श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 9 (राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga))

अध्याय 9 · श्लोक 29

राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 34 40 मिनट का पठन 157 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः | ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् || २९||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

20 पद
समः
समान
अहम्
मैं
सर्व-भूतेषु
सम्पूर्ण प्राणियों में
न
नहीं
मे
मुझे
द्वेष्यः
द्वेष करने योग्य
अस्ति
है
न
नहीं
प्रियः
प्रिय
ये
जो
भजन्ति
भजते हैं
तु
तो
माम्
मुझे
भक्त्या
भक्ति से
मयि
मुझमें
ते
वे
तेषु
उनमें
च
और
अपि
भी
अहम्
मैं।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

मैं सम्पूर्ण प्राणियों में समान भाव से स्थित हूँ। मुझे न कोई द्वेष्य है और न कोई प्रिय। परन्तु जो मुझे भक्ति से भजते हैं, वे मुझमें हैं और मैं भी उनमें हूँ।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

सनातन धर्म में इस श्लोक का सार्वभौमिक महत्व और cosmic (ब्रह्मांडीय) दृष्टि

सनातन संस्कृति और वेदान्त दर्शन में श्रीमद्भगवद्गीता को केवल एक ग्रंथ नहीं, अपितु साक्षात भगवान श्रीकृष्णा के मुखकमल से निःसृत वह अमृतधारा माना गया है, जो भवसागर से पार लगाने की सामर्थ्य रखती है। जब हम गीता के नवम अध्याय, जिसे 'राजविद्याराजगुह्ययोग' कहा गया है, के इस महान श्लोक—"समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः | ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् || २९||"—का गहिरा अध्ययन करते हैं, तो हमारे समक्ष परमात्मा के उस परम निर्विकार, निष्पक्ष और करुणा से ओत-प्रोत स्वरूप का उद्घाटन होता है जो सृष्टि के कण-कण में व्याप्त है।

साधारण मनुष्यों के मन में यह प्रश्न अक्सर उत्पन्न होता है कि यदि ईश्वर सर्वव्यापी और दयालु हैं, तो संसार में इतनी विषमता क्यों है? कोई दुखी क्यों है और कोई सुखी क्यों है? क्या ईश्वर किसी से पक्षपात करते हैं? भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक के माध्यम से समस्त संशयों का निवारण करते हुए यह उद्घोषित करते हैं कि परमात्मा की दृष्टि में इस चराचर जगत का प्रत्येक जीव समान है। उनके लिए न तो कोई शत्रु है और न ही कोई मित्र या प्रिय है। वे सूर्य के प्रकाश की भांति हैं, जो झोपड़ी और महल पर समान रूप से अपनी किरणें बिखेरता है। परंतु, जिस प्रकार सूर्य की धूप सबके लिए समान होने पर भी जो व्यक्ति अपने घर के दरवाजे और खिड़कियां बंद कर लेता है, वह उसकी ऊष्मा और प्रकाश से वंचित रह जाता है, ठीक उसी प्रकार जो जीव भक्ति रूपी द्वार खोलकर भगवान का स्मरण करता है, वह उनकी विशेष कृपा का अनुभव करता है।

यह श्लोक अद्वैत और द्वैत के अद्भुत समन्वय को दर्शाता है। एक ओर जहाँ यह भगवान की समता (समानता) का उपदेश देता है, वहीं दूसरी ओर भक्त और भगवान के मधुर, अनन्य एवं अद्वैत संबंध (मयि ते तेषु चाप्यहम्) की पराकाष्ठा को भी सिद्ध करता है। इस लेख में हम इसी गूढ़ दार्शनिक रहस्य, इसके शब्दार्थ, पौराणिक प्रसंग, मानसिक व आध्यात्मिक लाभ और जीवन में इसके अनुप्रयोग का विस्तार से अध्ययन करेंगे।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

पवित्र श्रीमद्भगवद्गीता के इस श्लोक का पाठ पूर्ण विधि-विधान, शुद्ध उच्चारण और एकाग्र चित्त के साथ करना चाहिए। यह श्लोक न केवल कंठस्थ करने योग्य है, बल्कि दैनिक जीवन के संकटों में मानसिक संबल प्रदान करने वाला महामंत्र है।

समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः।
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्॥ २९॥


(संस्कृत पदावली: समः अहम् सर्व-भूतेषु न मे द्वेष्यः अस्ति न प्रियः । ये भजन्ति तु माम् भक्त्या मयि ते तेषु च अपि अहम् ॥)

पाठ करने की सरल एवं प्रामाणिक विधि:

