पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
15 पदश्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
और न ही सब प्राणी मुझमें स्थित हैं (इस प्रकार समझो) – मेरे इस ऐश्वर्ययुक्त योग को देखो। मैं सब प्राणियों का धारण-पोषण करने वाला हूँ, फिर भी उनमें स्थित नहीं हूँ। मेरा आत्मा ही सब प्राणियों का उत्पादक है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्ता
सनातन संस्कृति और वेदान्त दर्शन में श्रीमद्भगवद्गीता को केवल एक ग्रंथ नहीं, अपितु साक्षात ब्रह्मविद्या माना गया है। भगवान श्रीकृष्ण के मुखकमल से निःसृत यह दिव्य वाणी मनुष्य को भवसागर से पार उतारने वाली नौका है। विशेष रूप से नवम अध्याय, जिसे 'राजविद्याराजगुह्ययोग' कहा जाता है, समस्त वेदों और उपनिषदों का सार प्रस्तुत करता है। इस अध्याय में भगवान ने अपनी अचिंत्य योगशक्ति (ऐश्वर्य योग) का ऐसा पर्दाफाश किया है, जिसे सुनकर सामान्य बुद्धि चकित रह जाती है।
मानव मस्तिष्क की सीमाएं हैं—वह देश, काल और वस्तु के परिप्रेक्ष्य से बाहर नहीं सोच सकता। हम किसी वस्तु को या तो किसी पात्र के भीतर देखते हैं, या उसे बाहर मान लेते हैं। परंतु सर्वव्यापक, निराकार और साकार दोनों रूपों में स्थित परम परमात्मा की स्थिति इन भौतिक नियमों से परे है। प्रस्तुत श्लोक "न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम्" उसी गूढ़तम रहस्य का उद्घाटन करता है, जहाँ तर्क की सीमा समाप्त होती है और अनुभव की अनंत यात्रा प्रारंभ होती है।
भक्तिलोक.इन के इस विशेष आलेख में हम इसी महामंत्र पर गहराई से विचार करेंगे। यह श्लोक हमें सिखाता है कि कैसे परमेश्वर समस्त चराचर जगत का आधार होने पर भी उससे अलिप्त (निर्मम और असंग) रहता है। इस लेख का उद्देश्य पाठकों के मन में उठने वाले दार्शनिक संशयों का वेदान्त सम्मत और शास्त्रीय समाधान प्रस्तुत करना है, ताकि साधक अपनी साधना को और अधिक सुदृढ़ एवं निष्कलंक बना सके।
संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक
न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम्।
भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः॥ ९.५ ॥
श्लोक का स्पष्ट उच्चारण एवं पदानुक्रम:
न च मत्-स्थानि भूतानि पश्य मे योगम् ऐश्वरम्।
भूत-भृत् न च भूत-स्थः मम आत्मा भूत-भावनः॥
सामान्य हिंदी अनुवाद: पिछले श्लोक में भगवान ने कहा था कि सम्पूर्ण भूत प्राणी मुझमें स्थित हैं, परन्तु मैं उनमें स्थित नहीं हूँ। अब इस पाँचवें श्लोक में वे कहते हैं— वास्तव में प्राणी मुझमें स्थित नहीं हैं (और न ही मैं उनमें आसक्त हूँ)। मेरी इस ऐश्वर्ययुक्त योगशक्ति को देख! सबको धारण करने वाला और सबका पोषण करने वाला होने पर भी मेरा यह आत्मा (स्वरूप) भूतों में स्थित नहीं है।
पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ
धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि
श्रीमद्भगवद्गीता का यह संवाद महाभारत के महायुद्ध के आरंभ में कुरुक्षेत्र की पवित्र भूमि पर अर्जुन और भगवान श्रीकृष्ण के मध्य हुआ था। जब अर्जुन अपने स्वजनों को सामने देखकर विषाद से ग्रस्त हो गए और उन्होंने शस्त्र त्याग दिए, तब भगवान ने उन्हें कर्तव्य पथ का बोध कराने के लिए ज्ञान, कर्म और भक्तियोग के महाग्रंथ का उपदेश दिया। नवम अध्याय तक आते-आते अर्जुन की जिज्ञासा पराकाष्ठा पर पहुँच चुकी थी। वे यह जानना चाहते थे कि इस विराट ब्रह्मांड का संचालन करने वाली गुप्त शक्ति किस प्रकार कार्य करती है।
वैदिक इतिहास और उपनिषदों (जैसे कठोपनिषद और श्वेताश्वतर उपनिषद) में भी इस प्रकार के ब्रह्मज्ञान के उदाहरण मिलते हैं। महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित महाभारत के इस अंश (भीष्म पर्व) में भगवान श्रीकृष्ण अपने विराट और ऐश्वर्यशाली स्वरूप का परिचय देते हुए स्पष्ट करते हैं कि उनकी माया बड़ी दुस्तरा है। वेदों में कहा गया है— 'एको देवः सर्वभूतेषु गूढः' (वह एक ही देव समस्त प्राणियों में छिपा हुआ है)। परंतु छिपा होने पर भी वह उनसे पूरी तरह असंग और निर्विकार है।
