सभी अध्याय अध्याय 9 | 34 श्लोक

राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga)

नौवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण सबसे गोपनीय और श्रेष्ठ ज्ञान (राजविद्या) का उपदेश देते हैं। वह बताते हैं कि कैसे वह सब व्याप्त हैं, फिर भी उनमें आसक्ति नहीं है, और कैसे साधारण भक्ति भी उन्हें प्राप्त करा सकती है।

परिचय / Introduction

कृष्ण ने पिछले अध्याय में मृत्यु के समय स्मरण का महत्व बताया। अब अध्याय ९ में वह उस ज्ञान को "राजविद्या" (सबसे श्रेष्ठ विद्या) और "राजगुह्य" (सबसे गोपनीय रहस्य) कहते हैं। यह अध्याय भक्ति के सरलतम रूप को सबसे ऊँचा स्थान देता है।

मुख्य विषय / Key Themes

  • ईश्वर की सर्वव्यापकता और अलिप्तता (God's Omnipresence and Detachment): कृष्ण कहते हैं कि सब कुछ उनमें स्थित है, फिर भी वे किसी में स्थित नहीं हैं। वायु की तरह सर्वत्र व्याप्त होकर भी वे असंग हैं।
  • सृष्टि का चक्र (The Cycle of Creation): अपनी प्रकृति के द्वारा वे बार-बार सृष्टि रचते हैं और प्रलय में सब कुछ उनमें लीन हो जाता है। लेकिन यह कर्म उन्हें बाँधता नहीं।
  • भक्ति का सीधा मार्ग (The Direct Path of Devotion): कोई भी व्यक्ति, चाहे वह कितना भी पापी क्यों न हो, यदि एकाग्रचित्त होकर कृष्ण की भक्ति करता है, तो वह शीघ्र ही धर्मात्मा बन जाता है।
  • सब कुछ अर्पण करने की शिक्षा (Teachings on Offering Everything): पत्र, पुष्प, फल, जल – जो भी प्रेम से भक्त अर्पित करता है, कृष्ण उसे प्रेमपूर्वक ग्रहण करते हैं।
  • सबकी समान दृष्टि (Equal Vision for All): भक्तों के प्रति कृष्ण की विशेष कृपा होती है, लेकिन वे सबमें समान रूप से स्थित हैं। सभी प्राणी उनके स्वरूप हैं।

यह अध्याय भक्ति का सबसे सरल और सुंदर रूप प्रस्तुत करता है। यह आश्वासन देता है कि भगवान तक पहुँचने के लिए न तो किसी बड़ी योग्यता की आवश्यकता है, न ही कठोर साधनाओं की। बस एक पवित्र हृदय और प्रेमपूर्ण भाव ही पर्याप्त है। This chapter reveals that the Supreme Lord is accessible to everyone through simple devotion, and that He is the ultimate refuge for all beings.

अध्याय के सभी श्लोक

श्रीभगवानुवाच | इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे | ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् || १||

“श्री भगवान् बोले: तू निंदारहित है, इसलिये तुझको मैं विज्ञान सहित इस ज्ञान को जो कि सबसे अधिक गोपनीय है, अब कहूँगा, जिसको जानकर तू अशुभ से मुक्त हो जायेगा।”

English: The Blessed Lord said: I shall now declare to you, who does not cavil, the most profound knowledge combined with realization, having known which you will be freed from evil.

राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम् | प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम् || २||

“यह (ज्ञान) राजविद्या (विद्याओं का राजा) है, राजगुह्य (रहस्यों का राजा) है, अत्यन्त पवित्र करने वाला है, उत्तम है, प्रत्यक्ष अनुभव में आने वाला है, धर्मयुक्त है, साधन में अत्यन्त सुखद है और अविनाशी है।”

English: This is the king of knowledge, the king of secrets, the supreme purifier, directly realizable, righteous, very easy to practice, and imperishable.

अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप | अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि || ३||

“हे परंतप (अर्जुन)! इस धर्म (भक्तियोग) में श्रद्धा न रखने वाले पुरुष मुझे प्राप्त न होकर मृत्यु रूप संसार-मार्ग में ही आते-जाते रहते हैं।”

English: Those who have no faith in this dharma (spiritual path), O scorcher of foes, fail to attain Me and return to the path of death and rebirth.

मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना | मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः || ४||

“यह सम्पूर्ण जगत् मेरे अव्यक्त रूप से व्याप्त है। सम्पूर्ण प्राणी मुझमें स्थित हैं, परन्तु मैं उनमें स्थित नहीं हूँ।”

English: This entire universe is pervaded by Me in My unmanifest form. All beings exist in Me, but I am not contained in them.

न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम् | भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः || ५||

“और न ही सब प्राणी मुझमें स्थित हैं (इस प्रकार समझो) – मेरे इस ऐश्वर्ययुक्त योग को देखो। मैं सब प्राणियों का धारण-पोषण करने वाला हूँ, फिर भी उनमें स्थित नहीं हूँ। मेरा आत्मा ही सब प्राणियों का उत्पादक है।”

English: Yet beings do not dwell in Me—behold My divine Yoga! I sustain all beings, yet I am not contained in them; My Self is the very source of all beings.

यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान् | तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय || ६||

“जैसे सर्वत्र गमन करने वाली महान् वायु सदा आकाश में स्थित रहती है, वैसे ही सम्पूर्ण प्राणी मुझमें स्थित हैं – ऐसा तुम समझो।”

English: As the mighty wind, moving everywhere, rests always in the sky, so do all beings rest in Me—know this.

सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् | कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम् || ७||

“हे कौन्तेय! कल्प के अन्त में सब प्राणी मेरी प्रकृति में लीन हो जाते हैं और कल्प के आरम्भ में मैं उन्हें फिर से उत्पन्न करता हूँ।”

English: At the end of a kalpa, all beings merge into My Prakriti (nature); at the beginning of the next kalpa, O son of Kunti, I send them forth again.

प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः | भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात् || ८||

“अपनी प्रकृति को अधीन करके मैं इस समस्त प्राणी-समूह को बार-बार उत्पन्न करता हूँ, जो प्रकृति के वश में होने से विवश होता है।”

English: Keeping My Prakriti under control, I send forth again and again this entire multitude of beings, helpless under the sway of Prakriti.

न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय | उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु || ९||

“हे धनञ्जय! वे कर्म मुझे नहीं बाँधते, क्योंकि मैं उन कर्मों में आसक्ति रहित, उदासीन के समान स्थित हूँ।”

English: O Dhananjaya, these actions do not bind Me, for I remain like one indifferent, unattached to those actions.

श्लोक 10

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मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् | हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते || १०||

“हे कौन्तेय! मेरे अध्यक्ष रहने से प्रकृति चराचर सहित सम्पूर्ण जगत् को उत्पन्न करती है, और इसी कारण यह जगत् बार-बार परिवर्तित होता रहता है।”

English: Under My supervision, O son of Kunti, Prakriti gives birth to all moving and non-moving beings; and by this reason, the world goes through its cycles.

श्लोक 11

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अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् | परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् || ११||

“मूढ़ लोग मुझे मनुष्य रूप में धारण किये हुए (देखकर) तिरस्कार करते हैं। वे सम्पूर्ण भूतों के महेश्वर मेरे परम भाव को नहीं जानते।”

English: Fools disregard Me, thinking that I have assumed this human form, not knowing My supreme nature as the great Lord of all beings.

श्लोक 12

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मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः | राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः || १२||

“वे व्यर्थ आशा, व्यर्थ कर्म, व्यर्थ ज्ञान वाले और विवेकहीन होते हैं, तथा राक्षसी और आसुरी मोहिनी प्रकृति को ही आश्रय किए रहते हैं।”

English: Those of vain hopes, vain actions, vain knowledge, and devoid of discrimination, are verily possessed of the delusive nature of demons and atheists.

