राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga) – श्लोक 28

श्लोक २८ में कर्मों को भगवान को अर्पित करने से फल-बन्धन से मुक्ति और भगवत्प्राप्ति का वर्णन है। Verse 28: Offering actions to the Lord frees one from karma and leads to Him.

संस्कृत श्लोक

शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः | संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि || २८||

śubhāśubha-phalair evaṃ mokṣyase karma-bandhanaiḥ | sannyāsa-yoga-yuktātmā vimukto mām upaiṣyasi ||28||

पदच्छेद / शब्दार्थ

शुभ-अशुभ-फलैः: शुभ और अशुभ फलों से; एवम्: इस प्रकार; मोक्ष्यसे: तू मुक्त हो जाएगा; कर्म-बन्धनैः: कर्मों के बन्धनों से; संन्यास-योग-युक्त-आत्मा: संन्यासयोग से युक्त चित्त वाला; विमुक्तः: मुक्त होकर; माम्: मुझे; उपैष्यसि: प्राप्त होगा।

हिंदी अनुवाद

इस प्रकार तू शुभाशुभ फलों वाले कर्म-बन्धनों से मुक्त हो जाएगा। संन्यासयोग से युक्त चित्त होकर मुक्त हो तू मुझे प्राप्त होगा।

English Translation

Thus you will be freed from the bondage of actions and their good and evil fruits. With your mind thus fixed on the yoga of renunciation, you will be liberated and come to Me.

टीका / Commentary

सब कर्म भगवान को अर्पित करने से फल-बन्धन नहीं रहता। यही सच्चा संन्यास (त्याग) है। इस प्रकार मुक्त होकर भक्त भगवान को प्राप्त होता है।