श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 9 (राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga))

अध्याय 9 · श्लोक 17

राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 34 41 मिनट का पठन 161 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः | वेद्यं पवित्रमोंकार ऋक्साम यजुरेव च || १७||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

15 पद
पिता
पिता
अहम्
मैं
अस्य
इस
जगतः
जगत् का
माता
माता
धाता
धारण करने वाला
पितामहः
पितामह
वेद्यम्
जानने योग्य
पवित्रम्
पवित्र करने वाला
ओंकार
ओंकार
ऋक्
ऋग्वेद
साम
सामवेद
यजुः
यजुर्वेद
एव
ही
च
और।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

मैं इस जगत् का पिता, माता, धाता (पालनकर्ता) और पितामह हूँ; मैं जानने योग्य हूँ, पवित्रकर्ता हूँ, ओंकार हूँ तथा ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद भी हूँ।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

श्रीमद्भगवद्गीता के नौवें अध्याय, जिसे 'राजविद्याराजगुह्ययोग' के नाम से जाना जाता है, का सत्रहवां श्लोक आध्यात्मिक ज्ञान की पराकाष्ठा है। यह श्लोक केवल शब्दों का समूह नहीं, बल्कि उस परम सत्य का उद्घाटन है जो मनुष्य और परमात्मा के बीच के अटूट संबंधों को परिभाषित करता है। भक्तिलोक के विद्वानों के अनुसार, इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को अपनी सर्वव्यापकता और सर्वशक्तिमान स्वरूप का परिचय दे रहे हैं। यहाँ 'पिताहमस्य जगतो' कहकर भगवान स्वयं को इस चराचर जगत का जनक घोषित करते हैं। यह बोध कि संपूर्ण सृष्टि का उद्गम एक ही परम चेतना से हुआ है, भक्त के हृदय में अगाध शांति और सुरक्षा का भाव भर देता है।

सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से यह श्लोक अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह ईश्वर को केवल एक दूरस्थ शासक के रूप में नहीं, बल्कि माता, पिता, और पितामह (दादा) जैसे अत्यंत आत्मीय संबंधों के रूप में प्रस्तुत करता है। जब हम ईश्वर को 'माता' के रूप में देखते हैं, तो उनकी करुणा और वात्सल्य का अनुभव होता है; जब 'पिता' के रूप में देखते हैं, तो उनके संरक्षण और अनुशासन का बोध होता है। 'धाता' के रूप में वे हमारे कर्मफलों के विधानकर्ता हैं और 'पितामह' के रूप में वे सृष्टिकर्ता ब्रह्मा के भी जनक हैं। यह श्लोक हमें यह भी सिखाता है कि समस्त वेदों का सार 'ओंकार' (ॐ) है और ऋग्वेद, सामवेद एवं यजुर्वेद उसी एक परम सत्य के विभिन्न गायन हैं। इस दिव्य ज्ञान का अनुशीलन करने से साधक के भीतर का द्वैत समाप्त होता है और वह सर्वत्र ईश्वर के दर्शन करने में सक्षम होता है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

॥ मूल संस्कृत श्लोक ॥

पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः ।
वेद्यं पवित्रमोंकार ऋक्साम यजुरेव च ॥ १७॥


॥ पदच्छेद एवं रोमन लिप्यंतरण ॥

Pitāhamasya jagato mātā dhātā pitāmahaḥ |
Vedyaṃ pavitramoṃkāra ṛksāma yajureva ca || 17 ||

पाठ की विधि:

इस श्लोक का पाठ अत्यंत पवित्र माना जाता है। साधक को चाहिए कि वह प्रातः काल स्नान के पश्चात शुद्ध वस्त्र धारण कर, पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठ जाए। दीप प्रज्वलित कर भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान करते हुए इस श्लोक का कम से कम 11 या 21 बार स्पष्ट उच्चारण के साथ जप करें। इसके उच्चारण मात्र से घर का वातावरण शुद्ध होता है और नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है। विशेष रूप से विद्यार्थियों के लिए, जो ज्ञान की प्राप्ति (वेद्यं) चाहते हैं, इसका पाठ एकाग्रता बढ़ाने वाला सिद्ध होता है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning)

