श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 9 (राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga))

अध्याय 9 · श्लोक 27

राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 34 51 मिनट का पठन 147 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् | यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् || २७||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

13 पद
यत्
जो
करोषि
तू करता है
यत्
जो
अश्नासि
तू खाता है
यत्
जो
जुहोषि
तू हवन करता है
ददासि
तू दान देता है
यत्
जो
तपस्यसि
तू तप करता है
कौन्तेय
हे कुन्तीपुत्र
तत्
उसे
कुरुष्व
कर
मत्-अर्पणम्
मुझे अर्पित कर।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

हे कौन्तेय! तू जो कुछ करता है, जो खाता है, जो हवन करता है, जो दान देता है, और जो तप करता है – उसे मुझे अर्पित करके कर।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्त्व

सनातन धर्म के सार्वकालिक, प्रकाशपुंज और मुमुक्षुजनों के लिए मोक्ष मार्ग का कंपास माने जाने वाले श्रीमद्भगवद्गीता के नवें अध्याय (राजविद्याराजगुह्ययोग) का यह सत्ताईसवाँ श्लोक वस्तुतः संपूर्ण वेदों, उपनिषदों और दर्शन शास्त्रों का निचोड़ प्रस्तुत करता है। मानव जीवन की सबसे बड़ी समस्या 'कर्म और उसके बंधनों' से मुक्ति की है। संसार में जो भी प्राणी जन्म लेता है, उसे जीवन निर्वाह के लिए कुछ न कुछ कर्म करना ही पड़ता है। खाना, पीना, यज्ञ करना, दान देना, तपस्या करना और यहाँ तक कि श्वास लेना भी कर्म के दायरे में आता है। परंतु इन साधारण मानवीय क्रियाओं को जब परम ब्रह्म परमात्मा की प्रसन्नता के लिए समर्पित कर दिया जाता है, तब वे साधारण कर्म नहीं रह जाते, अपितु वे महायज्ञ और परम भक्ति का रूप धारण कर लेते हैं।

भक्तिलोक डॉट इन (Bhaktilok.in) के इस विशेष आध्यात्मिक स्तंभ में हम इसी परम पावन श्लोक "यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् | यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् ||" के आंतक और बाह्य दोनों आयामों का सूक्ष्म विश्लेषण करेंगे। यह श्लोक मनुष्य को अहंकेंद्रित जीवन शैली से निकालकर भगवत्केंद्रित जीवन शैली की ओर अग्रसर करता है। जब कर्ता यह मान लेता है कि वह स्वयं कुछ नहीं कर रहा है, बल्कि प्रकृति के गुणों द्वारा सब कुछ संचालित हो रहा है और वह हर कर्म को भगवान श्रीकृष्ण को अर्पित कर रहा है, तब उसके जीवन से नैराश्य, संताप, और कर्मफल का भय सदा के लिए तिरोहित हो जाता है।

सांस्कृतिक और दार्शनिक दृष्टिकोण से यह श्लोक भारतीय मनीषा की उस महान दृष्टि का परिचायक है जहाँ 'भोग' को भी 'योग' में बदला जा सकता है। आधुनिक युग की इस आपाधापी में जहाँ मनुष्य मानसिक तनाव, अवसाद और दिशाहीनता से ग्रस्त है, यह श्लोक एक अचूक औषधि की तरह कार्य करता है। यह सिखाता है कि अपने कर्तव्यों का त्याग किए बिना, केवल अपनी आंतरिक मनोवृत्ति बदलकर, व्यक्ति कैसे इस भवसागर को तर सकता है और परम शांति को प्राप्त कर सकता है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्।

यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्॥ २७॥


(संस्कृत पदावलियों का सस्वर पाठ करने से चित्त की वृत्तियाँ शांत होती हैं और एकाग्रता बढ़ती है।)

श्लोक का अन्वय:

कौन्तेय! यत् करोषि, यत् अश्नासि, यत् जुहोषि, यत् ददासि, यत् तपस्यसि, तत् मदर्पणम् कुरुष्व।

श्लोकोच्चारण एवं ध्यान की विधि:

