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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 9 · श्लोक 33

अध्याय 9 · श्लोक 33

राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा | अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम् || ३३||

kiṃ punar brāhmaṇāḥ puṇyā bhaktā rājarṣayas tathā | anityam asukhaṃ lokam imaṃ prāpya bhajasva mām ||33||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

किम्: क्या; पुनः: फिर; ब्राह्मणाः: ब्राह्मण; पुण्याः: पुण्यात्मा; भक्ताः: भक्त; राजर्षयः: राजर्षि; तथा: तथा; अनित्यम्: अनित्य; असुखम्: दुःखमय; लोकम्: लोक; इमम्: इस; प्राप्य: पाकर; भजस्व: भज; माम्: मुझे।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

तो फिर पुण्यात्मा ब्राह्मण और भक्त राजर्षि तो कहना ही क्या? इस अनित्य और दुःखमय संसार को प्राप्त करके तू मेरा भजन कर।

English Translation

Then what to speak of the holy brahmins and devoted royal sages! Having come to this impermanent and joyless world, do you worship Me.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

यदि नीच योनि के लोग भी भगवान को प्राप्त हो जाते हैं, तो फिर ब्राह्मण और राजर्षि जैसे उच्च अधिकारियों के लिए तो यह और भी सरल है। अतः अर्जुन को भी भजन करना चाहिए।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।