राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga) – श्लोक 30

श्लोक ३० में बताया गया कि भक्ति पापी को भी साधु बना देती है। Verse 30: Even a sinful person becomes saintly through exclusive devotion.

संस्कृत श्लोक

अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् | साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः || ३०||

api cet su-durācāro bhajate mām ananya-bhāk | sādhur eva sa mantavyaḥ samyag vyavasito hi saḥ ||30||

पदच्छेद / शब्दार्थ

अपि: यद्यपि; चेत्: यदि; सु-दुराचारः: अत्यन्त दुराचारी; भजते: भजता है; माम्: मुझे; अनन्य-भाक्: अनन्य भाव से; साधु: साधु; एव: ही; स: वह; मन्तव्यः: मानना चाहिए; सम्यक्: सम्यक् (ठीक); व्यवसितः: निश्चय किया; हि: निश्चय ही; सः: वह।

हिंदी अनुवाद

यदि कोई अत्यन्त दुराचारी भी अनन्यभाव से मेरा भजन करता है, तो वह साधु ही समझने योग्य है, क्योंकि उसने सम्यक् निश्चय कर लिया है।

English Translation

Even if the most sinful worships Me with exclusive devotion, he should be regarded as a saint, for he has rightly resolved.

टीका / Commentary

भक्ति की महिमा इतनी प्रबल है कि वह पापी को भी तत्काल पवित्र कर देती है। ऐसा व्यक्ति साधु के समान पूज्य है क्योंकि उसका संकल्प भगवान की ओर है।