श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 9 (राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga))

अध्याय 9 · श्लोक 7

राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 34 51 मिनट का पठन 172 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् | कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम् || ७||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

11 पद
सर्व-भूतानि
सम्पूर्ण प्राणी
कौन्तेय
हे कुन्तीपुत्र
प्रकृतिम्
प्रकृति में
यान्ति
चले जाते हैं
मामिकाम्
मेरी
कल्प-क्षये
कल्प के अन्त में
पुनः
फिर
तानि
उन्हें
कल्प-आदौ
कल्प के आरम्भ में
विसृजामि
उत्पन्न करता हूँ
अहम्
मैं।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

हे कौन्तेय! कल्प के अन्त में सब प्राणी मेरी प्रकृति में लीन हो जाते हैं और कल्प के आरम्भ में मैं उन्हें फिर से उत्पन्न करता हूँ।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आध्यात्मिक प्रस्तावना, सांस्कृतिक महत्व और ब्रह्मांडीय परिप्रेक्ष्य

सनातन धर्म और भारतीय दर्शन में सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति और लय (प्रलय) का चक्र एक शाश्वत और निरंतर चलने वाली प्रक्रिया माना गया है। श्रीमद्भगवद्गीता के नवम अध्याय के सप्तम श्लोक "सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् | कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम् ||" में भगवान श्रीकृष्ण ने इसी विराट ब्रह्मांडीय चक्र का अत्यंत गूढ़ और वैज्ञानिक सत्य उजागर किया है। यह श्लोक केवल एक धार्मिक कथन नहीं है, बल्कि यह भौतिकी, अध्यात्म और खगोल विज्ञान का एक ऐसा अद्भुत संगम है, जो आधुनिक विज्ञान के ब्लैक होल, बिग बैंग और ब्रह्मांड के विस्तार (Expansion and Contraction of Universe) के सिद्धांतों के साथ गहराई से मेल खाता है।

भक्तिलोक (Bhaktilok.in) के इस विशेष अध्ययन में हम वेदों, उपनिषदों और पुराणों के संदर्भ में इस श्लोक की तह तक जाएंगे। जब हम 'कल्पक्षये' (प्रलय के समय) और 'कल्पादौ' (सृष्टि के आरंभ में) जैसे शब्दों पर विचार करते हैं, तो हमें यह बोध होता है कि यह संपूर्ण भौतिक जगत, जिसमें हम और हमारे जैसे अरबों जीव निवास करते हैं, भगवान की परा और अपरा प्रकृति का एक सूक्ष्म विस्तार मात्र है। इस श्लोक का सांस्कृतिक महत्व इस बात में निहित है कि यह मनुष्य को उसके अहंकार से मुक्त करता है। जब साधक यह समझ लेता है कि इस संपूर्ण चराचर जगत का ताना-बाना भगवान की महाप्रकृति के अधीन है, तो उसके मन में सांसारिक मोह-माया के प्रति आसक्ति कम होने लगती है और परमेश्वर के चरणों में अनन्य भक्ति का उदय होता है।

भारतीय सनातन परंपरा में काल (Time) को चक्रीय (Cyclical) माना गया है, न कि रेखीय (Linear)। पश्चिमी दर्शन जहां समय को एक दिशा में चलने वाली सीधी रेखा मानता है, वहीं हमारे शास्त्रों ने इसे कल्प, मन्वंतर, महायुग और युगों के चक्र के रूप में परिभाषित किया है। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को 'कौन्तेय' (कुंती पुत्र) कहकर संबोधित करते हैं और उन्हें यह विश्वास दिलाते हैं कि इस महान ब्रह्मांडीय नाटक के रचयिता, पालक और संहारक स्वयं वही हैं। इस श्लोक का नियमित पठन और मनन करने से मानव मस्तिष्क में एक ऐसी सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है जो जीवन की अनिश्चितताओं और दुखों से पार पाने की असीम शक्ति प्रदान करती है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक एवं संदर्भ

श्रीमद्भगवद्गीता — नवम अध्याय (राजविद्याराजगुह्ययोग) — श्लोक संख्या ७

सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम्|
कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम् || ७ ||

श्लोक का सरल एवं स्पष्ट उच्चारण (Roman Transliteration):

sarvabhūtāni kaunteya prakṛtiṁ yānti māmikām |
kalpakṣaye punastāni kalpādau visṛjāmyaham || 7 ||