  • 1. समय चयन: ब्रह्ममुहूर्त (प्रातःकाल 4:00 से 6:00 बजे) या संध्यावंदन के समय इस श्लोक का जप अत्यंत फलदायी माना गया है।
  • 2. आसन व मुद्रा: कुशा या ऊनी आसन पर सुखासन या पद्मासन में बैठकर रीढ़ की हड्डी सीधी रखें।
  • 3. मानसिक शुद्धि: पाठ आरंभ करने से पूर्व मन को शांत करें और भगवान श्रीकृष्ण के चतुर्भुज स्वरूप का स्मरण करें।
  • 4. आवृत्ति: इस श्लोक का प्रतिदिन कम से कम 11, 21 या 108 बार (एक माला) मानसिक या उपांसु जप करना चाहिए।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

श्लोक की गहराई तक पहुँचने के लिए उसके प्रत्येक शब्द का व्याकरणिक और दार्शनिक विश्लेषण अति आवश्यक है। नीचे दी गई तालिका में इस श्लोक के प्रत्येक पद को सरल हिंदी और उसके आध्यात्मिक मर्म के साथ स्पष्ट किया गया है:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
समः समान, एक सा, निष्पक्ष भगवान का स्वभाव निर्विकार है; वे सभी जीवों को अपनी ही अभिव्यक्ति मानते हैं और कोई भेदभाव नहीं करते।
अहम् मैं (भगवान श्रीकृष्ण) परमात्मा का वह शुद्ध चैतन्य रूप जो संपूर्ण ब्रह्मांड का आधार और संचालक है।
सर्व-भूतेषु समस्त जीवों में (कीड़े से लेकर ब्रह्मा तक) सृष्टि के कण-कण में, चाहे वह स्थावर हो या जंगम, चेतना का स्रोत एक ही परमात्मा है।
न मे न मेरा परमात्मा राग और द्वेष के बंधनों से पूरी तरह मुक्त हैं; वे कर्मफल के नियमों से परे हैं।
द्वेष्यः अस्ति कोई शत्रु या द्वेष योग्य है भगवान किसी भी जीव से घृणा नहीं करते, चाहे वह कितना भी पापी क्यों न हो, क्योंकि पापी में भी ईश्वर का अंश विद्यमान है।
न प्रियः न ही कोई विशेष प्रिय (रागवश) ईश्वर किसी से पक्षपातपूर्ण प्रेम नहीं करते; उनका प्रेम सबके लिए एक समान सहज और प्राकृतिक है।
ये जो मनुष्य वे जिज्ञासु और भक्त जो अपनी चेतना को भगवन्मुखी बनाते हैं।
भजन्ति तु परंतु भजन करते हैं (प्रेमपूर्वक स्मरण करते हैं) अनन्य भाव से शरणागत होकर ईश्वर का निरंतर स्मरण और उनकी सेवा करना ही सच्चा भजन है।
माम् भक्त्या भक्तिभाव के साथ मुझको अहैतुकी और निष्काम भक्ति, जिसमें किसी प्रकार की कामना या स्वार्थ का लेश मात्र भी न हो।
मयि ते मुझमें वे (निवास करते हैं) भक्त का चित्त पूरी तरह परमात्मा में लीन हो जाता है, उसकी बुद्धि और अहंकार भगवान में समा जाते हैं।
तेषु च अपि अहम् और उनमें भी मैं (निवास करता हूँ) भक्त और भगवान के बीच की दूरी समाप्त हो जाती है; भगवान स्वयं उस भक्त के हृदय में विराजमान हो जाते हैं।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

श्रीमद्भगवद्गीता के इस नवम अध्याय का अवतरण कुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र में हुआ था, जहाँ कौरवों और पांडवों की सेनाएं आमने-सामने खड़ी थीं। अर्जुन घोर मानसिक विषाद, किंकर्तव्यविमूढ़ता और मोह के सागर में डूबे हुए थे। उन्होंने अपने शस्त्र त्याग दिए थे और अपने सारथी बने भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में शरण लेते हुए कहा था—'कार्पण्यदोषहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसंमूढचेताः' (हे प्रभु! मैं कायरता के दोष से ग्रस्त हूँ, आप मुझे बताइए कि मेरे लिए श्रेष्ठ क्या है?)।

