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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 9 · श्लोक 27

अध्याय 9 · श्लोक 27

राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् | यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् || २७||

yat karoṣi yad aśnāsi yaj juhoṣi dadāsi yat | yat tapasyasi kaunteya tat kuruṣva mad-arpaṇam ||27||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

यत्: जो; करोषि: तू करता है; यत्: जो; अश्नासि: तू खाता है; यत्: जो; जुहोषि: तू हवन करता है; ददासि: तू दान देता है; यत्: जो; तपस्यसि: तू तप करता है; कौन्तेय: हे कुन्तीपुत्र; तत्: उसे; कुरुष्व: कर; मत्-अर्पणम्: मुझे अर्पित कर।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

हे कौन्तेय! तू जो कुछ करता है, जो खाता है, जो हवन करता है, जो दान देता है, और जो तप करता है – उसे मुझे अर्पित करके कर।

English Translation

Whatever you do, whatever you eat, whatever you offer in sacrifice, whatever you give away, and whatever austerities you perform, O son of Kunti, do that as an offering to Me.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

यहाँ भगवान सभी क्रियाओं को उन्हें समर्पित करने की सीख देते हैं। इससे कर्म योग और भक्ति का समन्वय होता है। सब कुछ भगवान के लिए करने से बंधन नहीं होता।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।