राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga) – श्लोक 32

श्लोक ३२ में भगवान स्त्री-वैश्य-शूद्र आदि सभी को भक्ति का अधिकारी बताते हैं। Verse 32: All, regardless of birth, can attain the supreme goal through devotion.

संस्कृत श्लोक

मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः | स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम् || ३२||

māṃ hi pārtha vyapāśritya ye 'pi syuḥ pāpa-yonayaḥ | striyo vaiśyās tathā śūdrās te 'pi yānti parāṃ gatim ||32||

पदच्छेद / शब्दार्थ

माम्: मेरी; हि: निश्चय ही; पार्थ: हे पार्थ; व्यपाश्रित्य: आश्रय लेकर; ये: जो; अपि: भी; स्युः: हैं; पाप-योनयः: पाप-योनि में उत्पन्न; स्त्रियः: स्त्रियाँ; वैश्याः: वैश्य; तथा: तथा; शूद्राः: शूद्र; ते: वे; अपि: भी; यान्ति: प्राप्त होते हैं; पराम्: परम; गतिम्: गति को।

हिंदी अनुवाद

हे पार्थ! मेरा आश्रय लेकर जो पापयोनि में उत्पन्न (हुए) हैं – स्त्री, वैश्य और शूद्र – वे भी परम गति को प्राप्त होते हैं।

English Translation

For those who take shelter in Me, O Partha, even if they are of sinful birth—women, vaishyas, and shudras—even they attain the supreme goal.

टीका / Commentary

यहाँ भगवान भक्ति के सार्वभौमिक स्वरूप को दर्शाते हैं। भक्ति के लिए न जाति, न लिंग, न वर्ण बाधक है। सभी को अधिकार है।