इस श्लोक का प्रातःकाल स्नान करने के पश्चात पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके पूर्वापर पवित्र आसन पर बैठकर कम से कम 108 बार मानसिक जप करना चाहिए। प्रत्येक कर्म (भोजन, कार्य, दान आदि) से पूर्व यदि इस श्लोक का स्मरण कर लिया जाए, तो वह कर्म स्वतः ही यज्ञ में परिवर्तित हो जाता है। साधक को चाहिए कि वह अपने इष्टदेव श्री कृष्ण के स्वरूप का अपने हृदय में ध्यान करते हुए इस श्लोक के भाव को अपने रोम-रोम में बसा ले।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

यहाँ श्लोक के प्रत्येक पद का व्याकरणिक, सरल तथा आध्यात्मिक अर्थ प्रस्तुत किया गया है जिससे साधक को इसकी गहराई का सहज बोध हो सके:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
यत् (Yat) जो कुछ भी संसार में प्रयुक्त होने वाली समस्त सामग्रियाँ और चेष्टाएँ जो प्रकृति के अंतर्गत आती हैं।
करोषि (Karoshi) तू करता है दैनिक जीवन के छोटे-बड़े व्यावसायिक, सामाजिक और शारीरिक कर्म।
यत् (Yat) जो कुछ जीव की पोषण प्रक्रिया से संबंधित।
अश्नासि (Ashnasi) तू खाता है / ग्रहण करता है अन्न ग्रहण करना केवल शरीर पोषण नहीं, बल्कि जठराग्नि में आहुति देना है; इसे भी भगवद् प्रसाद मानना।
यत् (Yat) जो कुछ धार्मिक अनुष्ठानों और यज्ञों से संबंधित।
जुहोषि (Juhoshi) तू हवन करता है देवताओं की तुष्टि के लिए किए जाने वाले अग्निहोत्र, यज्ञ और हवन कर्म।
ददासि (Dadasi) तू दान देता है दीन-दुखियों की सहायता, ब्राह्मण भोजन, और परोपकार के कार्य।
यत् (Yat) जो कुछ आंतरिक साधना से जुड़ा हुआ।
तपस्यसि (Tapasyasi) तू तपस्या करता है धर्म की रक्षा के लिए शारीरिक, मानसिक और वाचिक कष्ट सहना।
कौन्तेय (Kaunteya) हे कुंतीपुत्र (अर्जुन)! अर्जुन को संबोधित करते हुए यह याद दिलाना कि वह महान माता कुंती का पुत्र है, अतः उसे महान आचरण करना चाहिए।
तत् (Tat) उस सबको अपने सम्पूर्ण जीवन और उसके परिणामों को।
मदर्पणम् (Madarpanam) मेरे (भगवान के) अर्पण कर्त्तापन के अहंकार का पूर्ण विसर्जन और भगवान को ही सब कुछ का स्वामी मानना।
कुरुष्व (Kurushva) तू कर भगवान का प्रत्यक्ष आदेश, जिसमें साधक को कर्महीन न होकर कर्मशील रहने की प्रेरणा दी गई है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

महाभारत के भीषण युद्ध के मुहाने पर जब कौरव और पाण्डव सेना आमने-सामने खड़ी थीं, तब धनुर्धर अर्जुन विषादग्रस्त होकर अपने रथ पर बैठ गए थे। सगे-सम्बन्धियों को सामने देखकर उनका गाण्डीव धनुष हाथ से छूटने लगा था। ऐसे संकटपूर्ण और निर्णायक क्षण में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन के सारथी की भूमिका निभाते हुए उन्हें जो उपदेश दिया, वही आज 'श्रीमद्भगवद्गीता' के नाम से सम्पूर्ण विश्व में पूजित है। राजविद्याराजगुह्ययोग नामक नवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने गूढ से गूढतम रहस्यों का उद्घाटन किया है।

वेदों और उपनिषदों में यज्ञ और कर्मों का विधान तो विस्तार से मिलता है, परंतु आम मनुष्य के लिए यह समझना कठिन था कि वह अपने सामान्य जीवन, जैसे भोजन करने या खेत में काम करने को यज्ञ कैसे बना सकता है। महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित महाभारत के इस अंश में भगवान कृष्ण ने इस दुविधा को हमेशा के लिए समाप्त कर दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि कर्मों का फल ही मनुष्य को बार-बार चौरासी लाख योनियों के बंधन में बांधता है। यदि कर्मों के साथ 'मैं कर्ता हूँ' (अहंकार) और 'यह फल मुझे मिलना चाहिए' (आसक्ति) का भाव जुड़ा हुआ है, तो वह कर्म बंधनकारक है।

