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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 9 · श्लोक 7

अध्याय 9 · श्लोक 7

राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् | कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम् || ७||

sarva-bhūtāni kaunteya prakṛtiṃ yānti māmikām | kalpa-kṣaye punas tāni kalpādau visṛjāmy aham ||7||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

सर्व-भूतानि: सम्पूर्ण प्राणी; कौन्तेय: हे कुन्तीपुत्र; प्रकृतिम्: प्रकृति में; यान्ति: चले जाते हैं; मामिकाम्: मेरी; कल्प-क्षये: कल्प के अन्त में; पुनः: फिर; तानि: उन्हें; कल्प-आदौ: कल्प के आरम्भ में; विसृजामि: उत्पन्न करता हूँ; अहम्: मैं।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

हे कौन्तेय! कल्प के अन्त में सब प्राणी मेरी प्रकृति में लीन हो जाते हैं और कल्प के आरम्भ में मैं उन्हें फिर से उत्पन्न करता हूँ।

English Translation

At the end of a kalpa, all beings merge into My Prakriti (nature); at the beginning of the next kalpa, O son of Kunti, I send them forth again.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

यह श्लोक सृष्टि-चक्र का वर्णन करता है। कल्प का अर्थ ब्रह्मा का एक दिन (लगभग 4.32 अरब वर्ष) होता है। उसके अन्त में सृष्टि का संहार होता है, और फिर नई सृष्टि होती है। यह सब भगवान की इच्छा से होता है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।