इसके उत्तर में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को 'राजविद्याराजगुह्ययोग' का उपदेश दिया। इस अध्याय के प्रारंभ में ही भगवान इसे 'पवित्रतम ज्ञान' (पवित्रमिदमुत्तमम्) कहते हैं। अर्जुन के मन में बार-बार यह विचार आ रहा था कि भगवान किसके प्रति अधिक अनुग्रह रखते हैं? क्या वे पांडवों से अधिक प्रेम करते हैं और कौरवों से द्वेष? इसी शंका का शमन करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने यह महान श्लोक कहा। उन्होंने स्पष्ट किया कि न्याय और प्रेम का उनका पैमाना मानवीय राग-द्वेष से परे है।

पुराणों और महाभारत के अन्य प्रसंगों में भी इस सत्य की पुष्टि अनेक कथाओं द्वारा होती है। उदाहरणार्थ, प्रह्लाद महाराज और हिरण्यकशिपु की कथा को लें। हिरण्यकशिपु भगवान विष्णु का विरोधी था, परंतु फिर भी भगवान ने उसकी उपेक्षा नहीं की, बल्कि नृसिंह अवतार लेकर उसे भी परम गति प्रदान की। वहीं दूसरी ओर, भक्त प्रह्लाद की अनन्य भक्ति के कारण भगवान ने खंभे को चीरकर प्रत्यक्ष दर्शन दिए। इससे यह सिद्ध होता है कि भगवान का किसी से व्यक्तिगत वैर नहीं है; जो जैसा भाव रखता है, भगवान उसके प्रति वैसा ही प्राकट्य अनुभव कराते हैं। रामायण में भी श्रीराम द्वारा शबरी, निषादराज और केवट के प्रति दिखाए गए प्रेम और समता का आधार यही गीतात्मक दर्शन है। महर्षि वेद व्यास ने महाभारत के माध्यम से इसी सनातन सत्य को मानवता के कल्याण हेतु इस श्लोक में पिरोया है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ (Spiritual Benefits)

इस दिव्य श्लोक का नियमित पठन, मनन और स्मरण करने से साधक के जीवन में अभूतपूर्व सकारात्मक परिवर्तन आते हैं। इसके प्रमुख आध्यात्मिक और मानसिक लाभ निम्नलिखित हैं:

1. मानसिक शांति और संताप मुक्ति

इस श्लोक के स्मरण से मन में व्याप्त ईर्ष्या, द्वेष, और हीनभावना का शमन होता है। साधक यह समझ जाता है कि ईश्वर सबके साथ न्याय कर रहे हैं, जिससे उसकी आंतरिक चिंताएं स्वतः समाप्त हो जाती हैं।

2. सकारात्मक ऊर्जा (Positive Aura) का विकास

भगवान की समता और सार्वभौमिक प्रेम के भाव को आत्मसात करने से व्यक्ति के आस-पास एक उच्च कोटि के सात्विक और सकारात्मक ऊर्जा आवरण का निर्माण होता है, जो नकारात्मक प्रभावों से रक्षा करता है।

3. कार्मिक शुद्धि (Karmic Purification)

जब मनुष्य निष्काम भाव से भगवान का भजन करता है और यह जानता है कि सभी जीवों में एक ही ईश्वर है, तो उसके द्वारा किसी भी जीव को कष्ट देने की संभावना समाप्त हो जाती है, जिससे उसके संचित कर्म शुद्ध होने लगते हैं।

4. अहैतुकी ईश्वर कृपा की प्राप्ति

यद्यपि ईश्वर सबके प्रति समान हैं, परंतु जो भक्त प्रेम से उनका स्मरण करता है, भगवान उसके हृदय में निवास करते हैं ("मयि ते तेषु चाप्यहम्")। इससे साधक को पग-पग पर अलौकिक सहायता और सुरक्षा का अनुभव होता है।

5. अहंकार और ममत्व का नाश

"मेरा-तेरा" और "शत्रु-मित्र" का संकुचित दायरा टूट जाता है। साधक सभी जीवों में परमात्मा के दर्शन करने लगता है, जिससे उसके भीतर का अहंता (Ego) गल जाता है और परम विनम्रता आती है.

6. भय, शोक और अवसाद (Depression) से मुक्ति

अनेक मनोवैज्ञानिक समस्याओं और अवसाद से घिरे व्यक्तियों के लिए यह श्लोक अचूक औषधि का कार्य करता है। यह विश्वास दिलाता है कि परमात्मा हमेशा हमारे भीतर और हम परमात्मा में सुरक्षित हैं।

7. निर्णय लेने की क्षमता (Intuition) में वृद्धि

नियमित जप से बुद्धि तीव्र और सात्विक होती है। व्यक्ति पक्षपातपूर्ण या स्वार्थी निर्णयों से दूर रहकर धर्मसंगत और न्यायपूर्ण निर्णय लेने में सक्षम बनता है।