इसके विपरीत, जब मनुष्य अपने हर छोटे-बड़े कार्य को भगवान के चरणों में समर्पित कर देता है, तब वह अश्वमेध यज्ञ करने जितना पुण्य और मुक्ति का अधिकारी बन जाता है। पौराणिक कथाओं में प्रह्लाद, ध्रुव, और शबरी जैसे महान भक्तों का जीवन इस बात का प्रमाण है कि उन्होंने लौकिक कर्मों को करते हुए भी भगवान को ही अपना सर्वस्व माना और भवसागर से तर गए। भगवान श्रीकृष्ण का यह श्लोक अर्जुन के माध्यम से पूरी मानव जाति को एक ऐसा सुरक्षा कवच प्रदान करता है, जिसे अपनाकर कोई भी गृहस्थ या संन्यासी भवसागर के बंधनों से मुक्त हो सकता है।

इस शास्त्रीय पृष्ठभूमि से यह भली-भांति स्पष्ट होता है कि गीता का यह श्लोक केवल दार्शनिक चर्चा का विषय नहीं है, अपितु यह व्यावहारिक जीवन जीने की एक अचूक कला है। इसमें महर्षि वेद व्यास और साक्षात योगेश्वर श्रीकृष्ण की वह करुणा झलकती है जो वे अपने भक्तों को हर प्रकार के मानसिक और कर्मिक संताप से मुक्त देखना चाहते हैं।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

इस परम पवित्र श्लोक के नित्य स्मरण, मनन और आचरण से साधक को जीवन में निम्नलिखित अतुलनीय आध्यात्मिक व मानसिक लाभ प्राप्त होते हैं:

1. कर्म बंधनों से मुक्ति

जब सारे कर्म ईश्वर को समर्पित हो जाते हैं, तो उनके अच्छे या बुरे फल का कर्ता भगवान स्वयं बन जाते हैं, जिससे साधक पाप और पुण्य दोनों के बंधनों से मुक्त होकर सहज रूप से मुक्तावस्था को प्राप्त होता है।

2. मानसिक शांति और तनाव मुक्ति

परिणाम की चिंता (फलता) से मुक्ति मिलने के कारण मनुष्य का मन अनावश्यक चिंताओं, तनाव और अवसाद से सुरक्षित रहता है। वह वर्तमान क्षण में पूरी एकाग्रता के साथ कार्य करता है।

3. अहंकार का शमन

'मैंने किया है' (कर्तापन का भाव) का अहंकार व्यक्ति के आंतरिक विकास में सबसे बड़ी बाधा है। मदर्पणम् के भाव से यह अहंकार स्वतः गल जाता है और साधक में विनम्रता एवं सरलता का विकास होता है।

4. सकारात्मक ऊर्जा का संचार (Positive Aura)

दिव्य चेतना के साथ जुड़ने से व्यक्ति का सूक्ष्म शरीर और औरा (Aura) शुद्ध होता है। नकारात्मक विचार, ईर्ष्या, द्वेष और मोह जैसी आसुरी वृत्तियाँ उसके पास फटक नहीं पातीं।

5. जीवन के हर कार्य की पवित्रता

खाना, पीना, सोना और उठना—सभी साधारण शारीरिक क्रियाएँ भी जब भगवत्समर्पण भाव से की जाती हैं, तो वे महायज्ञ में बदल जाती हैं और साधक को आंतरिक दिव्यता प्रदान करती हैं।

6. भगवान की अहैतुकी कृपा

जो भक्त अपने जीवन का सब कुछ अपने आराध्य को सौंप देता है, भगवान योगक्षेम (उसकी रक्षा और आवश्यकताओं की पूर्ति) का भार स्वयं उठा लेते हैं (योगक्षेमं वहाम्यहम्)।

7. एकाग्रता और निर्णय क्षमता में वृद्धि

अस्थिर मन भगवान के चरणों में केंद्रित होने से तीक्ष्ण और स्थिर हो जाता है, जिससे कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी उचित और न्यायसंगत निर्णय लेने की क्षमता विकसित होती है।

