राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga) – श्लोक 6

श्लोक ६ में वायु और आकाश के दृष्टान्त से समझाया गया कि सब प्राणी भगवान में स्थित हैं। Verse 6: Analogy of wind resting in the sky.

संस्कृत श्लोक

यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान् | तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय || ६||

yathākāśa-sthito nityaṃ vāyuḥ sarvatra-go mahān | tathā sarvāṇi bhūtāni mat-sthānīty upadhāraya ||6||

पदच्छेद / शब्दार्थ

यथा: जैसे; आकाश-स्थितः: आकाश में स्थित; नित्यम्: सदा; वायुः: वायु; सर्वत्र-गः: सर्वत्र गमन करने वाला; महान्: महान्; तथा: वैसे ही; सर्वाणि: सभी; भूतानि: प्राणी; मत्-स्थानि: मुझमें स्थित; इति: इस प्रकार; उपधारय: समझो।

हिंदी अनुवाद

जैसे सर्वत्र गमन करने वाली महान् वायु सदा आकाश में स्थित रहती है, वैसे ही सम्पूर्ण प्राणी मुझमें स्थित हैं – ऐसा तुम समझो।

English Translation

As the mighty wind, moving everywhere, rests always in the sky, so do all beings rest in Me—know this.

टीका / Commentary

एक सुन्दर दृष्टान्त: वायु आकाश में सर्वत्र घूमती है, फिर भी आकाश में ही टिकी है। उसी प्रकार सभी प्राणी भगवान में ही स्थित हैं। वे भगवान से अलग नहीं हैं।