8. मोक्ष और आत्यंतिक शांति का मार्ग

भक्ति के इस गूढ़ रहस्य को समझकर जीवन जीने वाला साधक जीवनकाल में ही जीवनमुक्त हो जाता है और अंततः भगवदधाम को प्राप्त करता है, जहाँ जन्म-मृत्यु का कोई भय नहीं रहता।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

यह आलेख संपादकीय रूप से तैयार सामग्री के अंतर्गत आता है, जिसे वेदों, पुराणों, श्रीमद्भगवद्गीता के विभिन्न टीकाग्रंथों (जैसे आदि शंकराचार्य, स्वामी रामसुखदास और संत ज्ञानेश्वर महाराज के भाष्य) तथा सनातन धर्म के उच्च कोटि के आचार्यों के दृष्टिकोण का गहन अध्ययन करने के पश्चात Bhaktilok.in के वरिष्ठ विद्वानों द्वारा निष्पादित किया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों तक वेदों और शास्त्रों का विशुद्ध, मिलावट-रहित और तार्किक ज्ञान पहुंचाना है, ताकि आधुनिक जीवन की भागदौड़ के बीच लोग अपनी आध्यात्मिक जड़ों से जुड़ सकें। सभी श्लोकों के अर्थ व्याकरण की कसौटी पर खरे और पारंपरिक परंपराओं के अनुकूल सत्यापित किए गए हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs - Schema Ready)

भगवान सूर्य की धूप सभी के लिए एक समान होती है, परंतु जो व्यक्ति खिड़की-दरवाजे खोलता है, वही उसके प्रकाश और ऊष्मा को प्राप्त करता है। इसी प्रकार, भगवान का स्वभाव सबके लिए समान और निर्विकार है, लेकिन भक्त अपनी भक्ति के द्वारा अपने मन के दरवाजे खोल लेते हैं, जिससे भगवान की कृपा स्वाभाविक रूप से उन पर प्रवाहित होने लगती है। इसे पक्षपात नहीं, बल्कि प्रेम का आदान-प्रदान कहा जाता है।

इस पंक्ति का अर्थ है कि "भक्त मुझमें निवास करते हैं और मैं उन भक्तों में निवास करता हूँ।" यह अद्वैत और भक्ति का मिलाजुला रूप है। जब भक्त का चित्त पूरी तरह भगवान के चरणों में समर्पित हो जाता है, तो उसमें और भगवान में कोई भेद नहीं रहता। भगवान स्वयं उस भक्त के हृदय के सिंहासन पर विराजमान हो जाते हैं और उसके योग-क्षेम का भार वहन करते हैं।

हाँ, जब कोई साधक इस श्लोक का नियमित पाठ करता है और इसके मर्म को समझकर सभी जीवों में ईश्वर के दर्शन करता है, तो उसके भीतर दूसरों को कष्ट पहुँचाने की प्रवृत्ति समाप्त हो जाती है। इसके अलावा, भगवान के नाम और उनके गुणों का स्मरण संचित कर्मों और पापों के संस्कारों को भस्म कर देता है, जिससे चित्त शुद्ध हो जाता है।

दैनिक जीवन में इसे उतारने का सबसे सरल मार्ग यह है कि हम किसी भी प्राणी के प्रति ईर्ष्या, द्वेष या घृणा का भाव न रखें। हर मनुष्य, पशु और पक्षी में उसी परमात्मा का अंश देखें। इसके साथ ही, अपने व्यस्त दिनचर्या में से कुछ समय निकालकर भगवान का स्मरण और निष्काम भाव से अपने कर्तव्यों का पालन करें।

यह पावन श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के नवम (9वें) अध्याय जिसका नाम 'राजविद्याराजगुह्ययोग' है, के 29वें श्लोक (9.29) के रूप में संकलित है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने गूढ़तम रहस्यों और भक्ति के सर्वोच्च स्वरूप का सुंदर वर्णन किया है।

© Bhaktilok.in - सर्वाधिकार सुरक्षित। वेदों और शास्त्रों का प्रामाणिक मंच।

"सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः"

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

मैं सम्पूर्ण प्राणियों में समान हूँ; मुझे कोई द्वेष्य या प्रिय नहीं है। परन्तु जो भक्त मुझे भक्ति से भजते हैं, वे मुझमें हैं और मैं उनमें हूँ।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

ईश्वर निष्पक्ष है, पर भक्तों के प्रति उसका विशेष अनुराग है। भक्त और भगवान में प्रेम का अद्वैत सम्बन्ध स्थापित होता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 9: राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 29 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 29/34 85% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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पंचांग
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