8. जन्म-मृत्यु के चक्र से छुटकारा

समर्पण की पराकाष्ठा ही मोक्ष है। इस साधना से अंतःकरण पूर्णतः शुद्ध हो जाता है और जीव आवागमन के चक्र से छूटकर परमधाम को प्राप्त होता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: Bhaktilok.in पर प्रकाशित यह आलेख वेदों, श्रीमद्भगवद्गीता (श्रीमद्भगवद्गीता यथासंरूप, महर्षि वेद व्यास रचित महाभारत), तथा प्रामाणिक वैष्णव आचार्यों (जैसे आदि शंकराचार्य, स्वामी रामसुखदास जी और श्रील प्रभुपाद) की टीकाओं के गहन अध्ययन और शोध के आधार पर तैयार किया गया है। हमारा मुख्य उद्देश्य सनातन धर्म के मूल ग्रंथों के गूढ़ रहस्यों को आधुनिक पाठकों तक अत्यंत सरल, प्रामाणिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ पहुँचाना है।

इस सामग्री के निर्माण में उच्च कोटि की भाषाई शुद्धता (संस्कृत व्याकरण एवं हिंदी शब्दावली) और विषय की गहराई का विशेष ध्यान रखा गया है ताकि प्रत्येक पाठक को वास्तविक आध्यात्मिक लाभ मिल सके। किसी भी प्रकार की धार्मिक भ्रांति से दूर रहकर, यह लेख शुद्ध भक्ति और कर्मयोग के मार्ग को आलोकित करता है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

इस श्लोक का दैनिक जीवन में प्रयोग अत्यंत सरल है। आप जब भी भोजन करने बैठें, तो मन ही मन भोजन भगवान को अर्पित करके खाएँ (प्रसाद बुद्धि से)। जब आप कार्यालय या घर में कोई कार्य करें, तो यह भाव रखें कि आप भगवान के निमित्त उनकी सेवा के रूप में कार्य कर रहे हैं। इस प्रकार आपके सारे कर्म स्वतः भगवत्समर्पण बन जाते हैं।

बिल्कुल नहीं! भगवान श्रीकृष्ण ने श्लोक के अंत में स्पष्ट रूप से 'कुरुष्व' (अर्थात तू कर्म कर) कहा है। समर्पण का अर्थ कर्म का त्याग नहीं, बल्कि कर्म में आसक्ति और अहंकार का त्याग है। एक सच्चा कर्मयोगी साधारण व्यक्ति से अधिक ऊर्जा, उत्साह और निपुणता के साथ कार्य करता है, क्योंकि उसके मन में असफलता का भय या अहंकार नहीं होता।

यह श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के नवें अध्याय (राजविद्याराजगुह्ययोग) का सत्ताईसवाँ (२७) श्लोक है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने भक्ति के सबसे गोपनीय और सरल रहस्यों का वर्णन किया है।

नहीं, गीता के श्लोक सार्वभौमिक हैं। इनके पाठ और मनन के लिए किसी कठोर दीक्षा की आवश्यकता नहीं होती। श्रद्धा, पवित्र भावना और निरंतरता के साथ कोई भी व्यक्ति किसी भी समय इस श्लोक का पाठ या मानसिक जप कर सकता है।

अधिकांश मानसिक तनाव इस बात से उत्पन्न होता है कि "परिणाम मेरे मन मुताबिक होगा या नहीं?" जब आप अपना हर कर्म और उसका परिणाम भगवान को सौंप देते हैं, तब आपके कंधों से असफलता का बोझ उतर जाता है। आप केवल कर्म करने के लिए स्वतंत्र रह जाते हैं और परिणाम भगवान पर छोड़ देते हैं, जिससे मन में असीम शांति का अनुभव होता है।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

हे कुन्तीपुत्र! तू जो कुछ भी करता है, जो खाता है, जो हवन करता है, जो दान देता है, और जो तप करता है, उसे मुझे अर्पित करके कर।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

सभी कर्मों को ईश्वर को समर्पित कर देने से कर्म बंधन का कारण नहीं रहते। यही कर्मयोग है। इससे मनुष्य निष्काम होकर कर्तव्य करता है और मुक्ति की ओर बढ़ता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 9: राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 27 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 27/34 79% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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