श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 9 (राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga))

अध्याय 9 · श्लोक 19

राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 34 40 मिनट का पठन 137 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च | अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन || १९||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

17 पद
तपामि
तपाता हूँ
अहम्
मैं
अहम्
मैं
वर्षम्
वर्षा
निगृह्णामि
रोकता हूँ
उत्सृजामि
बरसाता हूँ
च
और
अमृतम्
अमृत
च
और
एव
ही
मृत्युः
मृत्यु
च
और
सत्
सत्
असत्
असत्
च
और
अहम्
मैं
अर्जुन
हे अर्जुन।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

मैं सूर्य रूप में तपता हूँ, मैं वर्षा को रोकता और बरसाता हूँ। हे अर्जुन! मैं अमृत और मृत्यु हूँ, तथा सत् और असत् भी मैं ही हूँ।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

ब्रह्मांडीय संचालन और पराशक्ति का सनातन रहस्य

सनातन धर्म, वेद, उपनिषद और विशेष रूप से श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन के माध्यम से संपूर्ण मानवजाति को जो उपदेश दिए हैं, वे केवल दार्शनिक सिद्धांत नहीं हैं, बल्कि जीवन जीने की परम कला और इस ब्रह्मांड के शाश्वत नियमों की जीवंत व्याख्या हैं। श्रीमद्भगवद्गीता का नौवां अध्याय, जिसे 'राजविद्याराजगुह्ययोग' के नाम से जाना जाता है, समस्त योगशास्त्रों का राजा और सभी गुह्य (रहस्य) का भी परम गोपनीय रहस्य है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी ऐश्वर्य शक्ति, योगबल और इस चराचर जगत के साथ अपने अभिन्न संबंध को अत्यंत स्पष्टता के साथ उद्घाटित किया है। प्रस्तुत आलेख में हम गीता के इसी अत्यंत महत्त्वपूर्ण और गहरे अर्थ वाले श्लोक—"तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च | अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन || १९||"—का विस्तार से विश्लेषण करेंगे।

यह श्लोक केवल प्रकृति के भौतिक नियमों का वर्णन नहीं करता, बल्कि यह इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि इस सृष्टि का कण-कण, प्रत्येक ऋतु परिवर्तन, जीवन और मृत्यु का चक्र, तथा दृश्य और अदृश्य जगत सब कुछ उसी एक परम परमात्मा के नियंत्रण और संकल्प पर आधारित है। जब अर्जुन ने भगवान के समग्र स्वरूप को जानने की जिज्ञासा प्रकट की, तब भगवान ने सूर्य, अग्नि, वर्षा, अमृत और मृत्यु के माध्यम से यह समझाया कि किस प्रकार वे इस समस्त चराचर जगत के पालनहार, संहारक और सृष्टिकर्ता दोनों हैं।

भारतीय सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परंपरा में वर्षा को जीवन का आधार माना गया है, क्योंकि जल के बिना जीवन की कल्पना असंभव है। इसी प्रकार, ग्रीष्मकाल में सूर्य के द्वारा तपकर पृथ्वी के जल को खींचना और फिर उसे वर्षा के रूप में पुन: धरती पर लौटाना—यह चक्र भगवान की निरंतर चल रही लोक-कल्याणकारी प्रक्रिया का प्रतीक है। इस लेख के माध्यम से हम न केवल इस श्लोक के शाब्दिक अर्थ को समझेंगे, बल्कि इसके दार्शनिक निहितार्थ, पौराणिक संदर्भ, और आधुनिक जीवन में इसके प्रासंगिक आध्यात्मिक लाभों पर भी विस्तार से प्रकाश डालेंगे।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च |
अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन || १९||


समानार्थी उच्चारण: तपाम्यहम् अहम् वर्षं निगृह्णामि उत्सृजामि च। अमृतं च एव मृत्युः च सत् असत् च अहम् अर्जुन॥

इस श्लोक का पाठ करने की शास्त्रीय विधि यह है कि साधक को प्रातःकाल स्नानादि से निवृत्त होकर, पवित्र मन से भगवान श्रीकृष्ण या गीता ग्रंथ के समक्ष आसन ग्रहण करना चाहिए। श्लोक का उच्चारण स्पष्ट, शुद्ध और लयबद्ध होना चाहिए। इसके प्रत्येक शब्द का उच्चारण करते समय उसके अर्थ का मानसिक चिंतन करना ही इस श्लोक की सबसे उत्तम साधना विधि है। नियमित रूप से इस श्लोक का पाठ करने से मन में ईश्वर के प्रति अटूट विश्वास और समर्पण की भावना जाग्रत होती है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

