राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga) – श्लोक 27

श्लोक २७ में भगवान सब कर्म उन्हें अर्पित करने की प्रेरणा देते हैं। Verse 27: Whatever you do, offer it to the Lord.

संस्कृत श्लोक

यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् | यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् || २७||

yat karoṣi yad aśnāsi yaj juhoṣi dadāsi yat | yat tapasyasi kaunteya tat kuruṣva mad-arpaṇam ||27||

पदच्छेद / शब्दार्थ

यत्: जो; करोषि: तू करता है; यत्: जो; अश्नासि: तू खाता है; यत्: जो; जुहोषि: तू हवन करता है; ददासि: तू दान देता है; यत्: जो; तपस्यसि: तू तप करता है; कौन्तेय: हे कुन्तीपुत्र; तत्: उसे; कुरुष्व: कर; मत्-अर्पणम्: मुझे अर्पित कर।

हिंदी अनुवाद

हे कौन्तेय! तू जो कुछ करता है, जो खाता है, जो हवन करता है, जो दान देता है, और जो तप करता है – उसे मुझे अर्पित करके कर।

English Translation

Whatever you do, whatever you eat, whatever you offer in sacrifice, whatever you give away, and whatever austerities you perform, O son of Kunti, do that as an offering to Me.

टीका / Commentary

यहाँ भगवान सभी क्रियाओं को उन्हें समर्पित करने की सीख देते हैं। इससे कर्म योग और भक्ति का समन्वय होता है। सब कुछ भगवान के लिए करने से बंधन नहीं होता।