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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 1 · श्लोक 35

अध्याय 1 · श्लोक 35

अर्जुन विषाद योग (Arjuna Vishada Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन | अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते ||३५||

etānna hantumicchāmi ghnato'pi madhusūdana | api trailokyarājyasya hetoḥ kiṃ nu mahīkṛte ||35||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

एतान्: इनको; न: नहीं; हन्तुम्: मारने की; इच्छामि: इच्छा करता हूँ; घ्नतः: मारे जाने पर भी; अपि: भी; मधुसूदन: हे मधुसूदन (कृष्ण); अपि: भले ही; त्रैलोक्यराज्यस्य: तीनों लोकों के राज्य के; हेतोः: लिए; किम् नु: क्या कहना; महीकृते: पृथ्वी के लिए।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

हे मधुसूदन! मैं इन्हें मारना नहीं चाहता, चाहे ये मुझे ही क्यों न मारें, तीनों लोकों के राज्य के लिए भी नहीं, तो फिर पृथ्वी के लिए तो क्या कहना?

English Translation

O Madhusudana, I do not wish to kill them, even if they kill me, even for the sake of the kingdom of the three worlds, let alone for this earth.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

अर्जुन स्पष्ट कहते हैं कि वे युद्ध नहीं करना चाहते, चाहे उनकी जान चली जाए या तीनों लोकों का राज्य मिले। Arjuna declares he will not fight, even if it means his own death or the offer of universal sovereignty.
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।