राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga) – श्लोक 3

श्लोक ३: बिना श्रद्धा के मनुष्य भगवान को प्राप्त नहीं करता, बल्कि संसार में भटकता रहता है। Without faith one cannot attain God.

संस्कृत श्लोक

अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप | अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि || ३||

aśraddadhānāḥ puruṣā dharmasyāsya parantapa | aprāpya māṃ nivartante mṛtyu-saṃsāra-vartmani ||3||

पदच्छेद / शब्दार्थ

अश्रद्दधानाः: श्रद्धा रहित; पुरुषाः: मनुष्य; धर्मस्य: धर्म के; अस्य: इस; परन्तप: हे शत्रुतापन (अर्जुन); अप्राप्य: प्राप्त न करके; माम्: मुझे; निवर्तन्ते: लौट आते हैं; मृत्यु-संसार-वर्त्मनि: मृत्यु रूप संसार-मार्ग में।

हिंदी अनुवाद

हे परंतप (अर्जुन)! इस धर्म (भक्तियोग) में श्रद्धा न रखने वाले पुरुष मुझे प्राप्त न होकर मृत्यु रूप संसार-मार्ग में ही आते-जाते रहते हैं।

English Translation

Those who have no faith in this dharma (spiritual path), O scorcher of foes, fail to attain Me and return to the path of death and rebirth.

टीका / Commentary

श्रद्धा आध्यात्मिक जीवन का आधार है। बिना श्रद्धा के किया गया कोई भी कर्म फलदायी नहीं होता। यहाँ भगवान स्पष्ट करते हैं कि जिनमें इस मार्ग के प्रति श्रद्धा नहीं, वे जन्म-मृत्यु के चक्र में ही बने रहते हैं।