भक्तिमय निर्देश: इस श्लोक का पाठ प्रतिदिन प्रातःकाल स्नान के पश्चात पूर्व दिशा की ओर मुख करके शुद्ध आसन पर बैठकर करना चाहिए। उच्चारण करते समय प्रत्येक शब्द के दीर्घ और ह्रस्व स्वरों का विशेष ध्यान रखें, ताकि वाणी और श्वास में एकाग्रता स्थापित हो सके।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

इस श्लोक के प्रत्येक पद में वेदों और वेदांत का सार छिपा है। आइए, व्याकरण और दार्शनिक दृष्टिकोण से इसके प्रत्येक शब्द का विश्लेषण करते हैं:

पद / शब्द (Sanskrit Term) सरल हिंदी अर्थ (Literal Meaning) आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ (Spiritual Implication)
सर्वभूतानि समस्त जीव-समुदाय या प्राणी ब्रह्मांड के सभी स्थावर (पेड़-पौधे) और जंगम (चलने-फिरने वाले) जीव, देवता, मनुष्य, पशु-पक्षी आदि।
कौन्तेय हे कुंतीपुत्र अर्जुन! अर्जुन को संबोधित करते हुए भगवान उन्हें उनके पराक्रमी कुल और माता कुंती के महान संस्कारों की याद दिलाते हैं।
प्रकृतिम् स्वभाव, माया या शक्ति भगवान की त्रिगुणात्मक (सत्, रज, तम) माया अथवा उनकी अपनी सामर्थ्य स्वरूपा अपरा प्रकृति।
यान्ति प्राप्त होती हैं, लीन हो जाती हैं प्रलयकाल आने पर समस्त भौतिक जगत और जीव अपनी स्थूल अवस्था को छोड़कर सूक्ष्म रूप में विलीन हो जाते हैं।
मामिकाम् मेरी (मेरी ही प्रकृति को) यह स्पष्ट किया गया है कि प्रकृति कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं है, बल्कि यह सीधे परमेश्वर के अधीन और उन्हीं की शक्ति है।
कल्पक्षये कल्प के अंत में (प्रलयकाल में) ब्रह्मा का एक दिन (चतुर्युगों के 1000 चक्र) पूरा होने पर होने वाला महाप्रलय या संहार का समय।
पुनः फिर से, दुबारा सृष्टि का यह चक्र अनादि काल से निरंतर बिना किसी विराम के बार-बार इसी प्रकार चलता रहता है।
तानि उन (समस्त भूतों को) वही पूर्ववर्ती जीव जिनके कर्मों के संस्कार (कर्मफल) अभी शेष रह गए हैं, वे पुनः प्रकट होते हैं।
कल्पादौ नये कल्प के आदि में (आरंभ में) जब पुनः ब्रह्मा की जागृति होती है और नई सृष्टि का चक्र प्रारंभ होता है।
विसृजामि + अहम् रचता हूँ मैं / प्रकट करता हूँ मैं भगवान श्रीकृष्ण घोषणा करते हैं कि किसी अन्य बाहरी शक्ति के बिना, वे स्वयं अपनी लीला से इस सृष्टि को पुनः रचते हैं।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

महाभारत के कुरुक्षेत्र के मैदान का दिव्य प्रसंग

श्रीमद्भगवद्गीता का यह उपदेश महाभारत के भीषण युद्ध के आरंभ होने से ठीक पहले कुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र में अर्जुन और भगवान श्रीकृष्ण के बीच संवाद के रूप में प्रकट हुआ था। जब अर्जुन अपने ही सगे-सम्बन्धियों, गुरुओं और भाइयों को सामने युद्ध के लिए खड़ा देखता है, तो उसका गांडीव हाथ से छूट जाता है और वह विषाद से भर जाता है। तब जगतगुरु श्रीकृष्ण ने उसे कर्तव्य पथ का बोध कराने के लिए राजविद्याराजगुह्ययोग (अध्याय 9) का ज्ञान दिया। इस अध्याय में भगवान ने उन परम रहस्यों को साझा किया है जो साधारण मनुष्यों की बुद्धि से परे हैं, लेकिन जो साधक को मोक्ष और आत्मज्ञान की ओर ले जाते हैं।

