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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 9 · श्लोक 6

अध्याय 9 · श्लोक 6

राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान् | तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय || ६||

yathākāśa-sthito nityaṃ vāyuḥ sarvatra-go mahān | tathā sarvāṇi bhūtāni mat-sthānīty upadhāraya ||6||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

यथा: जैसे; आकाश-स्थितः: आकाश में स्थित; नित्यम्: सदा; वायुः: वायु; सर्वत्र-गः: सर्वत्र गमन करने वाला; महान्: महान्; तथा: वैसे ही; सर्वाणि: सभी; भूतानि: प्राणी; मत्-स्थानि: मुझमें स्थित; इति: इस प्रकार; उपधारय: समझो।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

जैसे सर्वत्र गमन करने वाली महान् वायु सदा आकाश में स्थित रहती है, वैसे ही सम्पूर्ण प्राणी मुझमें स्थित हैं – ऐसा तुम समझो।

English Translation

As the mighty wind, moving everywhere, rests always in the sky, so do all beings rest in Me—know this.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

एक सुन्दर दृष्टान्त: वायु आकाश में सर्वत्र घूमती है, फिर भी आकाश में ही टिकी है। उसी प्रकार सभी प्राणी भगवान में ही स्थित हैं। वे भगवान से अलग नहीं हैं।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।