राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga) – श्लोक 4

श्लोक ४ में भगवान कहते हैं कि सम्पूर्ण जगत् उनके अव्यक्त रूप से व्याप्त है। Verse 4: The Lord pervades the entire universe in unmanifest form.

संस्कृत श्लोक

मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना | मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः || ४||

mayā tatam idaṃ sarvaṃ jagad avyakta-mūrtinā | mat-sthāni sarva-bhūtāni na cāhaṃ teṣv avasthitaḥ ||4||

पदच्छेद / शब्दार्थ

मया: मेरे द्वारा; ततम्: व्याप्त; इदम्: यह; सर्वम्: सम्पूर्ण; जगत्: जगत्; अव्यक्त-मूर्तिना: अव्यक्त रूप से; मत्-स्थानि: मुझमें स्थित हैं; सर्व-भूतानि: सम्पूर्ण प्राणी; न: नहीं; च: और; अहम्: मैं; तेषु: उनमें; अवस्थितः: स्थित हूँ।

हिंदी अनुवाद

यह सम्पूर्ण जगत् मेरे अव्यक्त रूप से व्याप्त है। सम्पूर्ण प्राणी मुझमें स्थित हैं, परन्तु मैं उनमें स्थित नहीं हूँ।

English Translation

This entire universe is pervaded by Me in My unmanifest form. All beings exist in Me, but I am not contained in them.

टीका / Commentary

यह श्लोक ईश्वर की व्यापकता और अचिन्त्य शक्ति को दर्शाता है। भगवान सभी में व्याप्त हैं, फिर भी वे किसी से आबद्ध नहीं हैं। यह रहस्य अर्जुन को समझने के लिए कहा गया है।