पुराणों में वर्णित 'कल्प' और 'प्रलय' की संकल्पना

हिंदू पौराणिक ग्रंथों (विशेषकर विष्णु पुराण, श्रीमद्भागवत महापुराण और सूर्य सिद्धांत) में समय की गणना का अत्यंत सूक्ष्म वैज्ञानिक विवरण मिलता है। एक चतुर्युग (सत्ययुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग) की कुल अवधि 43 लाख 20 हजार मानवीय वर्ष होती है। ऐसे 71 चतुर्युगों का एक मन्वंतर होता है, और एक कल्प में 14 मन्वंतर होते हैं। ब्रह्मा का एक दिन (जिसे 'कल्प' कहा जाता है) लगभग 4.32 अरब (4,320,000,000) वर्षों का होता है और इतनी ही लंबी ब्रह्मा की रात्रि होती है।

जब ब्रह्मा का दिन समाप्त होता है (जिसे श्लोक में 'कल्पक्षय' कहा गया है), तब नैमित्तिक प्रलय होती है। इस प्रलय में त्रैलोक्य (भूः, भुवः, स्वः) जलमग्न हो जाते हैं और समस्त जीव भगवान की माया (प्रकृति) में सूक्ष्म रूप से समा जाते हैं। इसके बाद जब पुनः ब्रह्मा की रात्रि समाप्त होती है और नया कल्प आरंभ होता है ('कल्पादौ'), तब भगवान विष्णु या महाविष्णु की इच्छा से यह समस्त ब्रह्मांड पुनः स्थूल रूप में प्रकट हो जाता है। यह सनातन चक्र इस बात का प्रतीक है कि इस संसार में कुछ भी स्थाई नहीं है सिवाय उस परमब्रह्म परमात्मा के।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

इस महावाक्य और श्लोक का दैनिक जीवन में मनन और पाठ करने से साधक को अनेकों आध्यात्मिक, मानसिक और मनोवैज्ञानिक लाभ प्राप्त होते हैं:

1. असीम मानसिक शांति और भय का नाश

जब व्यक्ति यह समझ लेता है कि इस संसार का संचालन एक सर्वोच्च और करुणामयी शक्ति (भगवान) के हाथों में है, तो उसकी चिंताएं और भविष्य का भय स्वतः समाप्त होने लगता है।

2. अहंकार और मकार का शमन

"मैं सब कुछ करता हूँ" (कर्तृत्व भाव) का अहंकार मिटता है। साधक के भीतर यह विनम्रता आती है कि वह केवल एक निमित्त मात्र है और सब कुछ भगवान की प्रकृति के अधीन है।

3. सकारात्मक ऊर्जा और औरा (Aura) का विकास

संस्कृत के इन पवित्र मंत्रों का सही उच्चारण करने से शरीर के चक्र संतुलित होते हैं, जिससे चारों ओर एक सात्विक और दिव्य सकारात्मक ऊर्जा का आवरण बनता है।

4. कर्मफल के प्रति अनासक्ति

यह ज्ञान प्राप्त होने पर कि प्रलय और सृष्टि का यह चक्र अनवरत है, मनुष्य सांसारिक बंधनों और असफलताओं से विचलित हुए बिना अपने कर्तव्य का पालन करता है।

5. एकाग्रता और स्मरण शक्ति में वृद्धि

गीता के श्लोकों का नियमित स्मरण और पाठन करने से मस्तिष्क की स्मरण शक्ति (Memory) तीव्र होती है और ध्यान (Meditation) की गहराई बढ़ती है।

6. कर्मिक शुद्धि (Karmic Purification)

भगवान के गुणों और उनके विराट स्वरूप का निरंतर स्मरण करने से चित्त की शुद्धि होती है, जिससे पुराने संचित पापकर्मों के प्रभाव क्षीण होने लगते हैं।

7. जीवन के प्रति दार्शनिक दृष्टिकोण

सुख और दुख को समान भाव से देखने की क्षमता (समत्व योग) विकसित होती है, क्योंकि व्यक्ति समझ जाता है कि जीवन का यह चक्र क्षणिक है और शाश्वत केवल परमात्मा है।

8. भगवद्कृपा और अनन्य भक्ति की प्राप्ति

भगवान के इस रहस्यमय और परम ज्ञान को समझने से साधक पर भगवान श्रीकृष्ण की अहैतुकी कृपा बरसती है और उसकी भक्ति सुदृढ़ होती है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