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
पिता (Pitā) जनक / पिता भगवान इस जगत के बीजप्रदाता पिता हैं। जैसे पिता संतान की उत्पत्ति का कारण होता है, वैसे ही समस्त चेतना का स्रोत परमात्मा है।
अहम (Aham) मैं यहाँ 'मैं' शब्द भगवान श्रीकृष्ण के उस विराट स्वरूप को दर्शाता है जो स्वयं को कर्ता के रूप में प्रकट कर रहे हैं।
अस्य जगतो (Asya Jagato) इस संसार का यह दृश्यमान और अदृश्य ब्रह्मांड, जिसमें चर और अचर सभी प्राणी सम्मिलित हैं।
माता (Mātā) जननी / माँ परमात्मा केवल बीजप्रदाता ही नहीं, बल्कि गर्भ धारण करने वाली और पोषण देने वाली माता भी हैं। वे प्रकृति (माया) के भी स्वामी हैं।
धाता (Dhātā) धारण करने वाला / पोषक वे समस्त ब्रह्मांड को धारण करने वाले और जीवों के कर्मों के अनुसार उन्हें फल प्रदान करने वाले विधाता हैं।
पितामहः (Pitāmahaḥ) दादा / पिता के पिता सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी के भी पिता होने के कारण भगवान को 'पितामह' कहा गया है। वे आदि पुरुष हैं।
वेद्यं (Vedyaṃ) जानने योग्य संसार में जो कुछ भी जानने योग्य परम सत्य है, वह केवल परमात्मा ही है। समस्त विद्याओं का अंतिम लक्ष्य उन्हें जानना है।
पवित्रम् (Pavitram) शुद्ध करने वाला वे परम पावन हैं। उनके स्मरण मात्र से अंतःकरण की अशुद्धियाँ और पाप नष्ट हो जाते हैं।
ओंकार (Oṃkāra) प्रणव मंत्र (ॐ) समस्त ध्वनियों और वेदों का मूल 'ॐ' है, जो साक्षात ईश्वर का शब्द-स्वरूप है।
ऋक्, साम, यजुः (Ṛk, Sāma, Yajur) तीनों वेद ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद भगवान की ही वाणी हैं। वे ज्ञान, उपासना और कर्म के प्रतीक हैं।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

इस श्लोक की पृष्ठभूमि को समझने के लिए हमें वैदिक सृष्टि विज्ञान (Cosmology) और कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र की मानसिक स्थिति को समझना होगा। जब अर्जुन मोहग्रस्त होकर अपने कर्तव्य से विमुख हो रहे थे, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें यह समझाने का प्रयास किया कि वे जिसे अपना संबंधी मान रहे हैं, वे सब अंततः उन्हीं (श्रीकृष्ण) में समाहित हैं।

पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब ब्रह्मा जी की उत्पत्ति भगवान विष्णु की नाभि-कमल से हुई, तब ब्रह्मा जी ने स्वयं को एकाकी पाया। उन्होंने सृष्टि की रचना के लिए तप किया और तब भगवान ने उन्हें वेदों का ज्ञान प्रदान किया। इसीलिए श्रीकृष्ण यहाँ स्वयं को 'पितामह' कहते हैं, क्योंकि वे ब्रह्मा (जगत के पिता) के भी जनक हैं। यह संबंध दर्शाता है कि ईश्वर से परे कुछ भी नहीं है।

