राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga) – श्लोक 5
श्लोक ५ में भगवान अपनी अचिन्त्य शक्ति का वर्णन करते हैं कि वे सबको धारण करते हैं फिर भी उनमें नहीं। Verse 5: The Lord describes His inconceivable yoga.
संस्कृत श्लोक
न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम् | भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः || ५||
na ca mat-sthāni bhūtāni paśya me yogam aiśvaram | bhūta-bhṛn na ca bhūta-stho mamātmā bhūta-bhāvanaḥ ||5||
पदच्छेद / शब्दार्थ
न: नहीं; च: और; मत्-स्थानि: मुझमें स्थित; भूतानि: प्राणी; पश्य: देख; मे: मेरे; योगम्: योग (प्रभाव); ऐश्वरम्: ऐश्वर्यपूर्ण; भूत-भृत्: प्राणियों का धारण करने वाला; न: नहीं; च: और; भूत-स्थः: प्राणियों में स्थित; मम: मेरा; आत्मा: स्वरूप; भूत-भावनः: प्राणियों का पालन करने वाला।
हिंदी अनुवाद
और न ही सब प्राणी मुझमें स्थित हैं (इस प्रकार समझो) – मेरे इस ऐश्वर्ययुक्त योग को देखो। मैं सब प्राणियों का धारण-पोषण करने वाला हूँ, फिर भी उनमें स्थित नहीं हूँ। मेरा आत्मा ही सब प्राणियों का उत्पादक है।
English Translation
Yet beings do not dwell in Me—behold My divine Yoga! I sustain all beings, yet I am not contained in them; My Self is the very source of all beings.
टीका / Commentary
पिछले श्लोक में कहा गया कि सब मुझमें हैं, लेकिन मैं उनमें नहीं। यहाँ और स्पष्ट किया: वास्तव में प्राणी मुझमें नहीं हैं (मैं उनमें हूँ, ऐसा नहीं है) – यह ईश्वर की अचिन्त्य शक्ति है। वह सबको धारण करता है, फिर भी उनसे परे है।