राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga) – श्लोक 19
श्लोक १९ में भगवान सूर्य, वर्षा, अमृत, मृत्यु, सत्-असत् के रूप में वर्णित हैं। Verse 19: The Lord is heat, rain, immortality, death, being and non-being.
संस्कृत श्लोक
तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च | अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन || १९||
tapāmy aham ahaṃ varṣaṃ nigṛhṇāmy utsṛjāmi ca | amṛtaṃ caiva mṛtyuś ca sad asac cāham arjuna ||19||
पदच्छेद / शब्दार्थ
तपामि: तपाता हूँ; अहम्: मैं; अहम्: मैं; वर्षम्: वर्षा; निगृह्णामि: रोकता हूँ; उत्सृजामि: बरसाता हूँ; च: और; अमृतम्: अमृत; च: और; एव: ही; मृत्युः: मृत्यु; च: और; सत्: सत्; असत्: असत्; च: और; अहम्: मैं; अर्जुन: हे अर्जुन।
हिंदी अनुवाद
मैं सूर्य रूप में तपता हूँ, मैं वर्षा को रोकता और बरसाता हूँ। हे अर्जुन! मैं अमृत और मृत्यु हूँ, तथा सत् और असत् भी मैं ही हूँ।
English Translation
I give heat; I withhold and send forth rain; I am immortality and also death; I am both being and non-being, O Arjuna.
टीका / Commentary
भगवान प्रकृति की समस्त क्रियाओं के नियन्ता हैं। वे ही अमृत और मृत्यु हैं, वे ही सत् (व्यक्त) और असत् (अव्यक्त) हैं।