राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga) – श्लोक 31
श्लोक ३१ में भगवान वचन देते हैं कि उनका भक्त कभी नष्ट नहीं होता। Verse 31: The Lord assures that His devotee never perishes.
संस्कृत श्लोक
क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति | कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति || ३१||
kṣipraṃ bhavati dharmātmā śaśvac chāntiṃ nigacchati | kaunteya pratijānīhi na me bhaktaḥ praṇaśyati ||31||
पदच्छेद / शब्दार्थ
क्षिप्रम्: शीघ्र; भवति: हो जाता है; धर्म-आत्मा: धर्मात्मा; शश्वत्-शान्तिम्: शाश्वत शान्ति; निगच्छति: प्राप्त होता है; कौन्तेय: हे कुन्तीपुत्र; प्रतिजानीहि: निश्चयपूर्वक कहो; न: नहीं; मे: मेरा; भक्तः: भक्त; प्रणश्यति: नष्ट होता (विनाश को प्राप्त नहीं होता)।
हिंदी अनुवाद
वह शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है और शाश्वत शान्ति को प्राप्त होता है। हे कुन्तीपुत्र! तू निश्चयपूर्वक कह दे कि मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता।
English Translation
He soon becomes virtuous and attains everlasting peace. O son of Kunti, declare it boldly that My devotee never perishes.
टीका / Commentary
भक्त का पतन नहीं होता। वह शीघ्र ही सद्गुणों से युक्त होकर परम शान्ति पाता है। भगवान स्वयं इसकी प्रतिज्ञा करते हैं।