वेदों के संदर्भ में, प्राचीन काल में 'वेदत्रयी' की अवधारणा प्रचलित थी, जिसमें ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद को मुख्य माना जाता था। ऋग्वेद ज्ञान का, यजुर्वेद कर्म का और सामवेद भक्ति व संगीत का प्रतीक है। भगवान यहाँ स्पष्ट करते हैं कि इन तीनों मार्गों से जिस सत्य की खोज की जाती है, वह 'मैं' ही हूँ। 'ओंकार' के विषय में मांडूक्य उपनिषद में विस्तार से बताया गया है कि 'ॐ' ही भूत, भविष्य और वर्तमान है। भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक के माध्यम से अर्जुन को यह दिव्य दृष्टि दे रहे हैं कि वे केवल एक सारथी नहीं, बल्कि संपूर्ण अस्तित्व के नियामक हैं।

इतिहास साक्षी है कि आदि शंकराचार्य से लेकर रामानुजाचार्य तक, सभी महान आचार्यों ने इस श्लोक की व्याख्या करते हुए ईश्वर के 'सगुण' और 'निर्गुण' दोनों रूपों का समन्वय किया है। यह श्लोक हमें सिखाता है कि भक्ति मार्ग में ईश्वर को माता-पिता मानना केवल एक भावना नहीं, बल्कि एक वैज्ञानिक और आध्यात्मिक सत्य है। जब हम कहते हैं 'त्वमेव माता च पिता त्वमेव', तो उसका दार्शनिक आधार यही श्लोक है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

  • 1
    अस्तित्वगत सुरक्षा की भावना: जब साधक यह समझता है कि भगवान ही उसके माता और पिता हैं, तो उसका अकेलापन और असुरक्षा का भाव सदैव के लिए समाप्त हो जाता है।
  • 2
    मानसिक शांति और स्थिरता: 'ओंकार' के ध्यान के साथ इस श्लोक का पाठ करने से मस्तिष्क की तरंगें शांत होती हैं और तनाव (Stress) से मुक्ति मिलती है।
  • 3
    पापों का क्षय: 'पवित्रम्' शब्द की शक्ति से साधक के संचित पापों का प्रभाव कम होता है और अंतःकरण शुद्ध होने लगता है।
  • 4
    ज्ञान की प्राप्ति: 'वेद्यं' स्वरूप का ध्यान करने से बुद्धि कुशाग्र होती है और जटिल विषयों को समझने की क्षमता बढ़ती है।
  • 5
    सकारात्मक ऊर्जा का संचार: वेदों की ऋचाओं के स्मरण से घर और कार्यस्थल पर एक दिव्य सुरक्षा कवच (Aura) निर्मित होता है।
  • 6
    भय से मुक्ति: मृत्यु और अज्ञात का भय समाप्त हो जाता है क्योंकि भक्त जानता है कि वह अपने 'पितामह' की गोद में सुरक्षित है।
  • 7
    कर्मों में कुशलता: 'धाता' के रूप में ईश्वर का स्मरण हमें अपने कर्तव्यों को ईमानदारी से निभाने की प्रेरणा देता है, क्योंकि वे ही कर्मफल दाता हैं।
  • 8
    एकाग्रता में वृद्धि: ओंकार का नाद एकाग्रता (Concentration) बढ़ाने का सबसे शक्तिशाली माध्यम है, जो इस श्लोक का मुख्य अंग है।
  • 9
    भक्ति मार्ग में प्रगति: यह श्लोक भगवान के प्रति अनन्य प्रेम और शरणागति का भाव जागृत करता है, जो मोक्ष का सरलतम मार्ग है।
  • 10
    वैश्विक बंधुत्व: जब हम ईश्वर को सबका पिता मानते हैं, तो समस्त प्राणियों के प्रति दया और प्रेम का भाव स्वतः उत्पन्न होता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

