श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 9 (राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga))

अध्याय 9 · श्लोक 4

राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 34 37 मिनट का पठन 158 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना | मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः || ४||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

13 पद
मया
मेरे द्वारा
ततम्
व्याप्त
इदम्
यह
सर्वम्
सम्पूर्ण
जगत्
जगत्
अव्यक्त-मूर्तिना
अव्यक्त रूप से
मत्-स्थानि
मुझमें स्थित हैं
सर्व-भूतानि
सम्पूर्ण प्राणी
न
नहीं
च
और
अहम्
मैं
तेषु
उनमें
अवस्थितः
स्थित हूँ।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

यह सम्पूर्ण जगत् मेरे अव्यक्त रूप से व्याप्त है। सम्पूर्ण प्राणी मुझमें स्थित हैं, परन्तु मैं उनमें स्थित नहीं हूँ।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

श्रीभगवद्गीता के नवम अध्याय (राजविद्याराजगुह्ययोग) के इस परम पावन श्लोक में भगवान श्री कृष्ण ने अपनी अचिंत्य योगशक्ति, सर्वव्यापकता (Immanence) और साथ ही अपनी निर्लिप्तता या transcendence का अद्भुत रहस्योद्घाटन किया है। यह भारतीय सनातन दर्शन का वह स्तंभ है जो द्वैत और अद्वैत के पार जाकर भगवान और इस संपूर्ण ब्रह्मांड के वास्तविक संबंध को उजागर करता है।

आध्यात्मिक प्रस्तावना, सांस्कृतिक महत्व और ब्रह्मांडीय स्वरूप

सनातन संस्कृति और वैदिक दर्शन में श्रीमद्भगवद्गीता को केवल एक ग्रंथ नहीं, अपितु साक्षात उपनिषदों का सार माना गया है। गीता के नवम अध्याय का नाम 'राजविद्याराजगुह्ययोग' है, जिसका अर्थ है- विद्याओं में राजा, रहस्यों में राजा और योग का भी राजा। इस अध्याय में भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को उन गूढ़ रहस्यों से अवगत करा रहे हैं जिन्हें जानने के बाद मनुष्य संसार के सभी बंधनों से मुक्त होकर परमानंद को प्राप्त कर लेता है। प्रस्तुत श्लोक—"मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना..."—इसी राजगुह्य का केंद्रीय बिंदु है।

इस श्लोक के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण ने वेदों और उपनिषदों के उस अद्वैत सिद्धांत को बहुत ही सरल और स्पष्ट भाषा में समझाया है, जिसमें कहा गया है कि यह संपूर्ण ब्रह्मांड परमात्मा से ही उत्पन्न है, परमात्मा में ही स्थित है और अंततः परमात्मा में ही लीन हो जाता है। तथापि, परमात्मा इस संसार से सीमित नहीं है। उसकी महानता, उसकी चेतना और उसका स्वरूप इस सृष्टि की सीमाओं से अनंत गुना परे है। आधुनिक भौतिक विज्ञान भी जब ब्रह्मांड की विशालता और डार्क मैटर (Dark Matter) या क्वांटम फील्ड की बात करता है, तो कहीं न कहीं प्राचीन भारतीय ऋषियों की इस दिव्य दृष्टि के समक्ष नतमस्तक होना पड़ता है, जिन्होंने सदियों पहले यह बता दिया था कि कण-कण में एक ही अदर्शनीय और अव्यक्त चेतना व्याप्त है।

सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से, इस श्लोक का दैनिक जीवन में अत्यंत महत्व है। जब एक साधक इस भाव को आत्मसात कर लेता है कि वह जिस भी प्राणी, वस्तु या परिस्थिति से मिल रहा है, उन सब में वही एक परमेश्वर अव्यक्त रूप से विद्यमान है, तब उसके मन से ईर्ष्या, द्वेष, अहंकार और भय स्वतः समाप्त हो जाते हैं। वह संपूर्ण विश्व को एक विशाल परिवार (वसुधैव कुटुंबकम्) के रूप में देखने लगता है और प्रत्येक कर्म को भगवान की पूजा मानकर करने लगता है। यही इस श्लोक का मूल संदेश है, जो मानव जीवन को ऊर्ध्वगामी बनाने के लिए एक अचूक औषधि की भांति कार्य करता है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय ९, श्लोक ४

मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना।
मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः॥ ४॥

ॐ श्री कृष्णार्पणमस्तु

पाठ करने की विधि एवं अनुष्ठान:
  • प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में स्नानादि से निवृत्त होकर पवित्र आसन पर बैठें।
  • भगवान श्री कृष्ण के विग्रह, चित्र या गीता ग्रंथ के समक्ष शुद्ध घी का दीपक और धूप प्रज्वलित करें।
  • सर्वप्रथम आचमन और पवित्रिकरण करके भगवान का मानसिक ध्यान करें।
  • इस श्लोक का न्यूनतम 108 बार (एक माला) या कम से कम 11 बार सस्वर पाठ करें।
  • पाठ के अंत में अपनी समस्त चिंताओं को भगवान को समर्पित करते हुए मानसिक शांति की प्रार्थना करें।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

श्लोक के एक-एक शब्द की गहराई में जाने से इसका दार्शनिक और आध्यात्मिक पक्ष अत्यंत स्पष्ट हो जाता है। नीचे दी गई तालिका में प्रत्येक पद का सरल हिंदी अर्थ और उसका विस्तृत दार्शनिक भावार्थ प्रस्तुत है:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
मया (Mayaa) मेरे द्वारा (सगुण-निर्गुण रूप से) परमात्मा अपनी मूल सत्ता और चेतना शक्ति से इस पूरे ब्रह्मांड को संचालित कर रहे हैं।
ततम् (Tatam) व्याप्त है / फैला हुआ है जैसे धागे में मणियाँ पिरोई होती हैं, वैसे ही परमात्मा कण-कण में संव्याप्त है।
इदम् (Idam) यह (प्रत्यक्ष दिखने वाला) इंद्रियों के द्वारा अनुभव होने वाला यह संपूर्ण दृश्यमान जगत।
सर्वम् (Sarvam) सब कुछ (समस्त संसार) स्थावर (वृक्ष-पर्वत) और जंगम (जीव-जंतु) सभी कुछ इसी दायरे में आते हैं।
जगत् (Jagat) संसार / ब्रह्मांड जो निरंतर गतिशील है, बदल रहा है और एक दिन विलीन हो जाता है।
अव्यक्तमूर्तिना (Avyakta-murtina) अव्यक्त रूप वाले (इंद्रियों से परे) भगवान का वह स्वरूप जो आँखों से दिखाई नहीं देता, परंतु जिसकी उपस्थिति हर जगह अनुभव होती है (जैसे आकाश या हवा)।
मत्स्थानि (Mats-thaani) मुझमें ही स्थित हैं समस्त भूत-प्राणी परमात्मा के ही आधार पर टिके हुए हैं, उनका कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है।
सर्वभूतानि (Sarva-bhootaani) संपूर्ण भूत-प्राणी (जीव-समुदाय) ब्रह्मा से लेकर कीट पतंग तक सभी जीव इसी महाचेतना के अंतर्गत निवास करते हैं।
न च (Na cha) और नहीं (किंतु ऐसा नहीं है कि) यहाँ भगवान एक बहुत ही सूक्ष्म अंतर और अपनी स्वतंत्रता को स्पष्ट कर रहे हैं।
अहम् (Aham) मैं (स्वयं भगवान) वह परम चेतना या वासुदेव रूपी परमात्मा।
तेषु (Teshu) उन भूतों में / संसार में इस भौतिक जगत या प्राणियों के भीतर।
अवस्थितः (Avasthitah) स्थित हूँ (आबद्ध या सीमित हूँ) भगवान संसार में रहते हुए भी संसार के गुणों (सुख-दुःख, मोह-माया) से पूरी तरह अलिप्त और स्वतंत्र हैं।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

श्रीमद्भगवद्गीता का यह अद्भुत संवाद महाभारत के महासमर के ठीक आरंभ में, कुरुक्षेत्र की पवित्र भूमि पर अर्जुन और भगवान श्रीकृष्ण के मध्य हुआ था। जब अर्जुन अपने ही स्वजनों, गुरुओं और भाइयों को सामने देखकर भारी मानसिक विषाद और कायरता से घिर गए, तब उन्होंने अपने सारथी श्रीकृष्ण को अपना गुरु मानकर शरणागति स्वीकार की। इसके पश्चात भगवान ने अर्जुन को ज्ञान, कर्म और भक्तियों के अनेक सोपान पार कराते हुए आत्मबोध का उपदेश दिया।

