ग्रंथ परिचय (Book Introduction)
स्थापत्यवेद वास्तुकला, शिल्पकला और नगर-निर्माण का प्राचीन शास्त्र है। इसे अथर्ववेद का उपवेद माना जाता है। इस ग्रंथ में मंदिर-निर्माण, महल-निर्माण, नगर-योजना, मूर्ति-शिल्प, और वास्तु-शास्त्र के सिद्धांतों का विस्तृत वर्णन है। स्थापत्यवेद के आधार पर ही बाद में विश्वकर्मा, मय, मानसार आदि ग्रंथों की रचना हुई।
स्थापत्यवेद में वास्तु-पुरुष मंडल, दिशाओं का महत्व, भूमि-परीक्षण, भवनों के अनुपात, और गृह-निर्माण के मुहूर्त का विवेचन है। इसमें शिल्पियों के लिए कर्म-विधान, औजारों के निर्माण, और मूर्तिकला के अंग-प्रत्यंग के अनुपात (तालमान) का भी वर्णन है। यह ग्रंथ केवल भवन-निर्माण तक सीमित नहीं, बल्कि पर्यावरण संतुलन, ऊर्जा-प्रवाह और मानव-जीवन की समग्रता पर भी प्रकाश डालता है।
प्रस्तुत हिंदी अनुवाद में स्थापत्यवेद के मूल सूत्रों के साथ वास्तु-सिद्धांत, नगर-योजना, मंदिर-स्थापत्य और शिल्प-विधान का सरल विवेचन किया गया है। यह पुस्तक वास्तुविदों, शिल्पकारों, वास्तुशास्त्र के अध्येताओं और निर्माण-क्षेत्र से जुड़े सभी लोगों के लिए उपयोगी है।