर्ण / समस्त रूप से बिना किसी अपवाद के, ब्रह्मांड के हर एक छोटे से बड़े जीव को इस रचना चक्र के अंतर्गत लिया गया है।
अवशम् परवश /तंत्रहीन / असहाय जीव अपने प्राचीन कर्मों और प्रकृति के गुणों से बंधा होने के कारण अपनी इच्छा से स्वतंत्र नहीं है, बल्कि परवश है।
प्रकृतेः वशात् प्रकृति के अधीन होने के कारण त्रिगुणात्मक प्रकृति (माया) के प्रभाव और उसके नियमों (कर्मफल) के कारण जीव बार-बार जन्म और मृत्यु के चक्र में फँसता रहता है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

श्रीमद्भगवद्गीता के इस श्लोक की पृष्ठभूमि महाभारत के युद्ध के ठीक पहले कुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र से जुड़ी हुई है। जब पांडવ पुत्र अर्जुन अपने स्वजनों को सामने देखकर मोहग्रस्त हो जाते हैं और उनके हाथ से गांडीव धनुष छूटने लगता है, तब भगवान श्रीकृष्ण उन्हें जीवन, मरण, कर्तव्य और परम सत्य का बोध कराने के लिए गीता का यह दिव्य ज्ञान प्रदान करते हैं।

वैदिक और पौराणिक साहित्यों (विशेषकर श्रीमद्भागवत महापुराण, विष्णु पुराण और उपनिषदों) में इस बात का बार-बार उल्लेख मिलता है कि इस संपूर्ण ब्रह्मांड की उत्पत्ति का रहस्य अत्यंत गूढ़ है। महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित महाभारत के भीष्म पर्व के अंतर्गत आने वाली भगवद्गीता हमें यह सिखाती है कि मनुष्य का वास्तविक स्वरूप आत्मा है, जो अमर और नित्य है, किंतु वह अज्ञानता वश प्रकृति के बंधनों में जकड़ा रहता है।

वेदों और उपनिषदों में सृष्टि का संदर्भ:

श्वेताश्वतर उपनिषद और मुण्डक उपनिषद में भी इस बात की पुष्टि की गई है कि माया शक्ति (प्रकृति) भगवान की ही शक्ति है। भगवान इसके निर्देशक हैं। जिस प्रकार एक मकड़ी अपने भीतर से जाल निकालती है और फिर उसे समेट लेती है, उसी प्रकार भगवान अपनी प्रकृति के माध्यम से इस जगत की रचना करते हैं और अंत में इसका संहार करते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में भगवान सर्वथा निर्लिप्त और उदासीन रहते हैं। वे सूर्य के समान हैं जो संसार के सभी अच्छे-बुरे कर्मों पर प्रकाश डालता है, किंतु स्वयं किसी भी कर्म से दूषित नहीं होता।

यही कारण है कि व्यासपीठ और प्राचीन आचार्यों ने इस श्लोक को 'राजगुह्य' यानी राजाओं के समान गोपनीय और सबसे श्रेष्ठ ज्ञान माना है। जो साधक इस दार्शनिक पृष्ठभूमि को समझ लेता है, वह संसार के प्रपंचों और उतार-चढ़ाव में विचलित नहीं होता, बल्कि हर परिस्थिति में भगवान की शरण में रहकर शांतचित्त रहता है.

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ (Spiritual Benefits)

श्रीमद्भगवद्गीता के नवम अध्याय के इस श्लोक का नियमित मनन, पाठन और स्मरण करने से साधक के जीवन में अभूतपूर्व सकारात्मक परिवर्तन आते हैं। इसके प्रमुख आध्यात्मिक और मानसिक लाभ निम्नलिखित हैं:

1. मानसिक शांति और स्थिरता

संसार की उथल-पुथल और तनाव के बीच इस श्लोक का स्मरण करने से मन को यह अगाध शांति मिलती है कि सब कुछ एक सर्वोच्च नियम और भगवान की देखरेख में हो रहा है।

2. प्रकृति के गुणों पर विजय (गुणतीत होना)

यह बोध होता है कि जीव प्रकृति के गुणों (सत्व, रज, तम) के कारण परवश है। इस ज्ञान से साधक त्रिगुणातीत होने की दिशा में अग्रसर होता है और विकारों से ऊपर उठता है।

3. कर्म बंधनों से मुक्ति

जब साधक यह समझ जाता है कि भगवान कर्ता होकर भी अकर्ता हैं, तो वह भी अपने कर्मों को भगवान को समर्पित करना सीख जाता है, जिससे उसके कर्म-बंधन कट जाते हैं।

4. सकारात्मक ऊर्जा और औरा (Aura) का विकास

वैदिक मंत्रों और गीता के श्लोकों के नियमित उच्चारण से शरीर के सूक्ष्म ऊर्जा चक्र (चक्रों) संतुलित होते हैं और आसपास एक सकारात्मक व सुरक्षात्मक आवरण बनता है।

