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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 9 · श्लोक 32

अध्याय 9 · श्लोक 32

राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः | स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम् || ३२||

māṃ hi pārtha vyapāśritya ye 'pi syuḥ pāpa-yonayaḥ | striyo vaiśyās tathā śūdrās te 'pi yānti parāṃ gatim ||32||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

माम्: मेरी; हि: निश्चय ही; पार्थ: हे पार्थ; व्यपाश्रित्य: आश्रय लेकर; ये: जो; अपि: भी; स्युः: हैं; पाप-योनयः: पाप-योनि में उत्पन्न; स्त्रियः: स्त्रियाँ; वैश्याः: वैश्य; तथा: तथा; शूद्राः: शूद्र; ते: वे; अपि: भी; यान्ति: प्राप्त होते हैं; पराम्: परम; गतिम्: गति को।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

हे पार्थ! मेरा आश्रय लेकर जो पापयोनि में उत्पन्न (हुए) हैं – स्त्री, वैश्य और शूद्र – वे भी परम गति को प्राप्त होते हैं।

English Translation

For those who take shelter in Me, O Partha, even if they are of sinful birth—women, vaishyas, and shudras—even they attain the supreme goal.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

यहाँ भगवान भक्ति के सार्वभौमिक स्वरूप को दर्शाते हैं। भक्ति के लिए न जाति, न लिंग, न वर्ण बाधक है। सभी को अधिकार है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।