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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 9 · श्लोक 24

अध्याय 9 · श्लोक 24

राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च | न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते || २४||

ahaṃ hi sarva-yajñānāṃ bhoktā ca prabhur eva ca | na tu mām abhijānanti tattvenātaś cyavanti te ||24||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

अहम्: मैं; हि: निश्चय ही; सर्व-यज्ञानाम्: सब यज्ञों का; भोक्ता: भोक्ता; च: और; प्रभु: स्वामी; एव: ही; च: भी; न: नहीं; तु: परन्तु; माम्: मुझे; अभिजानन्ति: जानते हैं; तत्त्वेन: तत्त्व से; अतः: इसलिए; च्यवन्ति: गिर जाते हैं; ते: वे।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

क्योंकि मैं ही सब यज्ञों का भोक्ता और प्रभु हूँ। परन्तु वे मुझे तत्त्व से नहीं जानते, इसलिए (स्वर्ग से) गिर जाते हैं।

English Translation

For I alone am the enjoyer and the Lord of all sacrifices. But they do not know Me in truth; therefore they fall (from the heavenly path).

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

भगवान ही सब यज्ञों के फल के भोक्ता और स्वामी हैं। जो यह नहीं जानते, वे यज्ञों के सीमित फल (स्वर्ग) को भोगकर पुनः गिर जाते हैं।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।