राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga) – श्लोक 29

श्लोक २९ में भगवान सबमें समान हैं, पर भक्तों में विशेष रूप से निवास करते हैं। Verse 29: The Lord is impartial, but He dwells in His devotees.

संस्कृत श्लोक

समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः | ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् || २९||

samo 'haṃ sarva-bhūteṣu na me dveṣyo 'sti na priyaḥ | ye bhajanti tu māṃ bhaktyā mayi te teṣu cāpy aham ||29||

पदच्छेद / शब्दार्थ

समः: समान; अहम्: मैं; सर्व-भूतेषु: सम्पूर्ण प्राणियों में; न: नहीं; मे: मुझे; द्वेष्यः: द्वेष करने योग्य; अस्ति: है; न: नहीं; प्रियः: प्रिय; ये: जो; भजन्ति: भजते हैं; तु: तो; माम्: मुझे; भक्त्या: भक्ति से; मयि: मुझमें; ते: वे; तेषु: उनमें; च: और; अपि: भी; अहम्: मैं।

हिंदी अनुवाद

मैं सम्पूर्ण प्राणियों में समान भाव से स्थित हूँ। मुझे न कोई द्वेष्य है और न कोई प्रिय। परन्तु जो मुझे भक्ति से भजते हैं, वे मुझमें हैं और मैं भी उनमें हूँ।

English Translation

I am equally disposed to all beings; there is no one hateful or dear to Me. But those who worship Me with devotion dwell in Me and I in them.

टीका / Commentary

भगवान निष्पक्ष हैं, सबके प्रति समान। लेकिन भक्तों के प्रति उनकी विशेष कृपा होती है, इसलिए वे भक्तों में और भक्त उनमें निवास करते हैं। यह भक्ति का रहस्य है।