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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 9 · श्लोक 30

अध्याय 9 · श्लोक 30

राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् | साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः || ३०||

api cet su-durācāro bhajate mām ananya-bhāk | sādhur eva sa mantavyaḥ samyag vyavasito hi saḥ ||30||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

अपि: यद्यपि; चेत्: यदि; सु-दुराचारः: अत्यन्त दुराचारी; भजते: भजता है; माम्: मुझे; अनन्य-भाक्: अनन्य भाव से; साधु: साधु; एव: ही; स: वह; मन्तव्यः: मानना चाहिए; सम्यक्: सम्यक् (ठीक); व्यवसितः: निश्चय किया; हि: निश्चय ही; सः: वह।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

यदि कोई अत्यन्त दुराचारी भी अनन्यभाव से मेरा भजन करता है, तो वह साधु ही समझने योग्य है, क्योंकि उसने सम्यक् निश्चय कर लिया है।

English Translation

Even if the most sinful worships Me with exclusive devotion, he should be regarded as a saint, for he has rightly resolved.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

भक्ति की महिमा इतनी प्रबल है कि वह पापी को भी तत्काल पवित्र कर देती है। ऐसा व्यक्ति साधु के समान पूज्य है क्योंकि उसका संकल्प भगवान की ओर है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।