नवम अध्याय के प्रसंग में, अर्जुन के मन में यह जिज्ञासा उत्पन्न होती है कि भगवान का वास्तविक स्वरूप क्या है और वे इस सृष्टि से किस प्रकार जुड़े हुए हैं। सामान्य मानव बुद्धि के लिए यह समझना अत्यंत कठिन है कि जो ईश्वर सर्वव्यापक है, वह संसार के दुखों और विकारों से अछूता कैसे रह सकता है। इस पहेली को सुलझाने के लिए ही भगवान श्रीकृष्ण ने इस श्लोक का प्रयोग किया। उन्होंने एक अत्यंत प्रसिद्ध दृष्टांत (आकाश और बादल का, या मक्खन और दूध का) के माध्यम से इसे समझाया।

शास्त्रों में वेदों, उपनिषदों (विशेषकर श्वेताश्वतर और छांदोग्य उपनिषद) तथा श्रीमद्भागवत महापुराण में भी इसी सिद्धांत की पुष्टि की गई है। महर्षि वेद व्यास ने महाभारत के माध्यम से यह संदेश दिया है कि भगवान सर्वत्र विद्यमान हैं, ठीक वैसे ही जैसे अग्नि लकड़ी के कण-कण में छिपी होती है, परंतु लकड़ी के जलने या नष्ट होने से अग्नि नष्ट नहीं होती। भगवान की इस अचिंत्य शक्ति को वेदों में 'योगमाया' कहा गया है। जब हम पुराणों के इतिहास को देखते हैं, तो पाते हैं कि जितने भी महान ऋषि-मुनि हुए—चाहे वे नारद हों, व्यास हों या शुकदेव—उन्होंने इसी ब्रह्मविद्या के बल पर संसार के प्रपंचों के बीच रहते हुए भी पूर्ण शांति और मुक्ति का अनुभव किया।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

श्रीमद्भगवद्गीता के इस नवम अध्याय के चतुर्थ श्लोक का नियमित पठन, मनन और इसके अर्थ का स्मरण करने से जीवन में अभूतपूर्व सकारात्मक परिवर्तन आते हैं। इसके प्रमुख आध्यात्मिक और मानसिक लाभ निम्नलिखित हैं:

1. मानसिक शांति और स्थिरता (Mental Peace)

यह श्लोक मन को यह विश्वास दिलाता है कि सब कुछ एक सर्वोच्च नियंत्रण में है। इससे अति-चिंता (Overthinking), तनाव और अवसाद जैसी मानसिक समस्याओं से मुक्ति मिलती है और चित्त शांत होता है।

2. सकारात्मक ऊर्जा का संचार (Positive Aura)

संस्कृत के इन पवित्र श्लोकों के उच्चारण से उत्पन्न होने वाली ध्वनि तरंगें (Sound Vibrations) आसपास के वातावरण को शुद्ध करती हैं और शरीर के चक्रों को संतुलित कर सकारात्मक औरुरा का निर्माण करती हैं।

3. कर्मों की शुद्धि और अकर्मण्यता से मुक्ति (Karmic Purification)

जब साधक यह समझ जाता है कि हर जीव में वही परमात्मा है, तब वह किसी के प्रति भी दुर्भावना नहीं रखता। उसके द्वारा किए जाने वाले कर्म यज्ञ के समान पवित्र हो जाते हैं, जिससे उसके पुराने कर्मों का क्षय होता है।

4. निर्लिप्तता और संतुलन का विकास (Detachment & Balance)

भगवान की तरह संसार में रहते हुए भी संसार के सुख-दुखों में आसक्त न होने (कमल पत्रमिव जलम्) का गुण धीरे-धीरे साधक के स्वभाव में उतरने लगता है, जिससे जीवन के हर उतार-चढ़ाव में संतुलन बना रहता है।

5. भय और असुरक्षा की भावना का नाश (Fearlessness)

