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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 9 · श्लोक 5

अध्याय 9 · श्लोक 5

राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम् | भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः || ५||

na ca mat-sthāni bhūtāni paśya me yogam aiśvaram | bhūta-bhṛn na ca bhūta-stho mamātmā bhūta-bhāvanaḥ ||5||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

न: नहीं; च: और; मत्-स्थानि: मुझमें स्थित; भूतानि: प्राणी; पश्य: देख; मे: मेरे; योगम्: योग (प्रभाव); ऐश्वरम्: ऐश्वर्यपूर्ण; भूत-भृत्: प्राणियों का धारण करने वाला; न: नहीं; च: और; भूत-स्थः: प्राणियों में स्थित; मम: मेरा; आत्मा: स्वरूप; भूत-भावनः: प्राणियों का पालन करने वाला।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

और न ही सब प्राणी मुझमें स्थित हैं (इस प्रकार समझो) – मेरे इस ऐश्वर्ययुक्त योग को देखो। मैं सब प्राणियों का धारण-पोषण करने वाला हूँ, फिर भी उनमें स्थित नहीं हूँ। मेरा आत्मा ही सब प्राणियों का उत्पादक है।

English Translation

Yet beings do not dwell in Me—behold My divine Yoga! I sustain all beings, yet I am not contained in them; My Self is the very source of all beings.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

पिछले श्लोक में कहा गया कि सब मुझमें हैं, लेकिन मैं उनमें नहीं। यहाँ और स्पष्ट किया: वास्तव में प्राणी मुझमें नहीं हैं (मैं उनमें हूँ, ऐसा नहीं है) – यह ईश्वर की अचिन्त्य शक्ति है। वह सबको धारण करता है, फिर भी उनसे परे है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।