राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga) – श्लोक 23
श्लोक २३ में बताया गया कि अन्य देवताओं की पूजा भी अप्रत्यक्ष रूप से भगवान की ही पूजा है, किन्तु अविधिपूर्वक। Verse 23: Worship of other deities is indirect worship of the Lord.
संस्कृत श्लोक
येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः | तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम् || २३||
ye 'py anya-devatā bhaktā yajante śraddhayānvitāḥ | te 'pi mām eva kaunteya yajanty avidhi-pūrvakam ||23||
पदच्छेद / शब्दार्थ
ये: जो; अपि: भी; अन्य-देवताः: अन्य देवताओं के; भक्ताः: भक्त; यजन्ते: पूजा करते हैं; श्रद्धया: श्रद्धा से; अन्विताः: युक्त; ते: वे; अपि: भी; माम्: मुझे; एव: ही; कौन्तेय: हे कुन्तीपुत्र; यजन्ति: यज्ञ करते हैं; अविधि-पूर्वकम्: अविधिपूर्वक (गलत विधि से)।
हिंदी अनुवाद
हे कौन्तेय! जो भक्त अन्य देवताओं को श्रद्धापूर्वक पूजते हैं, वे भी मुझे ही पूजते हैं, किन्तु अविधिपूर्वक।
English Translation
Even those who worship other deities with faith, O son of Kunti, they also worship Me alone, but in an improper way.
टीका / Commentary
यहाँ भगवान स्पष्ट करते हैं कि अन्ततः सारी पूजा उन्हीं की होती है, क्योंकि सभी देवता उनके ही विभूतियाँ हैं। लेकिन बिना उनके ज्ञान के की गई पूजा अविधिपूर्वक (अनधिकारिक) होती है।