श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 9 (राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga))

अध्याय 9 · श्लोक 22

राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 34 42 मिनट का पठन 168 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते | तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् || २२||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

11 पद
अनन्याः
अनन्य (अन्य भाव से रहित)
चिन्तयन्तः
चिन्तन करते हुए
माम्
मेरा
ये
जो
जनाः
मनुष्य
पर्युपासते
सब प्रकार से उपासना करते हैं
तेषाम्
उनकी
नित्य-अभियुक्तानाम्
नित्य-युक्त
योग-क्षेमम्
योगक्षेम (प्राप्ति और रक्षा)
वहामि
वहन करता हूँ
अहम्
मैं।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जो मनुष्य अनन्य भाव से मेरा चिन्तन करते हुए मेरी उपासना करते हैं, उन नित्ययुक्त भक्तों का योगक्षेम मैं स्वयं वहन करता हूँ।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आध्यात्मिक प्रस्तावना, सांस्कृतिक महत्व और ब्रह्मांडीय चेतना

सनातन संस्कृति और वैदिक दर्शन में 'श्रीमद्भगवद्गीता' को समस्त उपनिषदों का सार माना गया है। इसमें कुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए उपदेश केवल एक योद्धा का मार्गदर्शन नहीं करते, बल्कि संपूर्ण मानवता के लिए भौतिक और आध्यात्मिक दुखों से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करते हैं। इसी शृंखला में नवम अध्याय, जिसे 'राजविद्याराजगुह्ययोग' कहा जाता है, अत्यंत गूढ़ और गोपनीय रहस्यों को उजागर करता है। इस अध्याय का बाईसवां (22वां) श्लोक मात्र एक श्लोक नहीं है, बल्कि यह ब्रह्मांड के सर्वोच्च नियंत्रक, पालनहार और परमपिता परमेश्वर का अपने भक्तों के साथ किया गया एक अटूट, शाश्वत और अकाट्य वादा (अभयदान) है।

जब मनुष्य इस भौतिक संसार के प्रपंचों, चिंताओं, अभावों और अनिश्चितताओं से घिर जाता है, तब उसे एक ऐसे सहारे की आवश्यकता होती है जो कभी न टूटे। आधुनिक युग की इस आपाधापी में जहां मानसिक तनाव, असुरक्षा की भावना और भौतिकता की अंधी दौड़ ने मनुष्य की शांति को छीन लिया है, यह श्लोक एक शीतल छांव और अचूक औषधि की तरह कार्य करता है। भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक के माध्यम से यह घोषणा करते हैं कि जो साधक अपनी समस्त चिंताओं, अहंकार और अपेक्षाओं को त्याग कर केवल और केवल मेरा स्मरण करता है, मेरी ही शरण में रहता है और अनन्य भाव से मेरी उपासना करता है, उसके जीवन की समस्त आवश्यकताओं (योग) की पूर्ति और उसकी प्राप्त संपत्तियों की रक्षा (क्षेम) का उत्तरदायित्व स्वयं नारायण अपने कंधों पर उठा लेते हैं। यह सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से मानव मात्र को कर्मयोग और भक्तियोग के उस उच्चतम शिखर पर स्थापित करता है जहाँ भक्त और भगवान के बीच का द्वैध समाप्त होकर केवल अद्वैत प्रेम शेष रहता है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

पाठ करने की विधि: प्रातःकाल स्नान करके पवित्र वस्त्र धारण करें, आसन पर बैठकर शांत चित्त से श्रीमद्भगवद्गीता के इस नवम अध्याय के इस महामंत्र का श्रद्धापूर्वक सस्वर पाठ करें।

अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते |

तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् || २२||


अनान्याः चिन्तयन्तः मां ये जनाः पर्युपासते,

तेषां नित्य-अभियुक्तानां योग-क्षेमं वहामि अहम्।

श्लोकोच्चारण और ध्यान की विधि:

इस श्लोक का पाठ करते समय मन में किसी भी प्रकार की भौतिक चिंता को स्थान न दें। श्लोक की प्रत्येक पंक्ति का उच्चारण स्पष्ट और सस्वर होना चाहिए। 'योग' शब्द का अर्थ है- अप्राप्त वस्तु की प्राप्ति (भरण-पोषण और आवश्यकता पूर्ति), तथा 'क्षेम' का अर्थ है- प्राप्त वस्तु की रक्षा (सुरक्षा एवं संरक्षत्व)। भगवान स्पष्ट कहते हैं कि वे स्वयं (अहम्) इस कार्य का वहन (वहामि) करते हैं। इसका नियमित जप मन को असीम संबल और मानसिक शांति प्रदान करता है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

