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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 9 · श्लोक 29

अध्याय 9 · श्लोक 29

राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः | ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् || २९||

samo 'haṃ sarva-bhūteṣu na me dveṣyo 'sti na priyaḥ | ye bhajanti tu māṃ bhaktyā mayi te teṣu cāpy aham ||29||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

समः: समान; अहम्: मैं; सर्व-भूतेषु: सम्पूर्ण प्राणियों में; न: नहीं; मे: मुझे; द्वेष्यः: द्वेष करने योग्य; अस्ति: है; न: नहीं; प्रियः: प्रिय; ये: जो; भजन्ति: भजते हैं; तु: तो; माम्: मुझे; भक्त्या: भक्ति से; मयि: मुझमें; ते: वे; तेषु: उनमें; च: और; अपि: भी; अहम्: मैं।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

मैं सम्पूर्ण प्राणियों में समान भाव से स्थित हूँ। मुझे न कोई द्वेष्य है और न कोई प्रिय। परन्तु जो मुझे भक्ति से भजते हैं, वे मुझमें हैं और मैं भी उनमें हूँ।

English Translation

I am equally disposed to all beings; there is no one hateful or dear to Me. But those who worship Me with devotion dwell in Me and I in them.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

भगवान निष्पक्ष हैं, सबके प्रति समान। लेकिन भक्तों के प्रति उनकी विशेष कृपा होती है, इसलिए वे भक्तों में और भक्त उनमें निवास करते हैं। यह भक्ति का रहस्य है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।