आज का पंचांग (Columbus) | सूर्योदय: ०४:२९ PM | सूर्यास्त: ०५:३३ AM
श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 9 · श्लोक 4

अध्याय 9 · श्लोक 4

राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना | मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः || ४||

mayā tatam idaṃ sarvaṃ jagad avyakta-mūrtinā | mat-sthāni sarva-bhūtāni na cāhaṃ teṣv avasthitaḥ ||4||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

मया: मेरे द्वारा; ततम्: व्याप्त; इदम्: यह; सर्वम्: सम्पूर्ण; जगत्: जगत्; अव्यक्त-मूर्तिना: अव्यक्त रूप से; मत्-स्थानि: मुझमें स्थित हैं; सर्व-भूतानि: सम्पूर्ण प्राणी; न: नहीं; च: और; अहम्: मैं; तेषु: उनमें; अवस्थितः: स्थित हूँ।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

यह सम्पूर्ण जगत् मेरे अव्यक्त रूप से व्याप्त है। सम्पूर्ण प्राणी मुझमें स्थित हैं, परन्तु मैं उनमें स्थित नहीं हूँ।

English Translation

This entire universe is pervaded by Me in My unmanifest form. All beings exist in Me, but I am not contained in them.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

यह श्लोक ईश्वर की व्यापकता और अचिन्त्य शक्ति को दर्शाता है। भगवान सभी में व्याप्त हैं, फिर भी वे किसी से आबद्ध नहीं हैं। यह रहस्य अर्जुन को समझने के लिए कहा गया है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।