श्रीमद्भगवद्गीता के प्रत्येक शब्द में वेदों का निचोड़ समाहित है। इस श्लोक के प्रत्येक पद का सूक्ष्म व्याकरणिक और दार्शनिक विश्लेषण नीचे दी गई सारणी में प्रस्तुत किया गया है:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
अनन्याः जो अन्य किसी के आश्रित नहीं हैं / केवल एक के यह अनन्यता (Exclusivity) को दर्शाता है। भक्त जब भगवान के अतिरिक्त संसार के किसी अन्य देवी-देवता, भौतिक साधन या बल पर निर्भर न रहकर पूर्णतः भगवान को ही अपना सर्वस्व मानता है।
चिन्तयन्तः निरंतर चिंतन करते हुए / स्मरण करते हुए मन, वचन और कर्म से निरंतर प्रभु के स्वरूप का ध्यान करना। यह स्मरण क्षणिक न होकर तैलधारावत (तेल की धारा के समान अनवरत) होना चाहिए।
माम् मुझको (भगवान श्रीकृष्ण को) समस्त ब्रह्मांड के आदि कारण, परम पुरुषोत्तम, वासुदेव श्रीकृष्ण को अपना लक्ष्य और केंद्र बिंदु बनाना।
ये जनाः वे मनुष्य / भक्त जन जाति, योनि, लिंग या संप्रदाय के बंधनों से ऊपर उठकर जो भी मनुष्य इस मार्ग का अनुसरण करता है, वह इस कृपा का पात्र बनता है।
पर्युपासते चारों ओर से भली-भांति उपासना करते हैं केवल मानसिक चिंतन ही नहीं, बल्कि सेवा, पूजा, समर्पण और आचरण के माध्यम से पूर्ण विधि-विधान और निष्ठा से प्रभु की आराधना करना।
तेषाम् उन (भक्तों) का भगवान विशेष रूप से उन चुनिंदा अनन्य भक्तों की बात कर रहे हैं जो साधारण संसार से हटकर उच्च आध्यात्मिक स्तर पर आसीन हैं।
नित्याभियुक्तानाम् जो सदा-सदा से मुझसे जुड़े हुए हैं / समाहित हैं योगयुक्त रहना अर्थात जिनका चित्त कभी भी परमात्मा से वियुक्त नहीं होता, वे हर परिस्थिति में ईश्वर के साथ निरंतर जुड़े रहते हैं।
योगक्षेमम् योग (अभाव पूर्ति) और क्षेम (सुरक्षा) योग का अर्थ नए की प्राप्ति और क्षेम का अर्थ पुराने या प्राप्त की रक्षा है। साधक को अपनी रोटी-कपड़ा-मकान या भौतिक-आध्यात्मिक उन्नति की चिंता नहीं करनी पड़ती।
वहाम्यहम् उसका वहन मैं स्वयं करता हूँ (उठाता हूँ) यहाँ 'वहामि' शब्द भगवान के वात्सल्य को दिखाता है। जैसे एक पिता अपने छोटे बच्चे का सारा बोझ स्वयं उठाता है, वैसे ही भगवान अपने भक्त का भार उठाते हैं।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

श्रीमद्भगवद्गीता के इस नवम अध्याय के अवतरण की पृष्ठभूमि महाभारत के उस अति संवेदनशील क्षण से जुड़ी है जब कौरव और पांडव सेनाएं आमने-सामने खड़ी थीं। अर्जुन अपने ही सगे-सम्बन्धियों, गुरुओं और भाइयों को युद्धभूमि में देखकर गहरे मानसिक अवसाद और विषाद से ग्रसित हो जाते हैं। उनका गांडीव धनुष उनके हाथों से छूटने लगता है और वे श्रीकृष्ण से अपने कर्तव्य का मार्ग दिखाने की प्रार्थना करते हैं। तब भगवान श्रीकृष्ण उन्हें सांख्य योग, कर्म योग और ज्ञान योग का उपदेश देते हुए आगे चलकर राजविद्या राजगुह्य योग का ज्ञान प्रदान करते हैं।

इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने सृष्टि के रहस्य, उसकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय का वर्णन करते हुए यह स्पष्ट किया है कि यह संपूर्ण जगत उन्हीं के नियंत्रण में चल रहा है। सामान्य मनुष्य अपनी आजीविका, परिवार के पालन-पोषण और भविष्य की सुरक्षा को लेकर हमेशा भयभीत और चिंतित रहता है। वह दिन-रात धन कमाने और उसे सुरक्षित रखने की दौड़ में लगा रहता है, जिससे उसका आध्यात्मिक विकास रुक जाता है। अर्जुन के माध्यम से संपूर्ण मानव जाति की इस अंतर्निहित कमजोरी को दूर करने के लिए भगवान ने यह क्रांतिकारी घोषणा की।

पौराणिक इतिहास में इस श्लोक के प्रभाव के अनेकों प्रसंग मिलते हैं। भक्त शिरोमणि प्रह्लाद, ध्रुव, मीराबाई, सूरदास और तुलसीदास जैसे महापुरुषों के जीवन में यह श्लोक प्रत्यक्ष रूप से चरितार्थ होता दिखाई देता है। जब भक्त अपनी सारी लोक-लाज और चिंताओं को छोड़कर केवल भगवान के चरणों में समर्पित हो जाता है, तब इतिहास गवाह है कि स्वयं भगवान ने प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उनके जीवन के संकटों को दूर किया है। महाभारत काल में द्रौपदी की लाज बचाने से लेकर सुदामा की गरीबी दूर करने तक, भगवान का यह 'योगक्षेमं वहाम्यहम्' का सिद्धांत हर युग में सत्य साबित हुआ है। यह श्लोक हमें सिखाता है कि मनुष्य का वास्तविक कर्तव्य केवल कर्म करना और ईश्वर का स्मरण करना है, परिणामों की चिंता और पालन-पोषण का दायित्व उस सृष्टिकर्ता का है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

श्रीमद्भगवद्गीता के इस नवम अध्याय के 22वें श्लोक का नियमित पठन, मनन और स्मरण करने से साधक को जीवन के हर क्षेत्र में अलौकिक लाभ प्राप्त होते हैं:

1. अदम्य मानसिक शांति और सुरक्षा का भाव

इस श्लोक का स्मरण करने मात्र से मन में यह दृढ़ विश्वास उत्पन्न हो जाता है कि कोई अदृश्य सर्वोच्च शक्ति हमारी देखभाल कर रही है, जिससे भय और असुरक्षा की भावना सदा के लिए समाप्त हो जाती है।

2. भविष्य की चिंताओं और तनाव से मुक्ति

अक्सर मनुष्य कल की चिंता में आज की शांति को नष्ट कर देता है। यह श्लोक भविष्य के प्रति अति-चिंता को समाप्त कर वर्तमान में जीने और सत्कर्म करने की प्रेरणा देता है।

3. सकारात्मक ऊर्जा और औरा (Aura) का विकास

दिव्य वचनों का उच्चारण करने से शरीर और मन के चारों ओर एक उच्च कंपन वाली सकारात्मक ऊर्जा का आवरण बनता है, जो नकारात्मक विचारों और बुरी दृष्टियों से रक्षा करता है।

4. कर्मों की शुद्धि और निष्काम कर्मयोग

जब भक्त यह जान जाता है कि उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति भगवान करेंगे, तब वह स्वार्थ से ऊपर उठकर निष्काम भाव से अपने कर्तव्यों का पालन करता है, जिससे उसके संचित कर्म शुद्ध होते हैं।

5. समर्पण भाव (Surrender) की प्राप्ति

अहंकार मनुष्य के पतन का सबसे बड़ा कारण है। इस श्लोक का नित्य अभ्यास अहंकार को गलाकर साधक के भीतर संपूर्ण शरणागति (Surrender) के भाव को जाग्रत करता है।

6. कठिन परिस्थितियों में अचल धैर्य

जीवन में आने वाले बड़े से बड़े संकट या आपदा के समय भी भक्त का धैर्य नहीं डगमगाता, क्योंकि उसे विश्वास होता है कि उसका योगक्षेम वहन करने वाला भगवान स्वयं उसके साथ है।

7. ईश्वर के साथ अटूट संबंध की स्थापना

यह श्लोक भक्त और भगवान के बीच एक व्यावसायिक संबंध (पूजा के बदले फल) को समाप्त कर प्रेम और अटूट अपनेपन के संबंध को स्थापित करता है।

8. मोक्ष और परम शांति का मार्ग प्रशस्त

निरंतर प्रभु का चिंतन करते हुए प्राण त्यागने वाला भक्त सीधे भगवतधाम को प्राप्त होता है, जहाँ जन्म-मृत्यु का यह चक्र हमेशा के लिए समाप्त हो जाता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