श्लोक के मर्म को पूरी तरह समझने के लिए इसके एक-एक पद का व्याकरणिक और दार्शनिक विश्लेषण अत्यंत आवश्यक है। नीचे दी गई तालिका में श्लोक के प्रत्येक मुख्य शब्द का सरल हिंदी अर्थ और उसका विस्तृत आध्यात्मिक भावार्थ प्रस्तुत किया गया है:

पद / शब्द (Sanskrit Term) सरल हिंदी अर्थ (Literal Meaning) आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ (Spiritual Interpretation)
तपामि (Tapāmi) मैं तपता हूँ / गर्मी देता हूँ भगवान सूर्य के रूप में अपनी ऊर्जा से संसार को तपाते हैं, जिससे जगत में कर्मशीलता और जीवन का संचार होता है।
अहमहम (Aham aham) मैं ही (अहम् + अहम्) अहंकाररहित परम चेतना का बोध, जो हर क्रिया के मूल में स्वयं परमात्मा के होने की घोषणा करता है।
वर्षम् (Varṣam) वर्षा / वृष्टि प्रकृति के माध्यम से जल का अवतरण, जो समस्त औषधियों और जीवों को जीवन प्रदान करता है।
निगृह्णामि (Nigṛhṇāmi) रोक लेता हूँ / खींच लेता हूँ ग्रीष्मकाल में बादलों या जल को अपने ताप से आकर्षित कर लेना या आवश्यकतानुसार वर्षा को नियंत्रित करना।
उत्सृजामि (Utsṛjāmi) वर्षा करता हूँ / छोड़ता हूँ उचित समय आने पर बादलों के रूप में जल को पुनः धरती पर बरसाना, जो भगवत्कृपा का प्रत्यक्ष रूप है।
अमृतम् (Amṛtam) अमृत / अमरता वह दिव्य तत्व जो जीवों को मोक्ष, शांति और दिव्यता प्रदान करता है, साथ ही जल जो जीवन का अमृत है।
मृत्युः (Mṛtyuḥ) मृत्यु / विनाश शरीर का नाश, जो प्रकृति का एक अनिवार्य नियम है और आत्मा को नया वस्त्र धारण करने का अवसर देता है।
सत् (Sat) सत् / व्यक्त / शाश्वत वह वास्तविकता जो हर काल में विद्यमान है, दृश्यमान जगत और ब्रह्म का प्रगट रूप।
असत् (Asat) असत् / अव्यक्त / माया जो गोचर नहीं है, अप्रगट मूल प्रकृति या कारण रूप, जो भविष्य में प्रगट होने की क्षमता रखती है।
च अर्जुन (Ca Arjuna) और हे अर्जुन! भगवान अपने प्रिय सखा अर्जुन को संबोधित करते हुए यह परम ज्ञान सीधे उनके हृदय में उतार रहे हैं।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

श्रीमद्भगवद्गीता के इस श्लोक की पृष्ठभूमि महाभारत के महायुद्ध के ठीक आरंभ की है, जब कौरव और पाण्डव सेनाएं कुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र में आमने-सामने खड़ी थीं। पांडव पुत्र अर्जुन अपने ही सगे-सम्बन्धियों, गुरुओं और मित्रों को सामने देखकर अत्यधिक विषाद और मोह से घिर गए। उनके हाथ से गाण्डीव धनुष फिसलने लगा और उनका मन कर्तव्यविमूढ़ हो गया। ऐसे संकटपूर्ण और मानसिक उथल-पुथल के क्षण में, जगत के पालनहार भगवान श्रीकृष्ण ने सारथी की भूमिका निभाते हुए अर्जुन को जो ज्ञान दिया, वही श्रीमद्भगवद्गीता के रूप में अमर हो गया।

वैदिक और पौराणिक साहित्यों—विशेषकर वेदों, उपनिषदों और श्रीमद्भागवत महापुराण—में इस बात का बार-बार उल्लेख मिलता है कि संपूर्ण ब्रह्मांड एक महायज्ञ की भांति चल रहा है। सूर्य और अग्नि भगवान के नेत्र और मुख हैं। छांदोग्य उपनिषद और श्वेताश्वतर उपनिषद में इस बात का स्पष्ट विवेचन मिलता है कि कैसे पर्जन्य (वर्षा के देवता) के माध्यम से अन्न उत्पन्न होता है, अन्न से प्राणी बनते हैं और प्राणियों से पुनः यज्ञ का चक्र चलता है। गीता के इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने उसी प्राचीन वैदिक विज्ञान को अत्यंत सरल और संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत किया है।

