अर्जुन विषाद योग (Arjuna Vishada Yoga) – श्लोक 30

श्लोक ३० में अर्जुन और अधिक अस्थिर हो जाते हैं। Verse 30: Arjuna becomes even more unstable.

संस्कृत श्लोक

गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते | न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः ||३०||

gāṇḍīvaṃ sraṃsate hastāttvakcaiva paridahyate | na ca śaknomyavasthātuṃ bhramatīva ca me manaḥ ||30||

पदच्छेद / शब्दार्थ

गाण्डीवम्: गांडीव धनुष; स्रंसते: गिर रहा है; हस्तात्: हाथ से; त्वक्: त्वचा; च: और; एव: ही; परिदह्यते: जल रही है; न: नहीं; च: और; शक्नोमि: समर्थ हूँ; अवस्थातुम्: खड़े रहने में; भ्रमति: भ्रमित हो रहा है; इव: मानो; च: और; मे: मेरा; मनः: मन।

हिंदी अनुवाद

मेरे हाथ से गांडीव धनुष गिर रहा है, त्वचा जल रही है, मैं स्थिर खड़ा नहीं रह सकता और मेरा मन घूम रहा है (भ्रमित हो रहा है)।

English Translation

The bow Gandiva is slipping from my hand, my skin is burning all over, I am unable to stand steady, and my mind is reeling.

टीका / Commentary

अर्जुन का दुःख और भय इतना बढ़ गया कि उनका धनुष हाथ से छूट रहा है, त्वचा में जलन हो रही है, और मन भ्रमित है। Arjuna's distress is so intense that he cannot hold his bow, his skin burns, his mind reels.