Bhaktilok.in पर प्रस्तुत यह आलेख सनातन धर्म के मूल ग्रंथों, श्रीमद्भगवद्गीता (वेदव्यास रीत महाभारत का अंश), और पारंपरिक वैदिक विद्वानों के भाष्यों (विशेषकर आदि शंकराचार्य और स्वामी रामसुखदास जी के दृष्टिकोण) के गहन अध्ययन के आधार पर संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है। हमारा उद्देश्य पाठकों तक वेदों, पुराणों और उपनिषदों के शाश्वत ज्ञान को अत्यंत सरल, स्पष्ट और प्रामाणिक हिंदी में पहुंचाना है। इस सामग्री को तैयार करते समय भाषा की शुद्धता, सांस्कृतिक गरिमा और आध्यात्मिक गहराई का विशेष ध्यान रखा गया है ताकि प्रत्येक साधक इससे लाभान्वित हो सके।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

उत्तर: इस श्लोक का सरल अर्थ यह है कि जो मनुष्य अन्य सभी चिंताओं और आश्रयों को छोड़कर केवल भगवान का अनन्य भाव से निरंतर स्मरण और उपासना करता है, उसके जीवन में जो आवश्यक वस्तुएं नहीं हैं उन्हें प्राप्त कराना (योग) और जो वस्तुएं प्राप्त हैं उनकी रक्षा करना (क्षेम)- इन दोनों दायित्वों को भगवान श्रीकृष्ण स्वयं अपने ऊपर लेते हैं।

उत्तर: बिल्कुल नहीं! सनातन धर्म कभी भी अकर्मण्यतु (आलस्य) का समर्थन नहीं करता। गीता के अन्य अध्यायों में भगवान ने कर्म करने पर सबसे अधिक जोर दिया है (कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन)। 'योगक्षेमं वहाम्यहम्' का अर्थ है कि आप निष्काम भाव से अपने निर्धारित कर्तव्य और कर्म करें, तथा परिणामों की व्याकुलता या भय को अपने मन से निकालकर भगवान पर छोड़ दें।

उत्तर: 'अनन्य' का अर्थ है जिसके मन में भगवान के अतिरिक्त किसी अन्य का दूसरा भाव न हो। जो यह जानता हो कि इस संसार में माता, पिता, बंधु, सखा और रक्षक केवल एक परमात्मा ही हैं। जब भक्त का यह अनन्य प्रेम और अटूट विश्वास स्थापित हो जाता है, तभी भगवान इस प्रतिज्ञा को पूरा करते हैं।

उत्तर: इस महामंत्र का पाठ करने के लिए ब्रह्म मुहूर्त या प्रातःकाल का समय सबसे श्रेष्ठ माना गया है। इसके अतिरिक्त, जब भी आप अत्यधिक मानसिक तनाव, असुरक्षा या निर्णय लेने की दुविधा में हों, तब शांत चित्त से इस श्लोक का मानसिक या सस्वर स्मरण करने से तुरंत शांति मिलती है।

उत्तर: यह श्लोक समाज के प्रत्येक वर्ग, गृहस्थ, वानप्रस्थी, विद्यार्थी और संन्यासी सभी के लिए समान रूप से लागू होता है। गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी यदि मनुष्य अपने कर्तव्यों का निर्वाह करते हुए भगवान को अपने जीवन का केंद्रबिंदु बना ले, तो वह इस दिव्य कृपा का पूर्ण अधिकारी बन जाता है।

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संकलन: मुख्य devotional scholar एवं संस्कृत भाषा विशेषज्ञ दल द्वारा संपादित।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

जो मनुष्य अनन्य भाव से मेरा चिन्तन करते हुए नित्य मेरी उपासना करते हैं, उन नित्ययुक्त भक्तों का योग (जो नहीं मिला उसे पहुँचाना) और क्षेम (जो मिला उसकी रक्षा) मैं स्वयं वहन करता हूँ।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

यह भगवान का अमोघ वचन है। जो साधक पूर्ण रूप से भगवान पर निर्भर हो जाता है, भगवान उसकी सभी भौतिक और आध्यात्मिक आवश्यकताओं की पूर्ति स्वयं करते हैं। इससे भक्त निश्चिन्त होकर भक्ति में लग सकता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 9: राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 22 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 22/34 65% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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