यह लेख 'संपादकीय रूप से तैयार सामग्री' है, जिसे श्रीमद्भगवद्गीता के प्रामाणिक भाष्यों (जैसे शांकरभाष्य और रामानुज भाष्य) तथा वैदिक संहिताओं के गहन अध्ययन के आधार पर संकलित किया गया है। भक्तिलोक की विद्वत मंडली ने इस श्लोक के दार्शनिक पहलुओं को आधुनिक जीवन के संदर्भ में व्याख्यायित करने का प्रयास किया है। यहाँ दी गई जानकारी का उद्देश्य पाठकों को सनातन धर्म के गूढ़ रहस्यों से परिचित कराना और उनके आध्यात्मिक उत्थान में सहायक होना है। हम किसी भी प्रकार के अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं देते, बल्कि शास्त्रों में वर्णित 'तर्कसंगत भक्ति' का समर्थन करते हैं। इस श्लोक की व्याख्या में प्रयुक्त शब्द 'धाता' और 'पितामह' के अर्थों को उपनिषदों के 'ब्रह्म' सिद्धांत के अनुरूप रखा गया है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

शास्त्रों के अनुसार, ब्रह्मा जी को इस जगत का 'पिता' माना जाता है क्योंकि उन्होंने ही प्रजापतियों और समस्त जीवों की रचना की है। चूँकि ब्रह्मा जी की उत्पत्ति भगवान विष्णु (श्रीकृष्ण) से हुई है, इसलिए वे ब्रह्मा के भी पिता हुए। इस नाते, वे संपूर्ण जगत के 'पितामह' (दादा) कहलाते हैं। यह उनके आदि-कारण होने का प्रमाण है।

प्राचीन काल में 'वेदत्रयी' की परंपरा थी। ऋग्वेद ज्ञान का, यजुर्वेद कर्मकांड का और सामवेद उपासना का प्रतिनिधित्व करता है। अथर्ववेद में लौकिक विषयों और शांति कर्मों की प्रधानता है, जबकि ये तीनों वेद मुख्य रूप से यज्ञ और आध्यात्मिक विद्या से जुड़े हैं। भगवान यहाँ स्वयं को समस्त आध्यात्मिक विद्याओं का सार बता रहे हैं, इसलिए इन तीनों का उल्लेख प्रमुखता से किया गया है।

'वेद्यं' का अर्थ है जानने योग्य। समस्त शास्त्रों का अंतिम लक्ष्य उस एक ओंकार या ब्रह्म को जानना ही है। 'पवित्रम्' इसलिए कहा गया है क्योंकि ॐ का उच्चारण करने से मन की मलिनता दूर होती है और आत्मा शुद्ध होती है। यह ब्रह्मांड की मूल ध्वनि है जो परमात्मा का साक्षात स्वरूप है।

'धाता' का अर्थ है 'धारण करने वाला' या 'पोषक'। भगवान केवल सृष्टि रचकर अलग नहीं हो जाते, बल्कि वे ही इस ब्रह्मांड की व्यवस्था को बनाए रखते हैं। वे ही जीवों को उनके कर्मों के अनुसार फल प्रदान करते हैं और संपूर्ण सृष्टि का भरण-पोषण करते हैं। उन्हें 'विधाता' भी कहा जाता है।

हाँ, भगवान के नाम और उनके वचनों का पाठ कभी भी किया जा सकता है। हालांकि, ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) में इसका पाठ करना मानसिक शांति और आध्यात्मिक प्रगति के लिए सर्वोत्तम माना जाता है। शुद्ध मन और श्रद्धा के साथ किया गया पाठ शीघ्र फलदायी होता है।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

मैं इस जगत् का पिता, माता, धाता (पालनकर्ता) और पितामह हूँ। मैं जानने योग्य, पवित्र करने वाला, ओंकार तथा ऋक्, साम और यजुर्वेद भी हूँ।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

ईश्वर हमारे सबसे निकट के सम्बन्धी हैं – पिता से भी अधिक स्नेही, माता से भी अधिक वात्सल्यमयी। उन्हीं की शरण में जाना चाहिए।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

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ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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