राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga) – श्लोक 8
श्लोक ८ में भगवान प्रकृति के नियन्ता के रूप में सृष्टि करते हैं। Verse 8: The Lord creates through His Prakriti.
संस्कृत श्लोक
प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः | भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात् || ८||
prakṛtiṃ svām avaṣṭabhya visṛjāmi punaḥ punaḥ | bhūta-grāmam imaṃ kṛtsnam avaśaṃ prakṛter vaśāt ||8||
पदच्छेद / शब्दार्थ
प्रकृतिम्: प्रकृति; स्वाम्: अपनी; अवष्टभ्य: अधीन करके; विसृजामि: उत्पन्न करता हूँ; पुनः पुनः: बार-बार; भूत-ग्रामम्: सम्पूर्ण प्राणियों के समूह; इमम्: इस; कृत्स्नम्: समस्त; अवशम्: विवश; प्रकृतेः: प्रकृति के; वशात्: वश में होने से।
हिंदी अनुवाद
अपनी प्रकृति को अधीन करके मैं इस समस्त प्राणी-समूह को बार-बार उत्पन्न करता हूँ, जो प्रकृति के वश में होने से विवश होता है।
English Translation
Keeping My Prakriti under control, I send forth again and again this entire multitude of beings, helpless under the sway of Prakriti.
टीका / Commentary
भगवान प्रकृति के नियन्ता हैं। वे प्रकृति की सहायता से सृष्टि करते हैं। प्राणी प्रकृति के गुणों से बंधे होते हैं, इसलिए अवश होते हैं। भगवान उनकी सृष्टि करते हैं, लेकिन वे स्वयं बंधन में नहीं आते।