श्लोक 13

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महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः | भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम् || १३||

“हे पार्थ! परन्तु महात्मा लोग दैवी प्रकृति के आश्रित होकर, मुझे सम्पूर्ण प्राणियों का आदि-कारण और अविनाशी जानकर, अनन्य मन से मेरा भजन करते हैं।”

English: But the great souls, O Partha, who are possessed of divine nature, worship Me with a single mind, knowing Me as the imperishable source of all beings.

श्लोक 14

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सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः | नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते || १४||

“निरन्तर मेरा कीर्तन करते हुए, दृढ़ व्रत वाले और यत्नशील होकर, तथा भक्तिपूर्वक मुझे नमस्कार करते हुए, वे नित्ययुक्त होकर मेरी उपासना करते हैं।”

English: Always chanting My glories, striving with firm resolve, and bowing down to Me with devotion, they are ever-engaged in My worship.

श्लोक 15

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ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते | एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम् || १५||

“और अन्य लोग ज्ञान-यज्ञ द्वारा मेरी उपासना करते हैं – वे मुझे एकरूप, अनेकरूप तथा विश्वमुख (सर्वत्र व्याप्त) रूप में पूजते हैं।”

English: Others, offering the sacrifice of knowledge, worship Me as the one, as the distinct, and as the manifold, facing all directions.

श्लोक 16

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अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम् | मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम् || १६||

“मैं क्रतु हूँ, मैं यज्ञ हूँ, मैं स्वधा (पितरों को दी जाने वाली वस्तु) हूँ, मैं औषधि हूँ, मैं मन्त्र हूँ, मैं आज्य (घी) हूँ, मैं अग्नि हूँ और मैं हवन हूँ।”

English: I am the ritual, I am the sacrifice, I am the offering to the ancestors, I am the herb, I am the mantra, I am the clarified butter, I am the fire, I am the oblation.

श्लोक 17

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पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः | वेद्यं पवित्रमोंकार ऋक्साम यजुरेव च || १७||

“मैं इस जगत् का पिता, माता, धाता (पालनकर्ता) और पितामह हूँ; मैं जानने योग्य हूँ, पवित्रकर्ता हूँ, ओंकार हूँ तथा ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद भी हूँ।”

English: I am the father, mother, supporter and grandfather of this universe; I am the object of knowledge, the purifier, the syllable OM, and also the Rik, Sama, and Yajur Vedas.

श्लोक 18

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गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत् | प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम् || १८||

“मैं गति (परम लक्ष्य) हूँ, भर्ता (धारण करने वाला) हूँ, प्रभु हूँ, साक्षी हूँ, निवास हूँ, शरण हूँ, सुहृत् (हितैषी) हूँ, उत्पत्ति हूँ, प्रलय हूँ, स्थान हूँ, निधान (आश्रय) हूँ और अविनाशी बीज हूँ।”

English: I am the goal, the sustainer, the Lord, the witness, the abode, the refuge, the friend, the origin, the dissolution, the foundation, the treasure, and the imperishable seed.

श्लोक 19

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तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च | अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन || १९||

“मैं सूर्य रूप में तपता हूँ, मैं वर्षा को रोकता और बरसाता हूँ। हे अर्जुन! मैं अमृत और मृत्यु हूँ, तथा सत् और असत् भी मैं ही हूँ।”

English: I give heat; I withhold and send forth rain; I am immortality and also death; I am both being and non-being, O Arjuna.

श्लोक 20

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त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते | ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोकमश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान् || २०||

“तीनों वेदों को जानने वाले, सोमपान करने वाले, पापों से मुक्त हुए (कर्मकाण्डी) लोग यज्ञों द्वारा मेरी पूजा करके स्वर्ग की प्राप्ति की कामना करते हैं। वे पुण्य का फल पाकर इन्द्रलोक में प्रवेश कर वहाँ दिव्य देवताओं के भोगों को भोगते हैं।”

English: Those who study the three Vedas and drink the soma, being purified of sins, worship Me through sacrifices and pray for the heavenly goal. They reach the world of Indra and enjoy divine celestial pleasures.