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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 9 · श्लोक 34

अध्याय 9 · श्लोक 34

राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु | मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः || ३४||

man-manā bhava mad-bhakto mad-yājī māṃ namas kuru | mām evaiṣyasi yuktvaivam ātmānaṃ mat-parāyaṇaḥ ||34||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

मत्-मनाः: मुझमें मन लगाने वाला; भव: हो; मत्-भक्तः: मेरा भक्त; मत्-याजी: मेरा पूजन करने वाला; माम्: मुझे; नमः कुरु: नमस्कार कर; माम्: मुझे; एव: ही; एष्यसि: प्राप्त होगा; युक्त्वा: युक्त होकर; एवम्: इस प्रकार; आत्मानम्: अपने आपको; मत्-परायणः: मुझ परायण होकर।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

मुझमें मन लगा, मेरा भक्त बन, मेरा पूजन कर, मुझे नमस्कार कर। इस प्रकार मुझमें ही आत्म-भाव को लगाकर, मुझ परायण होकर तू मुझे ही प्राप्त होगा।

English Translation

Fix your mind on Me, be devoted to Me, worship Me, bow down to Me. Thus uniting yourself with Me, taking Me as the supreme goal, you shall surely come to Me.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

यह श्लोक अध्याय ९ का निगमन है। भगवान अर्जुन को भक्ति के पाँच अंग बताते हैं – मनःसमर्पण, भक्ति, पूजा, नमस्कार, और परायणता। इससे सीधे भगवत्प्राप्ति होती है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।