राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga) – श्लोक 33
श्लोक ३३ में भगवान अर्जुन को इस दुःखमय संसार में भक्ति करने की प्रेरणा देते हैं। Verse 33: Having obtained this impermanent world, engage in devotion.
संस्कृत श्लोक
किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा | अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम् || ३३||
kiṃ punar brāhmaṇāḥ puṇyā bhaktā rājarṣayas tathā | anityam asukhaṃ lokam imaṃ prāpya bhajasva mām ||33||
पदच्छेद / शब्दार्थ
किम्: क्या; पुनः: फिर; ब्राह्मणाः: ब्राह्मण; पुण्याः: पुण्यात्मा; भक्ताः: भक्त; राजर्षयः: राजर्षि; तथा: तथा; अनित्यम्: अनित्य; असुखम्: दुःखमय; लोकम्: लोक; इमम्: इस; प्राप्य: पाकर; भजस्व: भज; माम्: मुझे।
हिंदी अनुवाद
तो फिर पुण्यात्मा ब्राह्मण और भक्त राजर्षि तो कहना ही क्या? इस अनित्य और दुःखमय संसार को प्राप्त करके तू मेरा भजन कर।
English Translation
Then what to speak of the holy brahmins and devoted royal sages! Having come to this impermanent and joyless world, do you worship Me.
टीका / Commentary
यदि नीच योनि के लोग भी भगवान को प्राप्त हो जाते हैं, तो फिर ब्राह्मण और राजर्षि जैसे उच्च अधिकारियों के लिए तो यह और भी सरल है। अतः अर्जुन को भी भजन करना चाहिए।