राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga) – श्लोक 34

श्लोक ३४ में भगवान भक्ति का सार बताते हैं और अर्जुन को उनकी प्राप्ति का मार्ग दिखाते हैं। Verse 34: The essence of devotion – fixing mind on the Lord, worship, surrender, leading to Him.

संस्कृत श्लोक

मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु | मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः || ३४||

man-manā bhava mad-bhakto mad-yājī māṃ namas kuru | mām evaiṣyasi yuktvaivam ātmānaṃ mat-parāyaṇaḥ ||34||

पदच्छेद / शब्दार्थ

मत्-मनाः: मुझमें मन लगाने वाला; भव: हो; मत्-भक्तः: मेरा भक्त; मत्-याजी: मेरा पूजन करने वाला; माम्: मुझे; नमः कुरु: नमस्कार कर; माम्: मुझे; एव: ही; एष्यसि: प्राप्त होगा; युक्त्वा: युक्त होकर; एवम्: इस प्रकार; आत्मानम्: अपने आपको; मत्-परायणः: मुझ परायण होकर।

हिंदी अनुवाद

मुझमें मन लगा, मेरा भक्त बन, मेरा पूजन कर, मुझे नमस्कार कर। इस प्रकार मुझमें ही आत्म-भाव को लगाकर, मुझ परायण होकर तू मुझे ही प्राप्त होगा।

English Translation

Fix your mind on Me, be devoted to Me, worship Me, bow down to Me. Thus uniting yourself with Me, taking Me as the supreme goal, you shall surely come to Me.

टीका / Commentary

यह श्लोक अध्याय ९ का निगमन है। भगवान अर्जुन को भक्ति के पाँच अंग बताते हैं – मनःसमर्पण, भक्ति, पूजा, नमस्कार, और परायणता। इससे सीधे भगवत्प्राप्ति होती है।