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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 9 · श्लोक 23

अध्याय 9 · श्लोक 23

राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः | तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम् || २३||

ye 'py anya-devatā bhaktā yajante śraddhayānvitāḥ | te 'pi mām eva kaunteya yajanty avidhi-pūrvakam ||23||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

ये: जो; अपि: भी; अन्य-देवताः: अन्य देवताओं के; भक्ताः: भक्त; यजन्ते: पूजा करते हैं; श्रद्धया: श्रद्धा से; अन्विताः: युक्त; ते: वे; अपि: भी; माम्: मुझे; एव: ही; कौन्तेय: हे कुन्तीपुत्र; यजन्ति: यज्ञ करते हैं; अविधि-पूर्वकम्: अविधिपूर्वक (गलत विधि से)।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

हे कौन्तेय! जो भक्त अन्य देवताओं को श्रद्धापूर्वक पूजते हैं, वे भी मुझे ही पूजते हैं, किन्तु अविधिपूर्वक।

English Translation

Even those who worship other deities with faith, O son of Kunti, they also worship Me alone, but in an improper way.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

यहाँ भगवान स्पष्ट करते हैं कि अन्ततः सारी पूजा उन्हीं की होती है, क्योंकि सभी देवता उनके ही विभूतियाँ हैं। लेकिन बिना उनके ज्ञान के की गई पूजा अविधिपूर्वक (अनधिकारिक) होती है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।