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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 1 · श्लोक 30

अध्याय 1 · श्लोक 30

अर्जुन विषाद योग (Arjuna Vishada Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते | न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः ||३०||

gāṇḍīvaṃ sraṃsate hastāttvakcaiva paridahyate | na ca śaknomyavasthātuṃ bhramatīva ca me manaḥ ||30||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

गाण्डीवम्: गांडीव धनुष; स्रंसते: गिर रहा है; हस्तात्: हाथ से; त्वक्: त्वचा; च: और; एव: ही; परिदह्यते: जल रही है; न: नहीं; च: और; शक्नोमि: समर्थ हूँ; अवस्थातुम्: खड़े रहने में; भ्रमति: भ्रमित हो रहा है; इव: मानो; च: और; मे: मेरा; मनः: मन।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

मेरे हाथ से गांडीव धनुष गिर रहा है, त्वचा जल रही है, मैं स्थिर खड़ा नहीं रह सकता और मेरा मन घूम रहा है (भ्रमित हो रहा है)।

English Translation

The bow Gandiva is slipping from my hand, my skin is burning all over, I am unable to stand steady, and my mind is reeling.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

अर्जुन का दुःख और भय इतना बढ़ गया कि उनका धनुष हाथ से छूट रहा है, त्वचा में जलन हो रही है, और मन भ्रमित है। Arjuna's distress is so intense that he cannot hold his bow, his skin burns, his mind reels.
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।