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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 9 · श्लोक 20

अध्याय 9 · श्लोक 20

राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते | ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोकमश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान् || २०||

trai-vidyā māṃ soma-pāḥ pūta-pāpā yajñair iṣṭvā svarga-gatiṃ prārthayante | te puṇyam āsādya surendra-lokam aśnanti divyān divi deva-bhogān ||20||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

त्रै-विद्या: तीनों वेदों के जानने वाले; माम्: मेरी; सोम-पाः: सोमपान करने वाले; पूत-पापाः: पापों से मुक्त; यज्ञैः: यज्ञों द्वारा; इष्ट्वा: पूजा करके; स्वर्ग-गतिम्: स्वर्ग की प्राप्ति; प्रार्थयन्ते: प्रार्थना करते हैं; ते: वे; पुण्यम्: पुण्यमय; आसाद्य: प्राप्त करके; सुरेन्द्र-लोकम्: इन्द्रलोक को; अश्नन्ति: भोगते हैं; दिव्यान्: दिव्य; दिवि: स्वर्ग में; देव-भोगान्: देवताओं के भोग।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

तीनों वेदों को जानने वाले, सोमपान करने वाले, पापों से मुक्त हुए (कर्मकाण्डी) लोग यज्ञों द्वारा मेरी पूजा करके स्वर्ग की प्राप्ति की कामना करते हैं। वे पुण्य का फल पाकर इन्द्रलोक में प्रवेश कर वहाँ दिव्य देवताओं के भोगों को भोगते हैं।

English Translation

Those who study the three Vedas and drink the soma, being purified of sins, worship Me through sacrifices and pray for the heavenly goal. They reach the world of Indra and enjoy divine celestial pleasures.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

यहाँ कर्मकाण्डी वैदिक साधकों का वर्णन है जो यज्ञ करके स्वर्ग की कामना करते हैं। वे भगवान की अप्रत्यक्ष रूप से पूजा करते हैं, किन्तु सकाम भाव से।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।