इस श्लोक की पृष्ठभूमि में एक अत्यंत सूक्ष्म दार्शनिक दृष्टांत दिया जाता है—जैसे आकाश में बादल छा जाते हैं, वर्षा होती है, और नदियाँ बहती हैं, लेकिन आकाश उन सबसे अछूता रहता है, उस पर कोई दाग नहीं लगता। इसी प्रकार, संसार के सभी जीव भगवान की चेतना में जन्म लेते हैं, उसी में पलते हैं और अंततः उसी में विलीन हो जाते हैं, किंतु भगवान कभी भी उन विकारों से लिप्त नहीं होते। यही उनकी 'ऐश्वरी माया' या 'योगशक्ति' है, जिसे साधक केवल अनन्य भक्ति और गुरु कृपा से ही अनुभव कर सकता है।
नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ
श्रीमद्भगवद्गीता के नवम अध्याय के इस पाँचवें श्लोक का नियमित पाठ, मनन और स्मरण करने से साधक को अनेकानेक आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक लाभ प्राप्त होते हैं:
१. मानसिक शांति और स्थिरता
संसार की उथल-पुथल और चिंताओं के बीच यह श्लोक मन को यह विश्वास दिलाता है कि कोई सर्वोच्च सत्ता सब कुछ संभाल रही है, जिससे गहरी मानसिक शांति मिलती है।
२. सकारात्मक ऊर्जा का संचार
इसकी लयबद्ध आवृत्ति से शरीर और मन के चारों ओर एक उच्च कोटि की सकारात्मक ऊर्जा (Aura) का निर्माण होता है, जो नकारात्मक विचारों को दूर रखती है।
३. कार्मिक शुद्धि (कर्म बंधनों से मुक्ति)
जब साधक यह समझ जाता है कि कर्ता केवल परमात्मा है, तो वह कर्तापन के अहंकार से मुक्त हो जाता है, जिससे उसके संचित कर्मों की शुद्धि होने लगती है।
४. दैवीय कृपा की प्राप्ति
भगवान के ऐश्वर्य और योगशक्ति का गान करने से साधक पर भगवान श्रीकृष्ण की अहेतुकी कृपा बरसती है, और भक्ति मार्ग सुलभ हो जाता है।
५. मोह और आसक्ति से मुक्ति
संसार में रहते हुए भी कमल के पत्ते की तरह पानी से अलिप्त रहने की प्रेरणा मिलती है, जिससे पारिवारिक और सामाजिक जीवन में मोह घटता है।
६. एकाग्रता और स्मरण शक्ति में वृद्धि
संस्कृत श्लोकों के उच्चारण और उनके अर्थ पर मनन करने से मस्तिष्क की बौद्धिक क्षमता, स्मरण शक्ति और फोकस में अभूतपूर्व सुधार होता है।
७. भय और चिंता का नाश
भविष्य की अनिश्चितताओं को लेकर मन में जो भय रहता है, वह इस बोध से समाप्त हो जाता है कि सबका पालनहार और संरक्षक स्वयं परमेश्वर है।
८. वेदान्त दर्शन का सहज बोध
कठिन से कठिन दार्शनिक सिद्धांत साधक को सहज ही समझ में आने लगते हैं, जिससे उसका आध्यात्मिक विकास तीव्र गति से होता है।
संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (EEAT Note)
संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: भक्तिलोक.इन पर प्रस्तुत यह विस्तृत श्लोक व्याख्या वेदों, उपनिषदों, श्रीमद्भगवद्गीता के आद्य शंकराचार्य, स्वामी रामसुखदासजी और श्रीधर स्वामी जैसे महान टीकाकारों के भाष्यों के गहन अध्ययन के पश्चात तैयार की गई है। हमारा उद्देश्य पाठकों तक सनातन संस्कृति का शुद्ध, अकाट्य और आचरणोपयोगी ज्ञान पहुँचाना है। प्रत्येक शब्द और दार्शनिक संदर्भ को प्राचीन ग्रंथों की कसौटी पर परखने के बाद ही यहाँ प्रकाशित किया गया है, ताकि हमारे पाठकों को उच्चतम स्तर की आध्यात्मिक सामग्री प्राप्त हो सके।
अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
भगवान कहते हैं: वास्तव में प्राणी मुझमें स्थित नहीं हैं – मेरे इस दिव्य योग को देखो। मैं सबका धारण-पोषण करता हूँ, फिर भी मैं उनमें स्थित नहीं हूँ। मेरा आत्मा ही सबका कारण है।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
ईश्वर की शक्ति अचिन्त्य है। वह सबमें व्याप्त है, लेकिन सबसे अलग भी है। यही द्वैत-अद्वैत का रहस्य है। साधक को इस अचिन्त्य सत्य को श्रद्धापूर्वक स्वीकार करना चाहिए।