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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 9 · श्लोक 21

अध्याय 9 · श्लोक 21

राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति | एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते || २१||

te taṃ bhuktvā svarga-lokaṃ viśālaṃ kṣīṇe puṇye martya-lokaṃ viśanti | evaṃ trayī-dharmam anuprapannā gatāgataṃ kāma-kāmā labhante ||21||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

ते: वे; तम्: उस; भुक्त्वा: भोगकर; स्वर्ग-लोकम्: स्वर्गलोक; विशालम्: विशाल; क्षीणे: समाप्त होने पर; पुण्ये: पुण्य के; मर्त्य-लोकम्: मृत्युलोक (पृथ्वी) में; विशन्ति: प्रवेश करते हैं; एवम्: इस प्रकार; त्रयी-धर्मम्: तीन वेदों के धर्म में; अनुप्रपन्नाः: आसक्त हुए; गत-आगतम्: आना-जाना; काम-कामाः: कामनाओं वाले; लभन्ते: प्राप्त करते हैं।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

वे उस विशाल स्वर्गलोक को भोगकर, पुण्य के क्षीण होने पर मृत्युलोक में आ जाते हैं। इस प्रकार तीनों वेदों के धर्म का अनुसरण करने वाले कामनाओं के इच्छुक लोग आवागमन को प्राप्त होते हैं।

English Translation

Having enjoyed the vast heaven, they enter the mortal world when their merits are exhausted. Thus following the rites of the three Vedas, they, desiring enjoyments, obtain the state of going and returning.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

स्वर्ग के भोग समाप्त होने पर पुनः जन्म लेना पड़ता है। यह संसार-चक्र है। इससे मुक्ति निष्काम भक्ति से ही मिलती है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।