पौराणिक कथाओं के अनुसार, समुद्र मंथन के समय जिस प्रकार अमृत और विष (जो मृत्यु का दूसरा रूप है) दोनों ही क्षीरसागर से प्रकट हुए थे, और उन दोनों पर नियंत्रण रखने वाले भगवान विष्णु ही थे, उसी प्रकार इस सृष्टि में अमृत (जीवनदायिनी शक्तियां) और मृत्यु (संहारक शक्तियां) दोनों ही उस सर्वोच्च ईश्वर के ही दो पहलू हैं। महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित महाभारत के भीष्म पर्व के अंतर्गत आने वाली श्रीमद्भगवद्गीता का यह श्लोक मनुष्य को उसके संकीर्ण दृष्टिकोण से ऊपर उठाकर संपूर्ण ब्रह्मांड के साथ उसकी एकता स्थापित करने का मार्ग दिखाता है।

जब ऋषि-मुनि तपस्या करते थे, वे सूर्य की ऊष्मा और वर्षा के चक्र को भगवान का ही रूप मानकर उनकी उपासना करते थे। यह ऐतिहासिक और पौराणिक परंपरा हमें सिखाती है कि प्रकृति के साथ हमारा संबंध केवल उपभोग का नहीं, बल्कि आदर और समर्पण का होना चाहिए, क्योंकि प्रकृति का हर एक तत्व सीधे तौर पर परमेश्वर द्वारा संचालित होता है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ (Spiritual Benefits)

श्रीमद्भगवद्गीता के इस महान श्लोक का नियमित पठन, मनन और इसके गूढ़ार्थ का स्मरण करने से साधक को अनेकों आध्यात्मिक, मानसिक और शारीरिक लाभ प्राप्त होते हैं। प्राचीन ऋषियों और आधुनिक आचार्यों द्वारा अनुभूत कुछ प्रमुख लाभ निम्नलिखित हैं:

1. मानसिक शांति और स्थिरता

जीवन के उतार-चढ़ाव, सुख-दुःख और अनिश्चितताओं के बीच इस श्लोक का स्मरण करने से मन में यह विश्वास पैदा होता है कि सब कुछ एक सर्वोच्च नियंत्रण में है, जिससे अनावश्यक चिंता और भय समाप्त हो जाते हैं।

2. सकारात्मक ऊर्जा (Positive Aura) का विकास

दिव्य श्लोकों के नियमित उच्चारण से शरीर के आस-पास एक उच्च कंपकंपी वाली सकारात्मक ऊर्जा का आवरण बनता है, जो नकारात्मक विचारों और मानसिक अवसाद को दूर भगाता है।

3. कार्मिक शुद्धि और आत्मबोध

जब साधक यह समझ जाता है कि अमृत और मृत्यु, सत् और असत् सब कुछ भगवान का ही स्वरूप है, तो उसके भीतर से राग-द्वेष, अहंकार और ईर्ष्या स्वतः समाप्त होने लगते हैं, जिससे कर्मों की शुद्धि होती है।

4. प्रकृति के प्रति कृतज्ञता की भावना

यह श्लोक हमें सिखाता है कि धूप, वर्षा और जीवन-मृत्यु का चक्र ईश्वर का ही प्रसाद है। इसके नियमित चिंतन से मनुष्य पर्यावरण और प्रकृति के प्रति अधिक संवेदनशील और कृतज्ञ बनता है।

5. मृत्यु के भय से मुक्ति

चूंकि श्लोक में भगवान ने स्पष्ट किया है कि 'मृत्यु भी मैं ही हूँ', इसलिए इस सत्य को स्वीकार करने वाले साधक के मन से मृत्यु का स्वाभाविक भय धीरे-धीरे समाप्त हो जाता है और वह जीवन को सहजता से जीता है।

6. भगवान की शरणागति (Bhakti & Surrender)

इस अद्भुत ज्ञान से साधक की बुद्धि में यह दृढ़ हो जाता है कि वह स्वतंत्र नहीं है, बल्कि उस सर्वशक्तिमान की शरण में है। यह शरणागति ही भक्ति मार्ग की सबसे बड़ी उपलब्धि है।

7. एकाग्रता और स्मरण शक्ति में वृद्धि

संस्कृत के इन पवित्र श्लोकों को याद करने और उनके अर्थ पर विचार करने से मस्तिष्क की नसें सक्रिय होती हैं, जिससे विद्यार्थियों और साधकों की स्मरण शक्ति तथा एकाग्रता में उल्लेखनीय सुधार होता है।

