राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga) – श्लोक 21
श्लोक २१ में स्वर्ग भोग के बाद पुनः जन्म लेने का वर्णन है। Verse 21: After enjoying heaven, one returns to earth when merits are exhausted.
संस्कृत श्लोक
ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति | एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते || २१||
te taṃ bhuktvā svarga-lokaṃ viśālaṃ kṣīṇe puṇye martya-lokaṃ viśanti | evaṃ trayī-dharmam anuprapannā gatāgataṃ kāma-kāmā labhante ||21||
पदच्छेद / शब्दार्थ
ते: वे; तम्: उस; भुक्त्वा: भोगकर; स्वर्ग-लोकम्: स्वर्गलोक; विशालम्: विशाल; क्षीणे: समाप्त होने पर; पुण्ये: पुण्य के; मर्त्य-लोकम्: मृत्युलोक (पृथ्वी) में; विशन्ति: प्रवेश करते हैं; एवम्: इस प्रकार; त्रयी-धर्मम्: तीन वेदों के धर्म में; अनुप्रपन्नाः: आसक्त हुए; गत-आगतम्: आना-जाना; काम-कामाः: कामनाओं वाले; लभन्ते: प्राप्त करते हैं।
हिंदी अनुवाद
वे उस विशाल स्वर्गलोक को भोगकर, पुण्य के क्षीण होने पर मृत्युलोक में आ जाते हैं। इस प्रकार तीनों वेदों के धर्म का अनुसरण करने वाले कामनाओं के इच्छुक लोग आवागमन को प्राप्त होते हैं।
English Translation
Having enjoyed the vast heaven, they enter the mortal world when their merits are exhausted. Thus following the rites of the three Vedas, they, desiring enjoyments, obtain the state of going and returning.
टीका / Commentary
स्वर्ग के भोग समाप्त होने पर पुनः जन्म लेना पड़ता है। यह संसार-चक्र है। इससे मुक्ति निष्काम भक्ति से ही मिलती है।