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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 9 · श्लोक 31

अध्याय 9 · श्लोक 31

राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति | कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति || ३१||

kṣipraṃ bhavati dharmātmā śaśvac chāntiṃ nigacchati | kaunteya pratijānīhi na me bhaktaḥ praṇaśyati ||31||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

क्षिप्रम्: शीघ्र; भवति: हो जाता है; धर्म-आत्मा: धर्मात्मा; शश्वत्-शान्तिम्: शाश्वत शान्ति; निगच्छति: प्राप्त होता है; कौन्तेय: हे कुन्तीपुत्र; प्रतिजानीहि: निश्चयपूर्वक कहो; न: नहीं; मे: मेरा; भक्तः: भक्त; प्रणश्यति: नष्ट होता (विनाश को प्राप्त नहीं होता)।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

वह शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है और शाश्वत शान्ति को प्राप्त होता है। हे कुन्तीपुत्र! तू निश्चयपूर्वक कह दे कि मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता।

English Translation

He soon becomes virtuous and attains everlasting peace. O son of Kunti, declare it boldly that My devotee never perishes.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

भक्त का पतन नहीं होता। वह शीघ्र ही सद्गुणों से युक्त होकर परम शान्ति पाता है। भगवान स्वयं इसकी प्रतिज्ञा करते हैं।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।