सभी अध्याय अध्याय 10 | 42 श्लोक

विभूति योग (Vibhuti Yoga)

दसवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अपनी दिव्य विभूतियों (ऐश्वर्य) का वर्णन करते हैं। अर्जुन के अनुरोध पर वह संसार की प्रमुख वस्तुओं में अपने विशेष स्वरूप को बताते हैं, जिससे भक्त उनका स्मरण कर सकें।

परिचय / Introduction

पिछले अध्याय में कृष्ण ने भक्ति का सरल मार्ग बताया। अब अर्जुन उनसे यह जानना चाहते हैं कि कैसे साधारण मनुष्य उनका ध्यान करे? कृष्ण अध्याय १० में अपनी विभूतियों का वर्णन करके ध्यान का एक सुगम मार्ग प्रदान करते हैं – सृष्टि की उत्कृष्ट वस्तुओं में उनका दर्शन।

मुख्य विषय / Key Themes

  • विभूति योग का महत्व (The Importance of Vibhuti Yoga): कृष्ण की विभूतियों को जानने से श्रद्धा और भक्ति दृढ़ होती है। यह ज्ञान भक्ति में रुचि बढ़ाने वाला है।
  • अर्जुन की स्तुति (Arjuna's Praise): अर्जुन कृष्ण को परब्रह्म, परम धाम, पवित्रतम, अजन्मा, सर्वव्यापी आदि कहकर स्तुति करते हैं और उनकी महिमा स्वीकार करते हैं।
  • प्रमुख विभूतियाँ (Key Glories): कृष्ण अपने को आदित्यों में विष्णु, प्रकाश में सूर्य, वेदों में सामवेद, देवताओं में इंद्र, इंद्रियों में मन, रुद्रों में शिव, यक्षों में कुबेर, पर्वतों में मेरु, नदियों में गंगा, अक्षरों में अ, मासों में मार्गशीर्ष, ऋतुओं में वसंत, खिलाड़ियों में कृष्ण स्वयं, आदि बताते हैं।
  • अनंत विभूतियाँ (Infinite Glories): कृष्ण कहते हैं कि उनकी विभूतियाँ अनंत हैं; उन्होंने केवल कुछ उदाहरण दिए हैं। समस्त चराचर जगत उन्हीं से व्याप्त है।
  • एक अंश से सबको धारण करना (Supporting the Entire Universe by a Fragment): वे अपने एक अंश मात्र से सम्पूर्ण ब्रह्मांड को धारण करते हैं और सबमें व्याप्त हैं।

यह अध्याय हमें सिखाता है कि हम संसार की हर सुंदर, शक्तिशाली और उत्कृष्ट वस्तु में भगवान की झलक देख सकते हैं। यह दृष्टि हमारी श्रद्धा को जगाती है और हमें हर क्षण ईश्वर से जोड़ती है। This chapter helps devotees meditate on the Lord by pointing to His magnificent manifestations in the world, turning ordinary perception into divine contemplation.

अध्याय के सभी श्लोक

श्लोक 41

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यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा | तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम् || ४१||

“जो-जो भी विभूतियुक्त, ऐश्वर्ययुक्त अथवा तेजयुक्त पदार्थ है, उस-उसको तुम मेरे तेज के अंश से उत्पन्न जानो।”

English: Whatever being there is glorious, prosperous, or powerful, know that to be a manifestation of a part of My splendor.

श्लोक 42

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अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन | विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् || ४२||

“हे अर्जुन! अथवा इस बहुत जानने से क्या लाभ है? मैं इस सम्पूर्ण जगत् को अपने एक अंश से धारण करके स्थित हूँ।”

English: But of what avail is the knowledge of all these details to you, O Arjuna? I exist, supporting this whole world with one fragment of Myself.