आज का पंचांग (Columbus) | सूर्योदय: ०४:२९ PM | सूर्यास्त: ०५:३३ AM
श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 9 · श्लोक 19

अध्याय 9 · श्लोक 19

राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च | अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन || १९||

tapāmy aham ahaṃ varṣaṃ nigṛhṇāmy utsṛjāmi ca | amṛtaṃ caiva mṛtyuś ca sad asac cāham arjuna ||19||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

तपामि: तपाता हूँ; अहम्: मैं; अहम्: मैं; वर्षम्: वर्षा; निगृह्णामि: रोकता हूँ; उत्सृजामि: बरसाता हूँ; च: और; अमृतम्: अमृत; च: और; एव: ही; मृत्युः: मृत्यु; च: और; सत्: सत्; असत्: असत्; च: और; अहम्: मैं; अर्जुन: हे अर्जुन।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

मैं सूर्य रूप में तपता हूँ, मैं वर्षा को रोकता और बरसाता हूँ। हे अर्जुन! मैं अमृत और मृत्यु हूँ, तथा सत् और असत् भी मैं ही हूँ।

English Translation

I give heat; I withhold and send forth rain; I am immortality and also death; I am both being and non-being, O Arjuna.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

भगवान प्रकृति की समस्त क्रियाओं के नियन्ता हैं। वे ही अमृत और मृत्यु हैं, वे ही सत् (व्यक्त) और असत् (अव्यक्त) हैं।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।