दसवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अपनी दिव्य विभूतियों (ऐश्वर्य) का वर्णन करते हैं। अर्जुन के अनुरोध पर वह संसार की प्रमुख वस्तुओं में अपने विशेष स्वरूप को बताते हैं, जिससे भक्त उनका स्मरण कर सकें।
परिचय / Introduction
पिछले अध्याय में कृष्ण ने भक्ति का सरल मार्ग बताया। अब अर्जुन उनसे यह जानना चाहते हैं कि कैसे साधारण मनुष्य उनका ध्यान करे? कृष्ण अध्याय १० में अपनी विभूतियों का वर्णन करके ध्यान का एक सुगम मार्ग प्रदान करते हैं – सृष्टि की उत्कृष्ट वस्तुओं में उनका दर्शन।
मुख्य विषय / Key Themes
विभूति योग का महत्व (The Importance of Vibhuti Yoga): कृष्ण की विभूतियों को जानने से श्रद्धा और भक्ति दृढ़ होती है। यह ज्ञान भक्ति में रुचि बढ़ाने वाला है।
अर्जुन की स्तुति (Arjuna's Praise): अर्जुन कृष्ण को परब्रह्म, परम धाम, पवित्रतम, अजन्मा, सर्वव्यापी आदि कहकर स्तुति करते हैं और उनकी महिमा स्वीकार करते हैं।
प्रमुख विभूतियाँ (Key Glories): कृष्ण अपने को आदित्यों में विष्णु, प्रकाश में सूर्य, वेदों में सामवेद, देवताओं में इंद्र, इंद्रियों में मन, रुद्रों में शिव, यक्षों में कुबेर, पर्वतों में मेरु, नदियों में गंगा, अक्षरों में अ, मासों में मार्गशीर्ष, ऋतुओं में वसंत, खिलाड़ियों में कृष्ण स्वयं, आदि बताते हैं।
अनंत विभूतियाँ (Infinite Glories): कृष्ण कहते हैं कि उनकी विभूतियाँ अनंत हैं; उन्होंने केवल कुछ उदाहरण दिए हैं। समस्त चराचर जगत उन्हीं से व्याप्त है।
एक अंश से सबको धारण करना (Supporting the Entire Universe by a Fragment): वे अपने एक अंश मात्र से सम्पूर्ण ब्रह्मांड को धारण करते हैं और सबमें व्याप्त हैं।
यह अध्याय हमें सिखाता है कि हम संसार की हर सुंदर, शक्तिशाली और उत्कृष्ट वस्तु में भगवान की झलक देख सकते हैं। यह दृष्टि हमारी श्रद्धा को जगाती है और हमें हर क्षण ईश्वर से जोड़ती है। This chapter helps devotees meditate on the Lord by pointing to His magnificent manifestations in the world, turning ordinary perception into divine contemplation.
“श्रीभगवान् बोले: हे महाबाहो! तुम मेरे परम प्रिय हो, इसलिये तुम्हारे हित की इच्छा से मैं फिर से कहता हूँ, मेरे इन परम रहस्यमय वचनों को सुनो।”
English: The Supreme Lord said: O mighty-armed Arjuna, listen further to My supreme words, which I shall impart to you, who are dear to Me, out of a desire for your welfare.
यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम् | असम्मूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते || ३||
“जो मनुष्य मुझे अजन्मा, अनादि और समस्त लोकों का महेश्वर जानता है, वह मनुष्यों में असम्मूढ़ (मोहरहित) है और सब पापों से मुक्त हो जाता है।”
English: He who knows Me as unborn, without beginning, and the great Lord of the worlds, he, among mortals, is undeluded and is liberated from all sins.
महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा | मद्भावा मानसा जाता येषां लोक इमाः प्रजाः || ६||
“सात महर्षि, उनसे भी पूर्व के चार सनकादि ऋषि तथा चौदह मनु — ये सब मेरे भाव से युक्त मेरे मन से उत्पन्न हुए हैं, जिनसे संसार में यह सम्पूर्ण प्रजा उत्पन्न हुई है।”
English: The seven great sages, the four ancient sages before them, and the Manus also, possessed of powers like Mine, were born from My mind; from them have come these creatures in this world.
एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः | सोऽविकल्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः || ७||
“जो पुरुष मेरी इस विभूति और योगशक्ति को तत्व से जान लेता है, वह निश्चल योग से युक्त हो जाता है; इसमें कोई संशय नहीं है।”
English: He who in truth knows these manifold manifestations of My being and this Yoga power of Mine becomes established in unshakable Yoga; there is no doubt about it.
मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम् | कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च || ९||
“मेरे भक्तजन मुझमें चित्त लगाकर और मुझमें प्राणों को अर्पण करके, परस्पर मुझे समझाते और निरन्तर मेरा कथन करते हुए संतुष्ट होते हैं और मुझमें ही रमण करते हैं।”
English: With their minds and lives entirely absorbed in Me, enlightening each other and always speaking of Me, they remain satisfied and delighted.
“अर्जुन बोले: आप परम ब्रह्म हैं, परम धाम हैं, परम पवित्र हैं, शाश्वत दिव्य पुरुष हैं, आदिदेव हैं, अजन्मा हैं और सर्वव्यापी हैं।”
English: Arjuna said: You are the Supreme Brahman, the supreme abode, the supreme purifier, eternal, divine Person, the primeval God, unborn, and omnipresent.
श्रीभगवानुवाच | हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः | प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे || १९||
“श्रीभगवान् बोले: हे कुरुश्रेष्ठ! अच्छा, अब मैं तुमसे अपनी प्रधान दिव्य विभूतियाँ कहूँगा, क्योंकि मेरे विभूतियों के विस्तार का अन्त नहीं है।”
English: The Blessed Lord said: Very well! Now I will declare to you My divine glories in their prominence, O Arjuna; there is no end to their detailed description.