5. भगवान के प्रति अनन्य भक्ति (राजविद्या)

इस श्लोक से भगवान के ऐश्वर्य और प्रभुत्व का साक्षात्कार होता है, जिससे हृदय में उनके प्रति अनन्य प्रेम, श्रद्धा और भक्ति भाव प्रगाढ़ होता है।

6. अहंकार का शमन

जब यह ज्ञात होता है कि संपूर्ण प्राणी समूह प्रकृति के वश में है और ईश्वर ही सब कुछ संचालित कर रहे हैं, तो व्यक्ति का झूठा अहम् ('मैं सब कुछ करने वाला हूँ') स्वतः समाप्त हो जाता है।

7. निर्णय लेने की क्षमता में वृद्धि

आध्यात्मिक स्पष्टता मिलने से जीवन के बड़े से बड़े संकटों और दुविधाओं में भी सही निर्णय लेने की आंतरिक बुद्धि (विवेक) जागृत होती है।

8. मोक्ष और परम शांति का मार्ग

जन्म-मृत्यु के इस अंतहीन चक्र से छूटने का मार्ग केवल ईश्वर की शरण में जाकर ही मिलता है, जिसका प्रत्यक्ष संकेत इस श्लोक में निहित है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

Bhaktilok.in पर प्रस्तुत यह आलेख पारंपरिक वेदान्त दर्शन, श्रीमद्भगवद्गीता के प्रामाणिक भाष्यों (जैसे आदि शंकराचार्य, स्वामी रामसुखदास जी और स्वामी गीतानंद जी के दृष्टिकोण) तथा संस्कृत व्याकरण के नियमों के आधार पर संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है। हमारा उद्देश्य सनातन धर्म के मूल ग्रंथों के गूढ़ रहस्यों को आधुनिक पाठकों तक अत्यंत सरल, स्पष्ट और शुद्ध हिंदी भाषा में पहुँचाना है। इस सामग्री को तैयार करते समय प्रामाणिकता, गरिमा और शैक्षणिक उत्कृष्टता का पूर्ण ध्यान रखा गया है, ताकि साधक बिना किसी भ्रम के सही आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त कर सकें।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

उत्तर: इस श्लोक का मुख्य संदेश यह है कि भगवान श्रीकृष्ण अपनी योगमाया (प्रकृति) को अपने नियंत्रण में रखकर इस चराचर जगत की रचना बार-बार करते हैं। जीव अपने कर्मों और प्रकृति के गुणों के कारण परवश होते हैं, किंतु भगवान इस सृष्टि की रचना करते हुए भी स्वयं इसके कर्म-बंधनों से पूरी तरह मुक्त और अलिप्त रहते हैं।

उत्तर: इसका अर्थ है कि इस संसार के अधिकांश जीव अपनी इच्छाओं, वासनाओं और त्रिगुणात्मक प्रकृति (सत्व, रज, तम) के नियमों से बंधे होने के कारण स्वतंत्र नहीं हैं, बल्कि परवश (असमर्थ/अधीन) हैं। वे प्रकृति के अनुसार ही जन्म, कर्म और मृत्यु के चक्र में घूमते रहते हैं।

उत्तर: बिल्कुल नहीं। गीता के अन्य अध्यायों में भी भगवान ने स्पष्ट किया है कि वे इस सृष्टि की रचना और संचालन करते हैं, फिर भी वे उदासीन के समान रहते हैं और कर्मों के फलों से बंधते नहीं हैं। सूर्य जैसे पूरी दुनिया को प्रकाशित करता है पर सूर्य पर कोई दाग नहीं लगता, वैसे ही भगवान भी निर्लिप्त रहते हैं।

उत्तर: इसके नियमित पाठ और मनन से मन में अगाध शांति मिलती है, जीवन के प्रति दृष्टिकोण दार्शनिक बनता है, अनावश्यक अहंकार समाप्त होता है और कठिन परिस्थितियों में भी व्यक्ति मानसिक रूप से स्थिर और संतुलित बना रहता है।

उत्तर: यह श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के नवम (9वें) अध्याय के अंतर्गत आता है। इस अध्याय का नाम 'राजविद्याराजगुह्ययोग' है, जिसमें भगवान ने सबसे गोपनीय और श्रेष्ठ विद्या का वर्णन किया है।

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हरिः ॐ तत्सत्।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

अपनी प्रकृति को अधीन करके मैं इस सम्पूर्ण प्राणी-समूह को बार-बार उत्पन्न करता हूँ, जो प्रकृति के वश में होने से विवश है।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

ईश्वर सृष्टि के कर्ता हैं, किन्तु वे प्रकृति से परे हैं। जीव प्रकृति से बंधा है, इसलिए उसे जन्म-मृत्यु के चक्र में पड़ना पड़ता है। ईश्वर की शरण में जाकर ही इस बंधन से मुक्ति मिल सकती है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 9: राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 8 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 8/34 24% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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