राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga) – श्लोक 2
श्लोक २ में ज्ञान को राजविद्या, राजगुह्य, पवित्र, प्रत्यक्षगम्य, धर्म्य, सुसुख और अव्यय बताया गया है। Verse 2: This knowledge is described as the king of sciences, the king of secrets, etc.
संस्कृत श्लोक
राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम् | प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम् || २||
rāja-vidyā rāja-guhyaṃ pavitram idam uttamam | pratyakṣāvagamaṃ dharmyaṃ su-sukhaṃ kartum avyayam ||2||
पदच्छेद / शब्दार्थ
राज-विद्या: राजविद्या (श्रेष्ठ विद्या); राज-गुह्यम्: राजगुह्य (श्रेष्ठ गोपनीय); पवित्रम्: पवित्र करने वाला; इदम्: यह; उत्तमम्: उत्तम; प्रत्यक्ष-अवगमम्: प्रत्यक्ष अनुभव होने वाला; धर्म्यम्: धर्मयुक्त; सु-सुखम्: अत्यन्त सुखपूर्वक; कर्तुम्: करने को; अव्ययम्: अविनाशी।
हिंदी अनुवाद
यह (ज्ञान) राजविद्या (विद्याओं का राजा) है, राजगुह्य (रहस्यों का राजा) है, अत्यन्त पवित्र करने वाला है, उत्तम है, प्रत्यक्ष अनुभव में आने वाला है, धर्मयुक्त है, साधन में अत्यन्त सुखद है और अविनाशी है।
English Translation
This is the king of knowledge, the king of secrets, the supreme purifier, directly realizable, righteous, very easy to practice, and imperishable.
टीका / Commentary
इस श्लोक में भगवान उस ज्ञान की महिमा का वर्णन करते हैं। इसे "राजविद्या" कहा गया है – सभी विद्याओं में श्रेष्ठ। यह ज्ञान न केवल सैद्धांतिक है, बल्कि प्रत्यक्ष अनुभव किया जा सकता है, और इसका पालन करना अत्यंत सुखद है।