राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga) – श्लोक 22
श्लोक २२ में भगवान अपने अनन्य भक्तों के योगक्षेम का भार लेने का वचन देते हैं। Verse 22: The Lord takes care of the needs of those who worship Him exclusively.
संस्कृत श्लोक
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते | तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् || २२||
ananyāś cintayanto māṃ ye janāḥ paryupāsate | teṣāṃ nityābhiyuktānāṃ yoga-kṣemaṃ vahāmy aham ||22||
पदच्छेद / शब्दार्थ
अनन्याः: अनन्य (अन्य भाव से रहित); चिन्तयन्तः: चिन्तन करते हुए; माम्: मेरा; ये: जो; जनाः: मनुष्य; पर्युपासते: सब प्रकार से उपासना करते हैं; तेषाम्: उनकी; नित्य-अभियुक्तानाम्: नित्य-युक्त; योग-क्षेमम्: योगक्षेम (प्राप्ति और रक्षा); वहामि: वहन करता हूँ; अहम्: मैं।
हिंदी अनुवाद
जो मनुष्य अनन्य भाव से मेरा चिन्तन करते हुए मेरी उपासना करते हैं, उन नित्ययुक्त भक्तों का योगक्षेम मैं स्वयं वहन करता हूँ।
English Translation
To those who worship Me with single-minded devotion, thinking of Me always, and who are ever-steadfast, I provide what they lack and preserve what they have.
टीका / Commentary
यह अत्यन्त प्रसिद्ध श्लोक है। भगवान वादा करते हैं कि वे अपने अनन्य भक्तों की समस्त आवश्यकताओं की पूर्ति और उनकी सम्पत्ति की रक्षा स्वयं करते हैं।