राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga) – श्लोक 18
श्लोक १८ में भगवान अपने अनेक गुणों और रूपों का वर्णन करते हैं। Verse 18: The Lord is the goal, sustainer, witness, refuge, etc.
संस्कृत श्लोक
गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत् | प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम् || १८||
gatir bhartā prabhuḥ sākṣī nivāsaḥ śaraṇaṃ suhṛt | prabhavaḥ pralayaḥ sthānaṃ nidhānaṃ bījam avyayam ||18||
पदच्छेद / शब्दार्थ
गति: गति (लक्ष्य); भर्ता: भर्ता (धारण करने वाला); प्रभुः: प्रभु (स्वामी); साक्षी: साक्षी; निवासः: निवास; शरणम्: शरण; सुहृत्: सुहृद् (मित्र); प्रभवः: उत्पत्ति; प्रलयः: प्रलय; स्थानम्: स्थान; निधानम्: निधान (आश्रय); बीजम्: बीज; अव्ययम्: अविनाशी।
हिंदी अनुवाद
मैं गति (परम लक्ष्य) हूँ, भर्ता (धारण करने वाला) हूँ, प्रभु हूँ, साक्षी हूँ, निवास हूँ, शरण हूँ, सुहृत् (हितैषी) हूँ, उत्पत्ति हूँ, प्रलय हूँ, स्थान हूँ, निधान (आश्रय) हूँ और अविनाशी बीज हूँ।
English Translation
I am the goal, the sustainer, the Lord, the witness, the abode, the refuge, the friend, the origin, the dissolution, the foundation, the treasure, and the imperishable seed.
टीका / Commentary
यहाँ भगवान ने अपने अनेक रूपों का वर्णन किया है – वे ही सब कुछ हैं। इससे उनकी सर्वोच्चता और सर्वव्यापकता सिद्ध होती है।