राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga) – श्लोक 25
श्लोक २५ में विभिन्न उपासकों को मिलने वाले विभिन्न फलों का वर्णन है। Verse 25: Worshipers go to different destinations based on their object of worship.
संस्कृत श्लोक
यान्ति देवव्रता देवान्पितृ़न्यान्ति पितृव्रताः | भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम् || २५||
yānti deva-vratā devān pitṝn yānti pitṛ-vratāḥ | bhūtāni yānti bhūtejyā yānti mad-yājino 'pi mām ||25||
पदच्छेद / शब्दार्थ
यान्ति: जाते हैं; देव-व्रता: देवताओं के उपासक; देवान्: देवताओं को; पितृ़न्: पितरों को; यान्ति: जाते हैं; पितृ-व्रताः: पितरों के उपासक; भूतानि: भूत-प्रेत; यान्ति: जाते हैं; भूत-इज्याः: भूतों की पूजा करने वाले; यान्ति: जाते हैं; मत्-याजिनः: मेरे उपासक; अपि: भी; माम्: मुझे।
हिंदी अनुवाद
देवताओं के उपासक देवताओं को जाते हैं, पितरों के उपासक पितरों को, भूतों की पूजा करने वाले भूतों को जाते हैं, और मेरे उपासक मुझे ही प्राप्त होते हैं।
English Translation
Those who worship the gods go to the gods; those who worship the ancestors go to the ancestors; those who worship the ghosts go to the ghosts; but those who worship Me come to Me.
टीका / Commentary
यह श्लोक उपासना के फल में भेद दिखाता है। जैसी भावना, वैसी प्राप्ति। भगवान के उपासकों को सर्वोच्च फल मिलता है।