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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 9 · श्लोक 26

अध्याय 9 · श्लोक 26

राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति | तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः || २६||

patraṃ puṣpaṃ phalaṃ toyaṃ yo me bhaktyā prayacchati | tad ahaṃ bhakty-upahṛtam aśnāmi prayatātmanaḥ ||26||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

पत्रम्: पत्ता; पुष्पम्: फूल; फलम्: फल; तोयम्: जल; यः: जो; मे: मुझे; भक्त्या: भक्ति से; प्रयच्छति: अर्पित करता है; तत्: उसे; अहम्: मैं; भक्ति-उपहृतम्: भक्तिपूर्वक अर्पित; अश्नामि: स्वीकार करता हूँ; प्रयत-आत्मनः: शुद्ध चित्त वाले (भक्त) का।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

जो कोई भक्ति से मुझे पत्र, पुष्प, फल या जल अर्पण करता है, उस प्रयतचित्त (शुद्ध हृदय) भक्त का वह भक्तिपूर्वक अर्पित किया हुआ पदार्थ मैं स्वीकार करता हूँ।

English Translation

If one offers Me with love and devotion a leaf, a flower, a fruit, or water, I accept that offering from the pure-hearted.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

यह अत्यन्त महत्वपूर्ण श्लोक है जो भक्ति की सरलता और सर्वसुलभता को दर्शाता है। भगवान को महँगे भोग नहीं, बल्कि प्रेमपूर्वक अर्पित किया हुआ तुच्छ से तुच्छ पदार्थ भी प्रिय है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।