8. समग्र स्वास्थ्य और आंतरिक संतुलन

मानसिक तनाव कम होने और आध्यात्मिक संतुष्टि मिलने से शरीर का अंतःस्रावी तंत्र (Endocrine System) संतुलित रहता है, जिससे समग्र शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: Bhaktilok.in के इस प्रतिष्ठित मंच पर प्रस्तुत यह आलेख सनातन धर्म के मूल ग्रंथों—श्रीमद्भगवद्गीता (वेदव्यास रचित महाभारत का अंश), श्रीमद्भागवत महापुराण, और विभिन्न प्रमुख उपनिषदों के अकादमिक और पारंपरिक भाष्यों के गहन अध्ययन के पश्चात तैयार किया गया है। हमारे विद्वान भाषाविदों और आध्यात्मिक शोधकर्ताओं ने यह सुनिश्चित किया है कि पाठकों तक जो अर्थ और भाव पहुंचे, वे पूरी तरह से शास्त्रीय परंपराओं के अनुरूप, प्रामाणिक और तार्किक हों। हमारा उद्देश्य सनातन संस्कृति के इस अमूल्य ज्ञान को आधुनिक पीढ़ी तक अत्यंत सरल, सुबोध और गरिमामयी ढंग से पहुंचाना है, ताकि प्रत्येक साधक अपने जीवन को आध्यात्मिक दृष्टि से समृद्ध कर सके।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

उत्तर: इस श्लोक का मूल संदेश यह है कि इस ब्रह्मांड की समस्त भौतिक और आध्यात्मिक क्रियाएं—चाहे वह सूर्य द्वारा तपना हो, वर्षा का चक्र हो, जीवन (अमृत) हो या मृत्यु (संहार), तथा दृश्य (सत्) और अदृश्य (असत्) जगत हो—सब कुछ भगवान श्रीकृष्ण की सर्वोच्च शक्ति और नियंत्रण के अधीन संचालित होता है। भगवान ही इस संपूर्ण सृष्टि के एकमात्र आधार हैं।

उत्तर: वेदांत दर्शन के अनुसार 'सत्' वह है जो सभी कालों में सत्य है, जो व्यक्त और दृश्यमान ब्रह्मांड है। 'असत्' वह है जो अप्रगट, अव्यक्त या मूल प्रकृति (माया) के रूप में विद्यमान है। भगवान ने इन दोनों ही रूपों को अपना ही स्वरूप बताया है, जिसका अर्थ है कि प्रकट और अप्रगट दोनों अवस्थाओं में केवल परमात्मा ही व्याप्त हैं।

उत्तर: बिल्कुल नहीं। अज्ञानतावश मनुष्य मृत्यु से डरता है क्योंकि वह शरीर को ही सब कुछ मान बैठता है। जब भगवान यह कहते हैं कि "मृत्यु भी मैं ही हूँ", तो इसका आध्यात्मिक अर्थ यह है कि मृत्यु केवल एक अवस्था परिवर्तन है—जीर्ण वस्त्रों को छोड़कर नए वस्त्र धारण करने जैसी प्रक्रिया। इसे ईश्वर का ही स्वरूप मानने से साधक के मन से मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है और वह जीवन के शाश्वत सत्य को सहज भाव से स्वीकार कर लेता है।

उत्तर: दैनिक जीवन में जब हम अनिश्चितताओं, असफलताओं या प्राकृतिक परिवर्तनों का सामना करते हैं, तब इस श्लोक का स्मरण हमें यह याद दिलाता है कि सब कुछ एक उच्च व्यवस्था के तहत हो रहा है। इससे हमारे भीतर धैर्य, संतुलन, प्रकृति के प्रति आदर और ईश्वर के प्रति अटूट समर्पण की भावना विकसित होती है, जो आधुनिक तनावपूर्ण जीवन में मानसिक शांति का सबसे बड़ा साधन है।

उत्तर: यह श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के नवें अध्याय, जिसका नाम 'राजविद्याराजगुह्ययोग' है, का 19वां श्लोक है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को अपने ऐश्वर्य योग का विस्तार से वर्णन करते हुए यह समझाया है कि कैसे वे संपूर्ण ब्रह्मांड के कण-कण में व्याप्त हैं और समस्त चराचर जगत के एकमात्र नियंत्रक हैं।

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"ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे संतु निरामयाः"

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

मैं (सूर्यरूप से) तपता हूँ, वर्षा को रोकता और बरसाता हूँ। हे अर्जुन! मैं अमृत और मृत्यु हूँ, सत् और असत् भी मैं ही हूँ।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

ईश्वर ही जीवन और मृत्यु का स्वामी है। वही सृष्टि के सभी विपरीत युगलों (द्वन्द्वों) का मूल है। उसकी इच्छा से ही सब कुछ होता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 9: राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 19 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 19/34 56% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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