"मैं अकेला हूँ या असुरक्षित हूँ" यह भ्रम हमेशा के लिए मिट जाता है। साधक को हर पल यह अहसास रहता है कि वह उस अनंत शक्ति की गोद में सुरक्षित है जो पूरे ब्रह्मांड को थामे हुए है।

6. भगवत्कृपा और मोक्ष का मार्ग (Divine Grace)

नियमित रूप से इस राजविद्या का अध्ययन करने वाले पर भगवान श्रीकृष्ण की अहेतुषी कृपा बरसती है, और अंततः उसकी मति भगवान में ही लीन हो जाती है, जो कि मुक्ति का सीधा द्वार है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: Bhaktilok.in पर प्रस्तुत यह आलेख सनातन धर्म के मूल ग्रंथों—विशेषकर श्रीमद्भगवद्गीता (शंकराचार्य भाष्य और ज्ञानेश्वरी टीका के संदर्भ सहित), श्रीमद्भागवत महापुराण और उपनिषदों के गहन अध्ययन के आधार पर तैयार किया गया है। हमारे विद्वान संस्कृत भाषाविदों और आध्यात्मिक शोधकर्ताओं ने यह सुनिश्चित किया है कि श्लोक का अर्थ, उसका व्याकरण, और उसकी दार्शनिक गहराई आधुनिक पाठकों के लिए अत्यंत सरल, प्रामाणिक और बोधगम्य रूप में प्रस्तुत हो। हमारा उद्देश्य किसी भी प्रकार के अंधविश्वास को बढ़ावा दिए बिना वेदों और वेदान्त के शुद्ध ज्ञान को जन-जन तक पहुँचाना है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs - Schema Ready)

उत्तर: इस श्लोक का मूल संदेश यह है कि भगवान श्रीकृष्ण इस संपूर्ण ब्रह्मांड के कण-कण में अव्यक्त रूप से व्याप्त हैं और सभी भूत-प्राणी उन्हीं पर आधारित हैं। इसके साथ ही, भगवान इस सृष्टि की सीमाओं और विकारों से पूरी तरह अलिप्त (निर्लिप्त) हैं, ठीक वैसे ही जैसे आकाश में बादल तैरते हैं लेकिन आकाश उनसे गंदा या सीमित नहीं होता।

उत्तर: इसे एक बहुत ही सुंदर उदाहरण से समझा जा सकता है—जैसे सूर्य का प्रकाश कीचड़ और पवित्र जल दोनों पर समान रूप से पड़ता है, परंतु कीचड़ के दोष सूर्य को स्पर्श नहीं कर पाते। इसी प्रकार, भगवान इस जगत के भीतर और बाहर दोनों जगह हैं, लेकिन वे माया और संसार के बंधनों से पूरी तरह परे (Transcendent) हैं।

उत्तर: यह पावन श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के नवम अध्याय (9th Chapter) जिसका नाम 'राजविद्याराजगुह्ययोग' है, उसका चौथा (4th) श्लोक है।

उत्तर: इस श्लोक का नियमित पाठ और मनन करने से व्यक्ति के मन का भय, चिंता और अहंकार समाप्त होता है। वह जीवन के प्रत्येक जीव में ईश्वर के दर्शन करने लगता है, जिससे उसके भीतर करुणा, शांति और समभाव की भावना विकसित होती है।

उत्तर: हाँ, बिल्कुल। श्रीमद्भगवद्गीता संपूर्ण मानवजाति के लिए है। इसके श्लोकों के पाठ पर किसी प्रकार का जाति, वर्ग या आश्रम का बंधन नहीं है। कोई भी गृहस्थ, विद्यार्थी या साधक श्रद्धा और पवित्रता के साथ इसका पाठ कर सकता है और इसके असीम आध्यात्मिक लाभ प्राप्त कर सकता है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

यह सम्पूर्ण जगत् मेरे (भगवान के) अव्यक्त स्वरूप से व्याप्त है। सभी प्राणी मुझमें स्थित हैं, फिर भी मैं उनमें स्थित नहीं हूँ।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

ईश्वर सर्वव्यापी है, फिर भी वह सबसे परे और अलिप्त है। यह अद्वैत और विशिष्टाद्वैत का समन्वय है। साधक को इस रहस्य को समझना चाहिए कि ईश्वर हर जगह है, लेकिन वह किसी में सीमित नहीं है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 9: राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 4 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 4/34 12% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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