भक्तिलोक (Bhaktilok.in) पर प्रस्तुत यह आलेख वैदिक साहित्य, श्रीमद्भगवद्गीता (शंकराचार्य भाष्य और रामानंद टीका सहित), विष्णु पुराण तथा विभिन्न उपनिषदों के अकादमिक और पारंपरिक अध्ययनों पर आधारित है। हमारे विद्वान संस्कृत भाषाविदों और सनातन धर्म के आचार्यों ने यह सुनिश्चित किया है कि इस लेख में दी गई प्रत्येक जानकारी शास्त्रों के बिल्कुल अनुकूल हो।

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: इस सामग्री का उद्देश्य पाठकों को सनातन संस्कृति के वैज्ञानिक और आध्यात्मिक पक्षों से अवगत कराना है। किसी भी प्रकार के अंधविश्वास को बढ़ावा दिए बिना, वेदों और पुराणों के तार्किक व दार्शनिक स्वरूप को सहज हिंदी भाषा में प्रस्तुत करना ही हमारा मुख्य लक्ष्य है। यदि आपके पास इस विषय से संबंधित कोई भी प्रश्न या सुझाव है, तो आप हमारी संपादकीय टीम से संपर्क कर सकते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs - Schema Ready)

'कल्पक्षय' दो शब्दों से मिलकर बना है—कल्प (ब्रह्मा का एक दिन, जो लगभग 4.32 अरब वर्ष का होता है) और क्षय (अंत या विनाश)। आध्यात्मिक दृष्टिकोण से इसका अर्थ है जब ब्रह्मा का एक दिन समाप्त होता है, तब संपूर्ण त्रैलोक्य का संहार या महाप्रलय होता है, जिसमें समस्त जीव अपनी सूक्ष्म अवस्था में भगवान की प्रकृति में लीन हो जाते हैं।

आधुनिक खगोल विज्ञान और ब्रह्मांड विज्ञान (Cosmology) में ब्रह्मांड के विस्तार (Expansion) और संकुचन (Big Crunch / Contraction) का सिद्धांत माना जाता है। गीता का यह श्लोक ठीक उसी प्रकार ब्रह्मांड के चक्रीय संहार और पुनरुत्सर्जन का वर्णन करता है, जिसे आधुनिक विज्ञान ऊर्जा संरक्षण और ब्रह्मांडीय चक्र के रूप में देखता है।

शास्त्रानुसार प्रलयकाल में जीव नष्ट नहीं होते, बल्कि उनके कर्मों के संस्कार (अदृष्ट) सुरक्षित रहते हैं। वे भगवान की माया (प्रकृति) में बीज रूप में सूक्ष्म अवस्था में विश्राम करते हैं और जब नया कल्प ('कल्पादौ') आरंभ होता है, तो भगवान उन्हें उनके पिछले कर्मों के अनुसार पुनः प्रकट कर देते हैं।

इस श्लोक का नियमित पाठ और मनन करने से व्यक्ति के भीतर से अहंकार समाप्त होता है, जीवन के प्रति अनासक्ति और संतोष की भावना जागृत होती है, तथा सांसारिक दुखों या संकटों से लड़ने की मानसिक शक्ति प्राप्त होती है।

यह पावन श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के नवम (9वें) अध्याय का है, जिसे 'राजविद्याराजगुह्ययोग' कहा जाता है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने सबसे गोपनीय और सर्वोच्च ज्ञान का वर्णन किया है जो मोक्ष का सीधा मार्ग प्रशस्त करता है।

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संकलनकर्ता: मुख्य देवotional विद्वान एवं संस्कृत भाषाविद, भक्तिलोक टीम

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

हे कुन्तीपुत्र अर्जुन! कल्प के अन्त में सम्पूर्ण प्राणी मेरी प्रकृति में लीन हो जाते हैं, और कल्प के आरम्भ में मैं उन्हें फिर से उत्पन्न करता हूँ।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

सृष्टि का निर्माण और विनाश ईश्वर के अधीन है। यह चक्र अनादि काल से चल रहा है। साधक को इससे विरक्त होकर ईश्वर की अविनाशी सत्ता में आश्रय लेना चाहिए, जो इस चक्र से परे है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 9: राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 7 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 7/34 21% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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