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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 9 · श्लोक 22

अध्याय 9 · श्लोक 22

राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते | तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् || २२||

ananyāś cintayanto māṃ ye janāḥ paryupāsate | teṣāṃ nityābhiyuktānāṃ yoga-kṣemaṃ vahāmy aham ||22||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

अनन्याः: अनन्य (अन्य भाव से रहित); चिन्तयन्तः: चिन्तन करते हुए; माम्: मेरा; ये: जो; जनाः: मनुष्य; पर्युपासते: सब प्रकार से उपासना करते हैं; तेषाम्: उनकी; नित्य-अभियुक्तानाम्: नित्य-युक्त; योग-क्षेमम्: योगक्षेम (प्राप्ति और रक्षा); वहामि: वहन करता हूँ; अहम्: मैं।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

जो मनुष्य अनन्य भाव से मेरा चिन्तन करते हुए मेरी उपासना करते हैं, उन नित्ययुक्त भक्तों का योगक्षेम मैं स्वयं वहन करता हूँ।

English Translation

To those who worship Me with single-minded devotion, thinking of Me always, and who are ever-steadfast, I provide what they lack and preserve what they have.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

यह अत्यन्त प्रसिद्ध श्लोक है। भगवान वादा करते हैं कि वे अपने अनन्य भक्तों की समस्त आवश्यकताओं की पूर्ति और उनकी सम्पत्ति की रक्षा स्वयं करते हैं।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।