सभी अध्याय अध्याय 1 | 47 श्लोक

अर्जुन विषाद योग (Arjuna Vishada Yoga)

प्रथम अध्याय में कुरुक्षेत्र के युद्धभूमि का वर्णन है और अर्जुन के गहरे विषाद का चित्रण है, जो आगे के उपदेशों की भूमिका तैयार करता है।

परिचय / Introduction

भगवद्गीता का आरंभ कुरुक्षेत्र के पवित्र युद्धभूमि से होता है, जहाँ दो विशाल सेनाएँ युद्ध के लिए खड़ी हैं। The blind king Dhritarashtra, from his palace in Hastinapura, asks his minister Sanjaya, who has been granted divine vision, to narrate the events.

युद्धभूमि का दृश्य / The Battlefield Scene

कुरुक्षेत्र को धर्मक्षेत्र कहा गया है - यह केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं है, बल्कि एक पवित्र क्षेत्र है जहाँ धर्म और अधर्म का युद्ध होने वाला है। Dhritarashtra’s first question – "What did my sons and the sons of Pandu do?" – reveals his anxiety and attachment.

मुख्य विषय / Key Themes

  • विषाद (Despondency): अर्जुन का शोक और मोह इस अध्याय का केंद्रीय विषय है। He sees revered elders, teachers, and relatives on both sides and is unable to reconcile his duty as a warrior with his love for his family.
  • संजय की भूमिका (Role of Sanjaya): संजय एक निष्पक्ष वर्णनकर्ता हैं, जो अंतरात्मा की आवाज का प्रतीक हैं।
  • उपदेश की तैयारी (Preparation for Teaching): अर्जुन का विषाद आगे के ज्ञान के लिए उपयुक्त परिस्थिति बनाता है।

यह अध्याय हमें याद दिलाता है कि आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने से पहले, व्यक्ति को अपने संदेहों, कमजोरियों और आसक्तियों का सामना करना होगा। This chapter reminds us that before one can receive spiritual knowledge, one must first confront one's own doubts and attachments.

अध्याय के सभी श्लोक

श्लोक 21

पूरा पढ़ें

हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते | सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत ||२१||

“तब अर्जुन ने हृषीकेश (श्रीकृष्ण) से यह वचन कहा: हे अच्युत! मेरे रथ को दोनों सेनाओं के बीच में खड़ा कर दीजिए।”

English: Arjuna said: O Achyuta (Krishna), place my chariot between the two armies, O lord of the earth (Dhritarashtra is being addressed by Sanjaya).

श्लोक 22

पूरा पढ़ें

यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान् | कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन्रणसमुद्यमे ||२२||

“मैं उन योद्धाओं को देखना चाहता हूँ जो युद्ध की इच्छा से यहाँ खड़े हैं और जिनके साथ मुझे इस युद्ध में लड़ना है।”

English: Let me see those who have come here to fight, wishing to please the evil-minded Duryodhana by fighting this battle.

श्लोक 23

पूरा पढ़ें

योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः | धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः ||२३||

“मैं उन योद्धाओं को देखना चाहता हूँ जो दुष्टबुद्धि दुर्योधन का पक्ष लेकर युद्ध में उसे प्रसन्न करने के लिए यहाँ एकत्र हुए हैं।”

English: I desire to see those who have assembled here to fight, wishing to please the evil-minded son of Dhritarashtra (Duryodhana).

श्लोक 24

पूरा पढ़ें

एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत | सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम् ||२४||

“हे भारत (धृतराष्ट्र)! गुडाकेश (अर्जुन) द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर हृषीकेश (श्रीकृष्ण) ने उत्तम रथ को दोनों सेनाओं के बीच में खड़ा कर दिया।”

English: O descendant of Bharata (Dhritarashtra), being thus addressed by Gudakesha (Arjuna), Hrishikesha (Krishna) placed that excellent chariot between the two armies.

श्लोक 25

पूरा पढ़ें

भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम् | उवाच पार्थ पश्यैतान्समवेतान्कुरूनिति ||२५||

“भीष्म, द्रोण और सभी राजाओं के सामने कृष्ण ने कहा: हे पार्थ! इन एकत्रित कुरुवंशियों को देखो।”

English: In the presence of Bhishma, Drona, and all the other kings, Krishna said: O Partha (Arjuna), behold all the Kurus gathered here!

श्लोक 26

पूरा पढ़ें

तत्रापश्यत्स्थितान्पार्थः पितॄनथ पितामहान् | आचार्यान्मातुलान्भ्रातॄन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा ||२६||

“वहाँ अर्जुन ने देखा कि दोनों सेनाओं में उनके पिता, पितामह, आचार्य, मामा, भाई, पुत्र, पौत्र, मित्र आदि सभी खड़े थे।”

English: There Arjuna saw standing on both sides his fathers, grandfathers, teachers, maternal uncles, brothers, sons, grandsons, and friends.

श्लोक 27

पूरा पढ़ें

श्वशुरान्सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि | तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्बन्धूनवस्थितान् ||२७||

“दोनों सेनाओं में ससुर और हितैषी भी थे। उन सब बांधवों को वहाँ खड़ा देखकर अर्जुन के हृदय में करुणा उत्पन्न हुई।”

English: He also saw fathers-in-law and well-wishers in both armies. Seeing all these kinsmen standing there, Arjuna was overcome with pity.

