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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 10 · 42 श्लोक

विभूति योग (Vibhuti Yoga)

दसवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अपनी दिव्य विभूतियों (ऐश्वर्य) का वर्णन करते हैं। अर्जुन के अनुरोध पर वह संसार की प्रमुख वस्तुओं में अपने विशेष स्वरूप को बताते हैं, जिससे भक्त उनका स्मरण कर सकें।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. अध्याय संक्षिप्त परिचय (Introduction)

श्रीमद्भगवद्गीता के इस पावन अध्याय का शीर्षक "विभूति योग (Vibhuti Yoga)" है। यह अध्याय कर्म, भक्ति और ज्ञान के मूलभूत सिद्धांतों का एक उत्कृष्ट समन्वय है।

अध्याय संदेश

दसवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अपनी दिव्य विभूतियों (ऐश्वर्य) का वर्णन करते हैं। अर्जुन के अनुरोध पर वह संसार की प्रमुख वस्तुओं में अपने विशेष स्वरूप को बताते हैं, जिससे भक्त उनका स्मरण कर सकें।

२. अध्याय के पावन श्लोक (Gita Shlokas)

प्रत्येक श्लोक को उसके मूल देवनागरी पाठ और हिंदी-अंग्रेजी अनुवाद के साथ नीचे सूचीबद्ध किया गया है।

यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा | तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम् || ४१||


हिंदी अनुवाद: “जो-जो भी विभूतियुक्त, ऐश्वर्ययुक्त अथवा तेजयुक्त पदार्थ है, उस-उसको तुम मेरे तेज के अंश से उत्पन्न जानो।”

English Translation: Whatever being there is glorious, prosperous, or powerful, know that to be a manifestation of a part of My splendor.

अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन | विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् || ४२||


हिंदी अनुवाद: “हे अर्जुन! अथवा इस बहुत जानने से क्या लाभ है? मैं इस सम्पूर्ण जगत् को अपने एक अंश से धारण करके स्थित हूँ।”

English Translation: But of what avail is the knowledge of all these details to you, O Arjuna? I exist, supporting this whole world with one fragment of Myself.

श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।