श्लोक 28

पूरा पढ़ें

कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत् | दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम् ||२८||

“अत्यधिक करुणा से आविष्ट और विषाद करते हुए अर्जुन ने यह कहा: हे कृष्ण! युद्ध की इच्छा से उपस्थित अपने इन स्वजनों को देखकर ...”

English: Overwhelmed with compassion, Arjuna, in great sorrow, spoke thus: O Krishna, seeing my own kinsmen standing here eager for battle, ...

श्लोक 29

पूरा पढ़ें

सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति | वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते ||२९||

“मेरे अंग शिथिल हो रहे हैं, मुख सूख रहा है, शरीर में कम्पन हो रहा है और रोमांच खड़ा हो रहा है।”

English: My limbs are giving way, my mouth is drying up, my body trembles, and my hair is standing on end.

श्लोक 30

पूरा पढ़ें

गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते | न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः ||३०||

“मेरे हाथ से गांडीव धनुष गिर रहा है, त्वचा जल रही है, मैं स्थिर खड़ा नहीं रह सकता और मेरा मन घूम रहा है (भ्रमित हो रहा है)।”

English: The bow Gandiva is slipping from my hand, my skin is burning all over, I am unable to stand steady, and my mind is reeling.

श्लोक 31

पूरा पढ़ें

निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव | न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे ||३१||

“हे केशव! मैं विपरीत (अशुभ) लक्षण देख रहा हूँ और युद्ध में अपने स्वजनों को मारकर मुझे कल्याण नहीं दिखता।”

English: I see inauspicious omens, O Keshava. I do not foresee any good in killing my own kinsmen in this battle.

श्लोक 32

पूरा पढ़ें

न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च | किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा ||३२||

“हे कृष्ण! मैं विजय नहीं चाहता, न राज्य और न सुख। हे गोविन्द! हमें राज्य से क्या प्रयोजन? भोगों से या जीवन से भी क्या?”

English: I do not desire victory, O Krishna, nor kingdom nor pleasures. What use is kingdom to us, O Govinda? What use are enjoyments or even life itself?

श्लोक 33

पूरा पढ़ें

येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च | त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च ||३३||

“जिनके लिए हम राज्य, भोग और सुख चाहते थे, वे ही लोग यहाँ प्राण और धन त्यागकर युद्ध में खड़े हैं।”

English: Those for whose sake we desire kingdom, enjoyments, and pleasures are now standing here ready to fight, having given up their lives and wealth.

श्लोक 34

पूरा पढ़ें

आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः | मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः सम्बन्धिनस्तथा ||३४||

“आचार्य, पिता, पुत्र, पितामह, मामा, ससुर, पौत्र, साले तथा अन्य संबंधी – ये सभी यहाँ हैं।”

English: Teachers, fathers, sons, grandfathers, maternal uncles, fathers-in-law, grandsons, brothers-in-law, and other relatives – all are here.

श्लोक 35

पूरा पढ़ें

एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन | अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते ||३५||

“हे मधुसूदन! मैं इन्हें मारना नहीं चाहता, चाहे ये मुझे ही क्यों न मारें, तीनों लोकों के राज्य के लिए भी नहीं, तो फिर पृथ्वी के लिए तो क्या कहना?”

English: O Madhusudana, I do not wish to kill them, even if they kill me, even for the sake of the kingdom of the three worlds, let alone for this earth.

श्लोक 36

पूरा पढ़ें

निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन | पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिनः ||३६||

“हे जनार्दन! धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारकर हमें क्या प्रसन्नता होगी? इन आततायियों को मारने पर भी हमें पाप ही लगेगा।”

English: O Janardana, what pleasure will we derive from killing the sons of Dhritarashtra? Sin will only overtake us if we slay these aggressors.

श्लोक 37

पूरा पढ़ें

तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान् | स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव ||३७||

“अतएव हे माधव! हम अपने बांधव धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारने के योग्य नहीं हैं। अपने स्वजनों को मारकर हम सुखी कैसे हो सकते हैं?”

English: Therefore, O Madhava, we have no right to kill the sons of Dhritarashtra, our own relatives. How can we be happy after killing our own kinsmen?

श्लोक 38

पूरा पढ़ें

यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः | कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम् ||३८||

“यद्यपि लोभ से ग्रस्त चित्त वाले ये (धृतराष्ट्र के पुत्र) कुल के विनाश से होने वाले दोष को और मित्रों से द्रोह रूपी पातक को नहीं देखते, ...”

English: Although they, whose minds are overpowered by greed, see no evil in destroying the family or in hostility toward friends, ...

श्लोक 39

पूरा पढ़ें

कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम् | कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन ||३९||

“हे जनार्दन! जो लोग कुलक्षय से उत्पन्न दोष को देख रहे हैं, उन्हें इस पाप से हटने के लिए क्यों नहीं जानना चाहिए?”

English: O Janardana, why should we not learn to turn away from this sin, we who can clearly see the evil of destroying the family?

श्लोक 40

पूरा पढ़ें

कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः | धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत ||४०||

“कुल के नाश होने पर सनातन कुलधर्म नष्ट हो जाते हैं। धर्म के नष्ट होने पर सम्पूर्ण कुल में अधर्म प्रबल हो जाता है।”

English: When the family is destroyed, the eternal family traditions are lost. With the destruction of dharma, adharma overtakes the entire family.